असम विधानसभा चुनाव प्रचार थम गया है और उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला गुरुवार को होगा. असम को अपनी सौम्यता और मिली-जुली संस्कृति के लिए जाना जाता है, लेकिन इस बार चुनावी फिजाओं में सियासी कड़वाहट घुल गई है. ब्रह्मपुत्र की लहरें भले ही शांत हैं, लेकिन चुनावी मंचों से शब्दों के ऐसे-ऐसे बाढ़ छोड़े गए, जिसने 'सियासी मर्यादा'का चीरहरण कर दिया.
विधानसभा चुनाव में इस बार नेताओं की डिक्शनरी से 'शालीनता' शब्द गायब हो गए. रैलियों में 'मिया','मुगल' और 'घुसपैठिये' जैसे ही शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया गया बल्कि भाषा का स्तर निजी हमलों तक पहुंच गया. जुबानी जंग में एक दूसरे पर सिर्फ हमले ही नहीं किए गए राजनीतिक मर्यादा लांघने का काम किया गया.
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा शुरू से गौरव गोगोई की पत्नी के बहाने कांग्रेस पर निशाना साधते रहे हैं, लेकिन अब वैसा ही सियासी दांव कांग्रेस ने हिमंत के खिलाफ चला, तो उनका पारा हाई हो गया. इस तरह असम की लड़ाई उनकी पत्नियों तक पहुंच गई है और पूरा चुनाव प्रचार मिया-बीबी और मुसलमान के बीच सिमटा रहा.
असम का चुनाव मियां-बीबी पर आया
असम में नौ अप्रैल को होने वाले मतदान में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की साख दांव पर है. उनके सामने अपने पांच साल के कार्यकाल के दौरान किए गए काम के आधार पर बीजेपी को अकेले अपने बूते बहुमत के साथ सत्ता में लौटाने की चुनौती है. हिमंत सरमा के सहारे बीजेपी असम में सत्ता की हैट्रिक लगाने की कवायद में है और उनके सामने अपनी सरकार के कामकाज के आधार पर वोट हासिल करने की कड़ी चुनौती है.
कांग्रेस असम में दस साल के सियासी वनवास को खत्म करने के लिए गौरव गोगोई को आगे कर चुनावी मैदान में उतरी थी. ऐसे में सीएम हिमंता सरमा कांग्रेस के सबसे प्रमुख चेहरे गौरव गोगोई और उनकी पत्नी पर पाकिस्तानी कनेक्शन का आरोप लगाते हुए उन्हें घेर रहे थे. ऐसे में असम वोटिंग से ठीक पहले और चुनावी प्रचार थमने से दो दिन पहले कांग्रेस ने जब हिमंता पर निजी हमले शुरू किए तो वो आग बबूला हो गए. इस तरह असम का पूरा चुनाव मिया-बीबी के मैटर में उलझा रहा और एक दूसरे की पत्नी के बहाने निशाना साधते रहे.
असम की चुनाव लड़ाई कैसे गाली तक पहुंची
मुख्यमंत्री हिमंता सरमा कांग्रेस के सबसे प्रमुख चेहरे गौरव गोगोई और उनकी पत्नी पर पाकिस्तानी कनेक्शन का आरोप लगाते हुए उनको कठघरे में खड़ा करते रहे हैं, तो जवाब में कांग्रेस ने हिमंत की पत्नी के तीन पासपोर्ट का मुद्दा उठाया तो सियासी संग्राम खड़ा हो गया. कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी पर 3 देशों के पासपोर्ट रखने और कई देशों में अवैध रूप से संपत्तियां बनाने का आरोप लगाया. इसके बाद हिमंत सरमा आग बबूला हो गए और उन्होंने सारी मर्यादा पार कर दी.
हिमंत बिस्व सरमा ने कहा kf पवन खेड़ा को वह पाताल से भी ढूंढ निकालेंगे.इसके बाद हिमंत ने कहा, 'राहुल गांधी पागल हैं और पवन खेड़ा उनसे भी बड़े पागल हैं. मैं उन्हें पवन खेड़ा से पवन पेड़ा बना दूंगा.' इस दौरान हिमंत बिस्वा सरमा ने कुछ अपशब्दों का भी प्रयोग किया, जिसका हम स्टोरी में जिक्र भी नहीं कर सकते हैं. इस तरह हिमंत ने कांग्रेस के खिलाफ गलत शब्दों का इस्तेमाल किया, जिसने राजनीतिक मर्यादा को तार-तार कर दिया है.
