क्या एक वैज्ञानिक की 'मासूम' खोज पूरी दुनिया के विनाश का कारण बन सकती है? आज जब व्हाइट हाउस से लेकर तेहरान तक, हर तरफ ईरान के 450 किलो यूरेनियम को लेकर बारूद की गंध महसूस की जा रही है, अगर इतिहास के पन्नों का वो चेहरा सामने होता तो कितना मायूस हो जाता. वह चेहरा है मार्टिन हेनरिक क्लाप्रोथ का.
जानिए- क्या है कहानी
साल 1789 में, बर्लिन की एक छोटी सी लैब में जब इस फार्मासिस्ट ने एक 'काले पत्थर' से दुनिया का सबसे भारी तत्व अलग किया था, तो उसे गुमान भी नहीं था कि वह 'रोशनी' नहीं, बल्कि 'प्रलय' का बीज बो रहा है. उसने इसे एक शांत ग्रह 'यूरेनस' का नाम दिया, लेकिन उसे क्या पता था कि 200 साल बाद यही यूरेनियम इंसानी खून का प्यासा हो जाएगा.
ग्रह का नाम और धरती का विनाश
क्लाप्रोथ ने इसका नाम 'यूरेनस' ग्रह पर रखा था क्योंकि वह ब्रह्मांड की ऊंचाइयों को छूना चाहते थे. लेकिन 150 साल बाद, उसी खोज का इस्तेमाल 'हिरोशिमा और नागासाकी' को राख करने के लिए किया गया. जिस वैज्ञानिक ने इसे 'भविष्य की रोशनी' समझा था, उसे क्या पता था कि एक दिन दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश (अमेरिका और ईरान) इसी के पीछे एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाएंगे.
एक मासूम खोज, जो 'हथियार' बन गई
क्लाप्रोथ एक 'एनालिटिकल केमिस्ट' थे,जिनका मकसद सिर्फ सच का पता लगाना था. उन्होंने टाइटेनियम और जिरकोनियम भी खोजा, जो आज इंसानों की जान बचाने (मेडिकल इंप्लांट्स) के काम आते हैं. लेकिन यूरेनियम के साथ उनकी किस्मत ने एक बड़ा मजाक किया. उनकी खोज ने दुनिया को सस्ती बिजली तो दी, पर साथ ही 'परमाणु युद्ध' का वो डर भी दिया जो आज भी हमें सोने नहीं देता.