उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए सियासी दलों के बीच शह-मात का खेल अभी से शुरू हो गया है. बीजेपी सत्ता की हैट्रिक लगाने की कवायद में है तो सपा अपना दस साल का वनवास खत्म करना चाहती है. ऐसे में अखिलेश यादव ने बीजेपी को चुनाव हराने का फॉर्मूला तलाश लिया है, जिसके लिए सूबे के सियासी पिच पर जातिगत बिसात बिछानी शुरू कर दी है.
अखिलेश यादव ने जनवरी में बीजेपी को एक प्रोफेशनल राजनीतिक पार्टी बताते हुए उसे उसके ही तरीके से हराने की बात कही थी. 2024 के लोकसभा चुनाव में जरूर पीडीए फॉर्मूल से बीजेपी को सियासी मात देने में सफल रहे हैं, लेकिन 2027 के लिए अलग रणनीति पर काम कर रहे हैं.
2022 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने मायावती के वोटबैंक को साधने की कवायद की थी, लेकिन 2027 में बीजेपी के वोटबैंक में सेंधमारी का प्लान बनाया है, क्योंकि उन्हें पता है कि बीजेपी को बिना वोट की चोट दिए सत्ता में वापसी संभव नहीं है. ऐसे में सपा की नजर बीजेपी के वोटबैंक बन चुके गुर्जर, निषाद और ब्राह्मण वोटों पर है. इसके लिए अखिलेश यादव ने अपनी एक्सरसाइज शुरू कर दी है.
गुर्जर वोटों के लिए सपा का प्लान
सपा प्रमुख अखिलेश यादव पश्चिम यूपी से मिशन- 2027 का आगाज करने का प्लान बनाया है. नोएडा के दादरी में 29 मार्च को चुनावी रैली के जरिए गुर्जर समुदाय को साधने की स्टैटेजी बनाई है. 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही सपा का फोकस गुर्जरों के वोटबैंक पर है. पिछले साल अखिलेश यादव ने दिल्ली से गुर्जर चौपाल का आगाज किया था, जिसके बाद पार्टी प्रवक्ता राजकुमार भाटी ने पश्चिम यूपी के जिलों में गुर्जर समुदाय के बीच कार्यक्रम किए थे.
अखिलेश यादव पश्चिम यूपी के सियासी मिजाज को देखते हुए मुस्लिमों के साथ नए गुर्जर समीकरण की कवायद में जुट गए हैं. इस तरह पश्चिमी यूपी में सपा 'आत्मनिर्भर' बन सके. गुर्जर समाज 2014 से बीजेपी का कोर वोटबैंक बन चुका है, जिसके अखिलेश यादव अपने साथ मिलाकर बीजेपी को पश्चिमी यूपी में मात देना चाहते हैं. इसीलिए 2027 के चुनावी अभियान का आगाज गुर्जर बहुल नोएडा से कर रहे हैं.
पश्चिम यूपी में गुर्जर समाज की खासी संख्या है, जो किसी भी दल का खेल बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखते हैं. पश्चिम यूपी के गाजियाबाद, नोएडा, बिजनौर, संभल, मेरठ, सहारनपुर, कैराना जिले की करीब दो दर्जन सीटों पर गुर्जर समुदाय निर्णायक भूमिका में है, जहां 20 से 70 हजार के करीब इनका वोट हैं. गुर्जर समुदाय की लीडरशिप को भी अखिलेश आगे बढ़कर सियासी संदेश दे रहे हैं.
अखिलेश यादव ने विधायक अतुल प्रधान, राजकुमार भाटी, मुखिया गुर्जर और सांसद इकरा हसन को सपा ने गुर्जर चेहरे के तौर पर आगे बढ़ा रही है.पश्चिम यूपी के मेरठ के मवाना कस्बे में अखिलेश यादव ने गुर्जर समुदाय से आने वाले शहीद धनसिंह कोतवाल की मूर्ति का अनावरण कर पहले ही संदेश दे चुके हैं कि उनकी नजर गुर्जर समाज के वोटों पर है. सपा अगर गुर्जर वोटों में सेंधमारी करने में कामयाब होती है तो बीजेपी के लिए बड़ा झटका होगा.
