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बलूचिस्तान का वो इलाका... जहां पाकिस्तान से ज्यादा चीन का रसूख! कभी भारत को हुआ था ऑफर

पाकिस्तान का बलूचिस्तान एक बार फिर चर्चा में है. क्या आप जानते हैं इस बलूचिस्तान में एक ऐसी जगह है, जहां का ऑपरेशन चीन के हाथ में है...

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बलूचिस्तान इस जगह को लेकर भी विरोध करता रहता है. (Photo: Getty)
बलूचिस्तान इस जगह को लेकर भी विरोध करता रहता है. (Photo: Getty)

बलूचिस्तान में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) के हमलों ने पाकिस्तान आर्मी को हिला कर रख दिया है. इसके बाद पाकिस्तानी सेना ने भी बलूचिस्तान में ऑपरेशन किया है. इसके बाद पाकिस्तान की विवादित जगहों में से एक बलूचिस्तान फिर से चर्चा में है. बलूचिस्तान में बलूचों के विद्रोह की कई वजहों में से एक वजह वो इलाका भी है, जहां चीन का दबदबा ज्यादा माना जाता है. जी हां, आधिकारिक रुप से भले ही ये पाकिस्तान के कब्जे में है, लेकिन वहां चीन के हिसाब से ही ऑपरेशन होता है. 

खास बात ये है कि ये जगह एक वक्त ओमान के पास हुआ करती थी और फिर ये पाकिस्तान के कब्जे में आई. इतना ही नहीं, एक वक्त ऐसा भी आया, जब ये भारत में शामिल होने वाला था लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. ऐसे में जानते हैं कि आखिर पाकिस्तान की ये जगह कौन सी है, जहां चीन का काफी ज्यादा हस्तक्षेप है...

चीन का कितना कंट्रोल?

आज हम जिस जगह की बात कर रहे हैं, वो बलूचिस्तान का ग्वादर पोर्ट. ये चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का एक प्रमुख हिस्सा है. इस पोर्ट का संचालन चाइना ओवरसीज पोर्ट होल्डिंग कंपनी के पास है. साल 2017 में पाकिस्तान ने चीन को 40 साल तक इसका संचालन करने के लिए दे दिया था. इससे पहले भी ये चीनी कंपनी के अधीन था और 2017 में इसे आगे के लिए बढ़ा दिया गया. ये कंपनी अरब सागर पर स्थित इस बंदरगाह के सभी विकास कार्यों को अंजाम देती है. 

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रिपोर्ट्स के अनुसार, COPHC के पास पोर्ट के संचालन और राजस्व का बड़ा हिस्सा है. कहा जाता है कि 91% रेवेन्यु चीनी कंपनी को मिलता है और सिर्फ 9 फीसदी पाकिस्तान के पास जाता है.  वैसे तो पाकिस्तान बनने के बाद से ही बलूचिस्तान में विद्रोह की आवाज उठती रही है. लेकिन, जब से यहां चीन का प्रभाव बढ़ा है, उसके बाद से बलूचिस्तान में स्थिति और ज्यादा खराब हो गई है.  जब से पाकिस्तान ने बलूचिस्तान का ग्वादर पोर्ट चीन को दिया है, तब से बलोच इसके खिलाफ प्रदर्शन करते रहते हैं. 

बता दें कि ये पहले पहले मछुआरों और व्यापारियों का एक छोटा सा शांत कस्बा मात्र था. हथौड़े के आकार के इस मछली पकड़ने वाले गांव में अब पाकिस्तान का तीसरा सबसे बड़ा बंदरगाह है, जो चीन की वजह से है. हालांकि, ग्वादर हमेशा से पाकिस्तान का हिस्सा नहीं था. 

पहले ओमान के पास था

यह 1950 के दशक तक करीब 200 सालों तक ओमान के शासन के अधीन रहा. 1783 से ग्वादर पर ओमान के सुल्तान का कब्जा था. बता दें कि कलात के खान, मीर नूरी नसीर खान बलूच ने यह क्षेत्र मस्कट के राजकुमार, सुल्तान बिन अहमद को उपहार में दिया था. 

पत्रिका 'द इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज' से 1863 में ग्वादर की एक फोटो (Photo: Getty)
पत्रिका 'द इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज' से 1863 में ग्वादर की एक फोटो (Photo: Getty)

पाकिस्तान को कैसे मिला था?

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बलूचिस्तान का अधिकांश भाग 1948 में पाकिस्तान में समाहित हो गया था, लेकिन ग्वादर के आसपास की तटीय पट्टी, जिसे मकरान कहा जाता है, 1952 तक पाकिस्तान में शामिल नहीं हुई थी.  ग्वादर अभी भी पाकिस्तानी नियंत्रण से बाहर था. इस दौरान ओमान के सुल्तान ने इसे भारत को बिक्री का प्रस्ताव दिया. लेकिन भारत इस पर सहमत नहीं हुआ तो 1958 में पाकिस्तान सरकार ने अपने प्रयासों को तेज कर दिया और 1 अगस्त, 1958 को ब्रिटिश सरकार के साथ समझौता कर लिया. 

इसके बाद ग्वादर को ओमान से ब्रिटिश नियंत्रण में स्थानांतरित कर दिया गया, जो बाद में  पाकिस्तान के अधीन आ गया. तत्कालीन लेफ्टिनेंट इफ्तिखार अहमद सिरोही (बाद में नौसेना प्रमुख) के नेतृत्व में पाकिस्तान नेवी की एक प्लाटून ने 8 अगस्त 1958 को इस दिन पहली बार पाकिस्तान का झंडा फहराया. 

भारत को मिलने वाला था

ओमान के सुल्तान ने भारत को इसकी बिक्री का प्रस्ताव दिया था. कहा जाता है कि अगर यह सौदा हो जाता, तो दक्षिण एशियाई भू-राजनीतिक समीकरण और इतिहास में बड़ा बदलाव आ सकता था. बता दें कि ओमान के सुल्तान ने भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को ग्वादर की पेशकश की थी. जानकारों के अनुसार, यह प्रस्ताव 1956 में आया था. जवाहरलाल नेहरू ने इसे ठुकरा दिया और 1958 में ओमान ने ग्वादर को पाकिस्तान को 30 लाख पाउंड में बेच दिया. 

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