ठीक 10 साल पहले, यानी 2016 में बीजेपी ने 2014 की जीत के बाद उत्तर भारत से बाहर अपनी नई जमीन तलाशनी शुरू कर चुकी थी. और इसी कड़ी में असम के बाद पश्चिम बंगाल में भी उदय का सपना देखा. 2016 विधानसभा चुनाव में बीजेपी को कुछ खास हासिल नहीं हुआ लेकिन लेफ्ट का वोटबैंक बीजेपी की तरफ आता दिखा. इससे उत्साहित बीजेपी केंद्रीय नेतृत्व ने पश्चिम बंगाल को लेकर नए इंचार्ज नियुक्त किए और पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर अभियान चलाया.
सीधे तृणमूल कांग्रेस से टकराव हुआ और बीजेपी बतौर विपक्ष चर्चा में आ गई जहां उसे पूछने वाला कोई नहीं था. इस अभियान का परिणाम भी अच्छा हुआ और 2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में 18 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया. हालांकि, इसके तीन साल बाद 2021 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी सत्ता में नहीं आ पाई लेकिन 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी पार्टी बन गई.
बंगाल की सियासत को लेकर कई राजनीतिक पंडित ये खोजते-बताते रहे कि आखिर लोकसभा में इतनी बड़ी बढ़त के बाद भी विधानसभा चुनाव में बीजेपी पीछे कैसे रह गई. इसके कई कारण रहे लेकिन एक सबसे बड़ा मुद्दा अल्पसंख्यक वोट, अल्पसंख्यक बहुल सीटें या फिर 10 प्रतिशत से ज्यादा वाली मुस्लिम बहुल वोटर्स की कई विधानसभा सीटों पर मौजूदगी.
बंगाल में मुस्लिम वोटर्स कितने अहम
पश्चिम बंगाल में 2011 की जनगणना के मुताबिक 27 फीसदी मुस्लिम आबादी है, लेकिन माना जा रहा है कि 30 फीसदी वोट मुस्लिम हैं. बंगाल की 294 सीटों में 120 सीटों पर मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका में हैं.मुर्शिदाबाद जिले में 60 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम हैं तो मालदा और उत्तर दिनाजपुर जिले में मुस्लिम आबादी 50 फीसदी है. दक्षिण 24 परगना और बीरभूम में 35 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं. उत्तर 24 परगना, कूच बिहार और हावड़ा में 25 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं.
बंगाल में 25 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाली 112 विधानसभा सीटें आती है और 20 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम होने पर सीट का आंकड़ा 130 के करीब पहुंच जाता है. राज्य में 46 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम 50 फीसदी और 20 सीटें पर मुसलमानों की आबादी 40 फीसदी से अधिक है. 30 से 35 सीटों पर मुस्लिम आबादी 30 फीसदी से ज्यादा है और 50 सीटों पर मुस्लिम 25 फीसदी से अधिक हैं. इस तरह तकरीबन 120 से 140 सीटें ऐसे हीं जहां पर मुस्लिम मतदाता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
मुस्लिम ममता बनर्जी की सियासत ताकत
पश्चिम बंगाल में 2011 से ही मुस्लिम वोटर ममता बनर्जी के लिए अहम फैक्टर बने हुए हैं. मुस्लिम वोटों के सहारे ममता बनर्जी लगातार तीन बार सत्ता के सिंहासन पर विरजमान हो चुकी हैं. 2021 में मुस्लिम वोटर्स को लुभाने के लिए लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस ने आईएसएफ जैसे मुस्लिम आधार दल के साथ गठजोड़ किया था, लेकिन उसके बाद भी मुसलमान ममता बनर्जी के साथ खड़े रहे थे और कांग्रेस गठबंधन को सिरे से खारिज कर दिया था.
सीएसडीएस और लोकनीति का आंकड़ा भी बताया है कि पिछले विधानसभा चुनाव में 87 फीसद मुस्लिमों ने टीएमसी को वोट दिया था. मुस्लिम बहुल सीटें ममता बनर्जी जीतने में एकतरफा सफल रही थी, जिसके चलते ही बीजेपी 2021 में ममता बनर्जी को सत्ता से बाहर करने में असफल रह गई थी.
2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी बंगाल में दूसरे नंबर की पार्टी जरूर बनने में सफल रही थी, लेकिन ममता बनर्जी को सत्ता से बाहर नहीं कर सकी थी. राज्य की 294 सीटों में से टीएमसी ने 215 सीटें जीती थीं जबकि बीजेपी को 77 सीटें ही मिल सकी थी. टीएमसी को लगभग 48 फीसदी वोट मिले थे और बीजेपी को 38 फीसदी वोटों से संतोष करना पड़ा है. बीजेपी ने हिंदू बहुल सीटों पर अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन मुस्लिम बहुल सीटों पर उसका गेम खराब हो गया था.
