पश्चिम बंगाल चुनाव के मुहाने पर खड़ा है. इस साल सूबे की नई सरकार चुनने के लिए मतदान होना है और इसे सूबे की सियासत के लिए निर्णायक मोड़ माना जा रहा है. सूबे की सत्ता में डेढ़ दशक से जमीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सामने इस बार भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने सीधी और संगठित चुनौती पेश करने की तैयारी कर ली है. आने वाले तीन महीने न केवल चुनावी समीकरण तय करेंगे, बल्कि यह भी स्पष्ट करेंगे कि राज्य की राजनीति में बदलाव की जमीन कितनी मजबूत है.
बीजेपी ने साफ कर दिया है कि उसकी चुनावी रणनीति के केंद्र में हिंदुत्व के साथ ही महिला सुरक्षा, घुसपैठ और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे होंगे. अपनी पूरी चुनावी रणनीति को अगले तीन महीनों में चरणबद्ध तरीके से लागू करने का खाका तैयार किया है. पार्टी का मानना है कि फरवरी, मार्च और अप्रैल, ये तीन महीने ही बंगाल की सत्ता की दिशा तय करेंगे. फरवरी का महीना बीजेपी के लिए संगठनात्मक मजबूती का महीना होगा. पार्टी नेतृत्व ने साफ निर्देश दिए हैं कि इस दौरान किया गया बूथ स्तर का काम ही सत्ता तक पहुंचने के मिशन में नींव का काम कर सकता है.
दरअसल, राज्य में दसवीं और बारहवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाओं के कारण फरवरी को 'साइलेंट पीरियड' माना जाता है. लाउडस्पीकर और बड़ी रैलियों पर पाबंदियों के चलते राजनीतिक गतिविधियां इस अवधि में सीमित रहती हैं. बीजेपी इस साइलेंट पीरियड का इस्तेमाल अपने संगठन को मजबूत करने के लिए करने की रणनीति पर काम कर रही है. फरवरी महीने में पार्टी बूथ कमेटियों के पुनर्गठन, कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी तय करने के साथ ही डोर-टू-डोर कैंपेन, छोटी-छोटी बैठकें और संवाद जैसे प्रचार के पारंपरिक तरीकों पर जोर देगी.
बीजेपी की नजर वोटर लिस्ट के विशेष पुनरीक्षण (SIR) पर भी टिकी हैं. 14 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद पार्टी बूथ स्तर पर गहन समीक्षा शुरू करेगी. फिलहाल, राज्य में करीब 81 हजार पोलिंग बूथ हैं लेकिन चुनाव आयोग के नए मानकों के तहत प्रति बूथ अधिकतम 1200 मतदाताओं की सीमा तय होने की वजह से इस बार बूथ की संख्या बढ़कर एक लाख के करीब पहुंच सकती है. इन नए आंकड़ों के हिसाब से बीजेपी फरवरी महीने में नए सिरे से बूथ प्रबंधन का काम करेगी.
मार्च से आक्रामक मोड में आएगी बीजेपी
साइलेंट पीरियड खत्म होते ही मार्च से बीजेपी आक्रामक मोड में आ जाएगी. पार्टी पूरे राज्य में 'परिवर्तन यात्राएं' निकालने की तैयारी कर रही है. इन यात्राओं का मकसद तृणमूल कांग्रेस सरकार की नाकामियों को जनता के सामने रखना और बीजेपी को एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में पेश करना है. इन यात्राओं को राष्ट्रीय स्तर के नेता हरी झंडी दिखा सकते हैं. संभावित नामों में गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शामिल हैं.
पश्चिम बंगाल में बीजेपी की परिवर्तन यात्राओं की कमान शुभेंदु अधिकारी, समिक भट्टाचार्य, सुकांत मजूमदार, अग्निमित्रा पॉल, लॉकेट चटर्जी और दिलीप घोष जैसे स्थानीय नेता संभाल सकते हैं. योजनाबद्ध तरीके से सभी यात्राओं का समापन कोलकाता में एक विशाल रैली के साथ होगा, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संबोधित कर सकते हैं. संगठनात्मक रूप से बीजेपी ने पूरे राज्य को छह जोन में बांटा है. हर जोन की जिम्मेदारी बाहर से आए वरिष्ठ नेताओं को दी गई है, ताकि निष्पक्ष निगरानी और सख्त फीडबैक मिल सके.
ममता बनर्जी पर हमले से परहेज करेगी पार्टी
बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ समन्वय बढ़ाया है और विधानसभा स्तर पर भी प्रभारी नियुक्त किए हैं. बीजेपी ने 162 विधानसभा सीटों को विशेष फोकस लिस्ट में रखा है, जबकि सभी 294 सीटों पर चुनाव प्रभारियों की तैनाती पूरी कर ली गई है. इसके अलावा तापस रे की अध्यक्षता में 11 सदस्यीय संकल्प पत्र समिति का गठन कर चुनावी एजेंडा तय करने की प्रक्रिया भी पार्टी शुरू कर चुकी है. बीजेपी ने साफ कर दिया है कि वह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर व्यक्तिगत हमलों से बचेगी. इसकी बजाय पार्टी का फोकस सरकार के कामकाज पर रहेगा.
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बीजेपी कर चुकी 1500 से ज्यादा सभाएं, बढ़ाया संवाद
जनवरी महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन ने राज्य का दौरा किया. अमित शाह ने सांसदों और विधायकों को जनता से सीधा संपर्क बढ़ाने के निर्देश दिए थे. इसके बाद पार्टी ने राज्यभर में डेढ़ हजार से अधिक संपर्क सभाएं कीं. नुक्कड़ सभाओं और छोटे चौक-चौराहों पर बैठकों के जरिए बीजेपी ने आम लोगों को न केवल सुना, बल्कि टीएमसी सरकार के खिलाफ अपनी बात रखने का मंच भी दिया.
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7 मई को समाप्त हो रहा बंगाल विधानसभा का कार्यकाल
पश्चिम बंगाल विधानसभा का कार्यकाल 7 मई को समाप्त हो रहा है. ऐसे में चुनाव मार्च के अंतिम सप्ताह से लेकर अप्रैल के अंतिम सप्ताह के बीच होने की संभावना है. पश्चिम बंगाल विधानसभा का पिछला चुनाव (2021) आठ चरणों में हुआ था. इस बार मतदान के चरण पिछली बार के मुकाबले कम होने के अनुमान जताए जा रहे हैं. कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल की सियासत में अगले तीन महीने बेहद अहम हैं. एक तरफ ममता बनर्जी के सामने अपनी सत्ता बचाने की चुनौती है, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी की ‘परिवर्तन’ की महत्वाकांक्षी रणनीति. सत्ता के लिए चुनावी फाइट की जमीन पश्चिम बंगाल में अभी से तैयार हो गई है.