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West Bengal Vidhan Sabha Chunav 2026: सैलरी नहीं, सम्मान की लड़ाई... बंगाल में DA क्यों बन गया BJP का सियासी हथियार

Bengal Elections 2026: पश्चिम बंगाल में DA अब सिर्फ वेतन का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि चुनावी राजनीति का बड़ा केंद्र बन गया है. बीजेपी इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाकर सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स की नाराजगी को वोट में बदलने की कोशिश कर रही है. 45 दिन में पूरा DA देने का वादा इसी रणनीति का हिस्सा है.

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बंगाल चुनाव में DA की एंट्री - कर्मचारियों की नाराजगी को वोट में बदलने की रणनीति (Photo: PTI)
बंगाल चुनाव में DA की एंट्री - कर्मचारियों की नाराजगी को वोट में बदलने की रणनीति (Photo: PTI)

पश्चिम बंगाल में इस बार विधानसभा चुनाव सिर्फ योजनाओं और विचारधारा पर नहीं, बल्कि सरकारी कर्मचारियों के बकाया महंगाई भत्ते यानी DA पर भी लड़ा जाएगा. BJP ने इस मुद्दे को अपना सबसे धारदार चुनावी हथियार बनाने की तैयारी कर ली है.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि बंगाल में BJP की सरकार बनते ही 45 दिनों के भीतर 7वां वेतन आयोग लागू किया जाएगा. सूत्रों के मुताबिक 5 अप्रैल को BJP के घोषणापत्र में DA को लेकर बड़ा एलान होने वाला है.

आखिर DA इतना बड़ा मुद्दा क्यों बन गया?

इस वक्त पश्चिम बंगाल के सरकारी कर्मचारियों को 22 फीसदी DA मिल रहा है, जबकि केंद्र सरकार के कर्मचारियों को 55 फीसदी. यह फर्क ही पूरे विवाद की जड़ है. कर्मचारियों का कहना है कि वे भी उतना ही काम करते हैं, उन्हें भी उतनी ही महंगाई झेलनी पड़ती है, फिर भी उन्हें केंद्र के मुकाबले आधे से भी कम DA मिलता है.

इस मामले को और धार मिली फरवरी 2026 में, जब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि DA कर्मचारियों का कानूनी अधिकार है और राज्य सरकार को बकाए का 25 फीसदी तुरंत देना होगा. इस फैसले ने DA को एक नीतिगत मसले से उठाकर कानूनी हक का दर्जा दे दिया.

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BJP की रणनीति क्या है?

BJP की गणना सीधी है. बंगाल में सरकारी कर्मचारी, शिक्षक, पेंशनर और क्लर्क एक बड़ा और संगठित वोटर वर्ग हैं. ये लोग न सिर्फ खुद वोट करते हैं बल्कि अपने परिवार और मोहल्ले की राय भी प्रभावित करते हैं.

BJP इस मुद्दे पर TMC को घेरने की कोशिश में है. पार्टी का तर्क है कि जब कर्मचारी सड़कों पर उतरे तो सरकार ने अनदेखी की, जब कोर्ट ने आदेश दिया तब जाकर हरकत हुई और जब चुनाव आए तो राहत की घोषणाएं होने लगीं. यह नैरेटिव TMC के लिए असहज करने वाला है.

"45 दिन" का वादा क्यों अहम है?

अमित शाह ने साफ़ कहा कि सरकार बनने के 45 दिन के भीतर भुगतान किया जाएगा. यह इसलिए चतुराई भरा कदम है क्योंकि यह वादा पुराने बकाए से जुड़ा है यानी कोई नई सुविधा नहीं बल्कि वो पैसा जो कर्मचारियों का पहले से है.

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सिर्फ कर्मचारियों तक नहीं है बात

BJP इस मुद्दे का असर सिर्फ सरकारी कर्मचारियों तक नहीं देख रही. इसके दायरे में आते हैं कर्मचारियों के परिवार, सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवा, पेंशनर और शहरी मध्यम व.ग। बंगाल में आज भी सरकारी नौकरी एक बड़ी आकांक्षा है. ऐसे में DA का मुद्दा सीधे उस वर्ग से जुड़ता है जो पूछता है कि क्या बंगाल में सरकारी नौकरी अब भी फायदेमंद है.

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लेकिन BJP के लिए खतरा भी है

यह वादा जितना राजनीतिक रूप से आकर्षक है उतना ही जोखिम भरा भी है. राज्य सरकार खुद सुप्रीम कोर्ट में कह चुकी है कि बंगाल की वित्तीय स्थिति तनावपूर्ण है. अगर BJP सत्ता में आती है और 45 दिनों में यह वादा पूरा नहीं होता तो यही वादा उसके लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है.

बहरहाल, बंगाल के इस चुनाव में DA महज एक भत्ते का मामला नहीं रह गया है. यह सरकार की विश्वसनीयता, कर्मचारियों की गरिमा और इस सवाल की लड़ाई बन चुका है कि राज्य अपने कर्मचारियों को किस नजर से देखता है.

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