मल्लाह वोटों पर सपा की नजर
2027 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अखिलेश यादव ने पूर्व सांसद फूलन देवी की बड़ी बहन रुक्मिणी देवी निषाद को महिला सभा का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है. रुक्मिणी देवी मल्लाह समुदाय से आती हैं, जो बीजेपी के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ है. अखिलेश ने बीजेपी को 2027 के चुनाव में चोट देने के लिए फूलन देवी की बहन पर बड़ा दांव खेला है.
दलित और पिछड़ी जाति के महिलाओं के बीच फूलन देवी की अपनी लोकप्रियता रही है, जिन्हें मल्लाह समुदाय अपने मसीहा के तौर पर देखा था. सपा की इस कोशिश को फूलन देवी के बहाने सूबे के मल्लाह समुदाय को राजनीतिक संदेश देने के तौर पर देखा. मल्लाह समुदाय की उपजातियां काची, बिंद, मल्लाह और निषाद समुदाय के बीच काफी लोकप्रिय रहीं.
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक मल्ला समाज, उत्तर प्रदेश में एक महत्वपूर्ण मतदाता है, जिसके चलते यह नियुक्ति की गई है. रुक्मिणी देवी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर निषाद समाज को साधने और पिछले चुनावों में बिखरे वोटों को एकजुट करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है और ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि आगामी चुनावों में बड़ा फेरबदल देखने को मिल सकता है.
यूपी में मल्लाह वोटर कितने अहम
उत्तर प्रदेश की 50 फीसदी से अधिक पिछड़ी आबादी में तकरीबन 6 फीसद निषाद हैं जो अति पिछड़ी उपजातियों में माने जाते हैं. मोटे तौर पर देखें तो निषादों में 150 से ज्यादा उप जातियां हैं और पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश के 18 जिलों में इनकी अच्छी-खासी तादाद है. लेकिन, निषाद समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं का दावा है कि राज्य की 403 विधानसभा सीटों में से उनके समाज का 160 सीटों पर ठीक-ठाक प्रभाव है और इन सीटों पर 60 हजार से लेकर एक लाख तक वोट निषाद समाज का है.
गोरखपुर, गाजीपुर, बलिया, संतकबीर नगर, मऊ, मिर्जापुर, भदोही, वाराणसी, इलाहाबाद ,फतेहपुर, सहारनपुर और हमीरपुर जिले में निषाद वोटरों की संख्या अधिक है. निषाद समाज अपने मजबूत वोटबैंक से बड़े राजनीतिक दलों का खेल कई सीटों पर बिगाड़ने की ताकत रखते हैं. बीजेपी ने निषाद वोटों के लिए संजय निषाद की पार्टी के साथ गठबंधन कर रखा है, जिसके सहारे 2022 चुनाव में सफल रही, पर अब सपा ने निषाद समाज की आईकॉन माने जाने वाली फूलन देवी की बड़ी बहन रुक्मिणी देवी निषाद को संगठन में अहम पद सौंपा है. इस तरह से बीजेपी को चोट देने की स्टैटेजी है.
ब्राह्मण वोटर्स पर सपा खेल रही दांव
अखिलेश यादव की नजर बीजेपी के हार्ड कोर वोटबैंक ब्राह्मण समुदाय पर है. सपा सूबे में ब्राह्मणों के उत्पीड़न का मुद्दा उठाकर 'ठाकुर बनाम ब्राह्मणट नैरेटिव सेट करने की रणनीति पर बहुत दिनों से काम कर रही है. अखिलेश यादव ने अपने ब्राह्मण चेहरों को आगे बढ़ाया है, जिसमें माता प्रसाद पांडेय को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बना रखा है तो पवन पांडेय, संतोष पांडेय और विनय शंकर तिवारी जैसे ब्राह्मण चेहरों को भी अहम रोल दे रखा है. इसके अलावा बलिया से सपा सांसद सनातन पांडेय को भी पार्टी ने आगे कर दिया है.

