पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार एक दिलचस्प मोड़ देखने को मिल रहा है, जहां कांग्रेस ने लंबे समय बाद अकेले दम पर विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया है. पार्टी का 'एकला चलो रे' का यह दांव खासतौर पर मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे पारंपरिक गढ़ों में उसकी किस्मत आजमाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है. दरअसल, पिछले कई चुनावों में कांग्रेस ने लेफ्ट फ्रंट के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा, लेकिन इस रणनीति से उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली.
पार्टी के भीतर यह धारणा मजबूत हुई कि लेफ्ट के साथ गठजोड़ ने कांग्रेस के जनाधार को कमजोर किया, खासकर उन इलाकों में जहां उसका परंपरागत प्रभाव रहा है. यही वजह है कि इस बार कांग्रेस ने सभी 294 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है. पिछले चुनावी आंकड़े कांग्रेस के लिए चिंता का विषय रहे हैं. साल 2016 में 44 सीटें जीतने वाली पार्टी 2021 में एक भी सीट नहीं जीत सकी और उसका वोट शेयर घटकर महज 3% रह गया.
इतना ही नहीं, पार्टी के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी को भी हार का सामना करना पड़ा था. इन नतीजों ने कांग्रेस नेतृत्व को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया. अब कांग्रेस अपनी जड़ों की ओर लौटने की कोशिश कर रही है. पार्टी के कुछ नेता 1960 के दशक में विधान चंद्र राय के नेतृत्व वाली कांग्रेस के दौर को फिर से याद दिलाकर संगठन को पुनर्जीवित करने की बात कर रहे हैं.
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इसी कड़ी में हाल ही में मालदा की प्रभावशाली नेता मौसम नूर का तृणमूल कांग्रेस छोड़कर कांग्रेस में शामिल होना पार्टी के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है. कांग्रेस की रणनीति साफ है- मालदा और मुर्शिदाबाद में फोकस कर कुछ सीटें हासिल करना. पार्टी मानती है कि यदि इन जिलों में 2-3 सीटें भी जीत ली जाती हैं, तो बंगाल में उसकी वापसी की नींव रखी जा सकती है.
हालांकि, मुकाबला आसान नहीं है. इन मुस्लिम बहुल इलाकों में तृणमूल कांग्रेस के अलावा असदुद्दीन ओवैसी और हुमायूं कबीर की पार्टियों का गठजोड़ भी चुनावी मैदान में है. ऐसे में मुस्लिम वोट बैंक का बंटवारा निर्णायक साबित हो सकता है. यदि कांग्रेस यहां थोड़ी भी बढ़त बनाती है, तो इसका सीधा असर तृणमूल कांग्रेस के प्रदर्शन पर पड़ सकता है.