'मुद्दे' पीछे छूटे और 'गालियां' बनीं हेडलाइन
असम के चुनाव प्रचार में इस बार विकास, बाढ़ और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दे कहीं कोने में दुबक गए हैं. उनकी जगह पर निजी हमलों, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और आपत्तिजनक उपमाओं ने ले दिया. रैलियों में हिमंता खुलकर 'मिया', 'मुगल' और 'घुसपैठिये' जैसे शब्दों का इस्तेमाल मुस्लिमों के लिए करते रहे. ये शब्ज अब सिर्फ पहचान की राजनीति तक सीमित नहीं रहे, बल्कि इसे अपमानजनक लहजे में परोसा गया.
सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों तरफ से चुनाव प्रचार में अपशब्दों में इस्तेमाल किए गए. 'मिटा देंगे', 'देख लेंगे' और 'उखाड़ फेंकेंगे' जैसे आक्रामक शब्दों का खूब बोल बाला रहा. राहुल गांधी ने कहा था कि हिमंत बिस्वा सरमा, भारत का सबसे भ्रष्ट मुख्यमंत्री हैं, जो सबसे ज्यादा नफरत फैलाने का काम करते हैं. हिमंत ऐसी बातें इसलिए बोल रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि कांग्रेस के बब्बर शेर उन्हें नहीं छोड़ेंगे, माफी मांगने पर भी नहीं उनको नहीं छोड़ेंगे.
नेताओं की जुबानी क्यों जहरीली हो गई?
असम में ग्राउंड जीरो से ज्यादा नफरती बातें सोशल मीडिया पर फैली हैं. आईटी सेल की सक्रियता ने नेताओं के विवादित बयानों को काट-छांटकर इस तरह वायरल किया है कि तर्कों की जगह केवल ट्रोलिंग ने ले ली है. नेताओं को लगता है कि जितना तीखा बोलेंगे,उतनी ज्यादा हेडलाइन मिलेगी. यही वजह रही कि दोनों ही ओर से एक दूसरे के खिलाफ जुबानी जंग चलती रही.
असम में इस बार जुबानी जंग में सियासी मर्यादा इसीलिए भी तार तार हो गई, क्योंकि कई बड़े चेहरों के लिए यह चुनाव 'करो या मरो' जैसा है. जब हार का डर होता है, तो भाषा की मर्यादा अक्सर पहले बलि चढ़ती है. चुनाव में नीतिगत चर्चाओं की बजाय किसी को 'दुश्मन' बताकर वोट मांगना आसान होता है.
हालांकि, चनाव में जिस तरह की भाषा का प्रयोग असम किया गया, उसने सियासी मर्यादा को ही नहीं बल्कि चुनावी रंग को फीका कर दिया है. सवाल यह है कि क्या सत्ता की कुर्सी इतनी बड़ी हो गई है कि उसके लिए अपनी संस्कृति और मर्यादा को दांव पर लगा दिया जाए?
मिया-मुसलमान और महिला पर टिका चुनाव
विशेलषकों का कहना है कि असम के स्वदेशी और बंगाली मिया मुसलमानों के बीच बढ़ती खाई का भी चुनावी नतीजों पर असर हो सकता है. मुख्यमंत्री खुलेआम कहते रहे हैं कि उनको मिया वोटों की ज़रूरत नहीं है. खासकर निचले असम की सीटों पर ऐसे बांग्लाभाषी मुसलमान पार्टी को कितना नुकसान पहुंचाएंगे, यह तो बाद में ही पता चलेगा.
हालांकि, भाजपा को भी इस खतरे का अंदाजा है. यही वजह है कि पार्टी ने इस बार महिलाओं, युवाओं और चाय बागान मजदूरों को अपने राजनीतिक पाले में खींचने पर खास जोर दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह समेत कई नेता असम में चुनावी रैलियों में चाय बागान में पत्तियां तोड़ी तो कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जैसे नेता भी चाय बागान इलाके में ताबड़तोड़ रैलियां कर उन्हें साधने की कवायद करते नजर आए.