यूजीसी के नए नियमों से लेकर घूसखोर पंडत, यूपी में ब्राह्मण को अवसरवादी बताना, ब्राह्मण विधायकों की बैठक पर नोटिस देना और माघ मेले में बटुक ब्राह्मणों की पिटाई ने सपा को ब्राह्मण वोटों का साधने का मौका मिल गया. सपा के ब्राह्मण नेता हिंदुत्व से जुड़े लगभग हर बड़े मुद्दे पर अपनी बात मजबूती से रख रहे हैं और बीजेपी को ब्राह्मण विरोधी कठघरे में खड़े करने की कवायद कर रही है. इस तरह सपा ब्राह्मण और धार्मिक मतदाताओं के बीच अपनी पैठ मजबूत बनाने की है.
ब्राह्मण वोटर किसके लिए कितने अहम
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 8 से 10 फीसदी मानी जाती है, लेकिन उनका प्रभाव 110 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर निर्णायक बताया जाता है. बलरामपुर, बस्ती, संत कबीर नगर, महाराजगंज, गोरखपुर, देवरिया, जौनपुर, अमेठी, वाराणसी, चंदौली, कानपुर और प्रयागराज जैसे करीब एक दर्जन जिलों में ब्राह्मण आबादी 15 फीसदी से अधिक है.ऐसे में किसी भी दल के लिए इस वर्ग की उपेक्षा राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकती है.
2022 के विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण मतदाताओं का करीब 89 फीसदी समर्थन बीजेपी को मिला था जबकि सपा को मात्र 6 फीसदी वोट मिल सका था. 2017 में भी भाजपा को इस वर्ग का लगभग 83 फीसदी समर्थन मिला था, जो उसके मजबूत सामाजिक आधार को दर्शाता है. यही वजह है कि सपा ने ब्राह्मण वोटों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति बनाई है ताकि बीजेपी को सत्ता से बाहर किया जाए सके. इसीलिए सपा की कोशिश ब्राह्मण वोटों को साधने की है, क्योंकि इससे सीधे बीजेपी को नुकसान है.
भाजपा का माइनस ही सपा का प्लस है
2022 के विधानसभा चुनाव के बाद अखिलेश यादव ने सपा को एम-वाई (मुस्लिम-यादव) छवि से बाहर निकालने के लिए पीडीए का फॉर्मूला बनाया था,जिसमें पिछड़ा वर्ग के साथ दलित और अल्पसंख्यक वोटों के समीकरण को जोड़ा. सपा ने इस दांव से यूपी की 80 में से 37 सीटें जीती थी जबकि बीजेपी को सिर्फ 33 सीटों पर ही जीत मिली थी. इसके बाद भी सपा को लगता है कि सूबे की सत्ता में आने के लिए बीजेपी के वोटबैंक में जब तक सेंधमारी नहीं करती है, तब संभव नहीं है.
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जीत के लिए 40 फीसदी से 45 फीसदी वोट जरूरी हो गया है. वह भी तब जब कोई चुनाव को कुछ हद तक त्रिकोणीय बनाए. अखिलेश यादव यह बात समझ चुके हैं कि लगभग 27-28 फीसदी यादव-मुस्लिम वोटरों के भरोसे वह लड़ाई में दिख तो सकते हैं, लेकिन जीत नहीं सकते . ऐसे में अखिलेश अपने वोट बेस के विस्तार पर फोकस किया है और उन्होंने एम-वाई समीकरण के बजाय पीडीए यानि पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का फॉर्मूला दिया है. सपा ने अब बीजेपी के वोटबैंक में सेंधमारी की स्टैटेजी पर काम कर रहे.
2022 के विधानसभा चुनाव में सपा गठबंधन को 37 फीसदी के करीब वोट मिले थे, लेकिन सूबे की सत्ता में आने के लिए सपा को 45 फीसदी के करीब वोट चाहिए. इस तरह सपा को अभी भी 8 फीसदी वोटों की दरकरार है, जिसे अखिलेश यादव हासिल करने के लिए बीजेपी के कोर वोटबैंक में सेंधमारी करने की है. इसीलिए ब्राह्मण, गुर्जर और मल्लाह वोटों पर खास फोकस किया है, जो फिलहाल बीजेपी का कोर वोटबैंक माना जाता है.