बीजेपी की राह में कितनी बड़ी बाधा मुस्लिम?
बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों का आकलन करते हैं तो साफ पता चलता है कि कैसे बीजेपी की राह में मुस्लिम वोटर राजनीतिक बाधा बने हैं. सूबे में 30 फीसदी मुस्लिम बहुल 89 सीटों में से टीएमसी 87 सीटें जीतने में सफल रही थी और 25 फीसदी से ज्यादा वाली सीटों के नतीजे देखते हैं तो 112 सीटों में से 106 सीटें टीएमसी जीतने में सफल रही थी.
मुर्शिदाबाद जिले में 60 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं, जहां पर 22 विधानसभा सीटें आती हैं. 2021 में जिले की इन 22 सीटों में से 20 सीटें टीएमसी ने जीती थी और बीजेपी को सिर्फ दो सीटें मिली थी. ऐसे ही मालदा जिले की 12 विधानसभा सीटों में से 8 सीटें टीएमसी और 4 सीटें बीजेपी जीत सकी थी. उत्तरी दिनाजपुर जिले में 9 सीटें है, जिसमें से 7 सीटें टीएमसी और 2 सीटें बीजेपी ने जीती थी.
उदाहरण के तौर पर देखें तो मालदा की सुजापुर सीट पर 82 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं और यह सीट टीएमसी 1 लाख 30 हजार की मार्जिन से जीती थी. मुर्शिदाबाद की डोमकल सीट पर 85 फीसदी मुस्लिम है, जिसे टीएमसी जीतने में सफल रही. ऐसे ही मुर्शिदाबाद की भगवानगोला और रानीगगर सीट पर 80 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं और टीएमसी दोनों ही सीटें जीतने में सफल रही थी. कोलकाता की मटियाबुर्ज सीट पर 75 फीसदी मुस्लिम हैं तो दक्षिण 24 परगना की भांगड़ सीट पर 65 फीसदी मुस्लिम है. इन दोनों सीटें भी ममता बनर्जी ने जीती थी.
मुस्लिम पर्सेंट बढ़ने के साथ गड़बड़ाता गेम
राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी अपने एक रिपोर्ट में लिखते हैं तो 2021 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम बहुल सीटों से बीजेपी के लिए सियासी दीवार बन गई थी. निर्वाचन सीटों पर मुस्लिम आबादी 0-10 फीसदी थी, वहां बीजेपी के जीत का ट्रैक रिकार्ड करीब 42 फीसदी रहा. 0-10 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले 77 विधानसभा सीटों में 33 सीटें बीजेपी ने जीती थी.
बंगाल की सीटों पर जैसे-जैसे मुस्लिम वोटर ज्यादा होते गए, बीजेपी के जीत का ग्राफ भी गिरता गया. 20 से 30 फीसदी मुस्लिम आबादी वाली सीटों पर बीजेपी के जीत का ग्राफ 25 फीसदी रहा और 40 से 50 फीसदी वाली सीटों पर 8 फीसदी सीटें ही जीत सकी थी. मुस्लिम जिन सीटों पर 50 फीसदी से ज्यादा हैं, उन सीट पर बीजेपी का खाता नहीं खुल सका था.
ममता बनर्जी कैसे बेताज बादशाह
पश्चिम बंगाल में कुल 294 विधानसभा सीटे हैं और किसी भी दल को सरकार बनाने के लिए 148 सीटों की जरूरत होती है. बंगाल में मुस्लिम बहुल करीब 120 सीटें है, जिसमें 110 सीटें टीएमसी जीतने में सफल रही और 9 सीटें बीजेपी और एक सीट अन्य को मिली थी. ऐसे में ममता बनर्जी को सरकार बनाने के लिए हिंदू बहुल 174 सीटों में महज 34 सीटों की जरूरत बनती है.
2021 में ममता बनर्जी मुस्लिम बहुल क्षेत्र में 110 सीटें जीती थी जबकि हिंदू बहुल इलाके की 174 सीटों में से 105 सीटें जीतने में सफल रही थी. इस तरह से ममता बनर्जी ने 215 सीटों के साथ चुनाव जीतने में सफल रही थी. वहीं, बीजेपी हिंदू बहुल इलाके में 40 फीसदी के दर से सीटें जीती थी, लेकिन मुस्लिम बहुल इलाके की सीटों ने सारा गेम बिगाड़ दिया था. सीएसडीएस के आंकड़े भी बताते हैं कि 54 फीसदी हिंदुओं ने बीजेपी को वोट दिए थे और टीएमसी को 42 फीसदी वोट ही मिल सका था.