देश के सबसे बेहतरीन और प्रतिष्ठित संस्थान में पढ़ाई करने के बाद भी अगर आपको नौकरी नहीं मिलती है, तो क्या फायदा है. ऐसा ही हुआ दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली एक छात्रा के साथ. इतिहास (ऑनर्स) में 84% नंबर हासिल करने और डीन लिस्ट में जगह बनाने वाली एक छात्रा ने दावा किया है कि जब उसने कॉलेज के प्लेसमेंट सेल से नौकरी के बारे में पूछा, तो उसे बताया गया कि मानविकी (Humanities) के छात्रों के लिए कोई कंपनी हायरिंग नहीं कर रही है.
इस घटना ने इस बहस को फिर से हवा दे दी है कि क्या भारत का प्लेसमेंट सिस्टम अभी भी इंजीनियरिंग और तकनीकी पाठ्यक्रमों को प्राथमिकता देता है, जबकि मानविकी स्नातकों को जॉब मार्केट में अपने दम पर आगे बढ़ने के लिए छोड़ देता है.
शानदार एजुकेशन जर्नी लेकिन नहीं मिला प्लेसमेंट
इस मामले की जानकारी उद्यमी और द हाई टेबल के सह-संस्थापक हर्षित खरे ने लिंक्डइन पोस्ट के जरिए शेयर की. उन्होंने बताया कि उनकी एक दोस्त ने दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास (ऑनर्स) में 84% अंक हासिल किए और डीन लिस्ट में भी जगह बनाई,लेकिन अच्छी पढ़ाई के बावजूद उसे कॉलेज प्लेसमेंट में नौकरी का मौका नहीं मिला.
हर्षित खरे ने बताया कि उनकी दोस्त पढ़ाई में बेहद अच्छी थीं. उसे इतिहास की गहरी समझ थी, खासकर औपनिवेशिक अर्थशास्त्र जैसे विषयों पर उनकी अच्छी पकड़ थी. साथ ही उनकी लिखने की स्किल भी काफी मजबूत थी. लेकिन इतनी अच्छी शैक्षणिक उपलब्धियों के बावजूद, जब उन्होंने कॉलेज के प्लेसमेंट सेल से नौकरी के लिए संपर्क किया, तो उन्हें कोई मदद नहीं मिल सकी.
कोई कंपनी नहीं कर रही है हायरिंग
खरे के मुताबिक, प्लेसमेंट सेल ने इसे लेकर बेहद निराशाजवन प्रतिक्रिया दी. उन्होंने लिखा कि माफ कीजिए, हमारे पास मानविकी के छात्रों के लिए कोई कंपनियां नहीं आ रही हैं. इसके लिए उन्हें न कोई दूसरी नौकरी का विकल्प बताया गया, न करियर से जुड़ी कोई सलाह दी गई और न ही आगे किसी तरह की मदद मिली. इसके बाद उन्हें अपने दम पर नौकरी की तलाश शुरू करनी पड़ी.

ग्रेजुएशन करने के बाद क्या हुआ?
अगले आठ महीनों तक छात्रा ने कई कंपनियों में ईमेल भेजे और कई इंटरव्यू दिए. लेकिन कई जगह उसकी पढ़ाई का विषय देखकर उसे नौकरी के लिए उपयुक्त नहीं माना गया.
काफी कोशिशों के बाद आखिरकार उसे एक छोटे स्टार्टअप में कंटेंट राइटर की नौकरी मिली, जहां उसकी शुरुआती सैलरी 12,000 रुपये प्रति माह थी.
हर्षित खरे का कहना है कि यह किसी छात्र की योग्यता की नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमी को दिखाता है. उनके मुताबिक, मानविकी (Humanities) के छात्रों को नौकरी के पर्याप्त मौके नहीं मिलते, जिससे उन्हें करियर की शुरुआत में ही कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.
क्या भारत की प्लेसमेंट सेल हो रही है विफल ?
अपनी दोस्त का उदाहरण देते हुए हर्षित खरे ने सवाल उठाया कि कंपनियां अक्सर नौकरी के लिए अच्छी कम्युनिकेशन, क्रिटिकल थिंकिंग और विश्लेषण जैसी स्किल्स की बात करती हैं, लेकिन कैंपस प्लेसमेंट के दौरान मानविकी (Humanities) के छात्रों को मौका क्यों नहीं देती. उन्होंने कहा कि जहां इंजीनियरिंग के छात्रों को कॉलेज से ही प्लेसमेंट का फायदा मिल जाता है, वहीं मानविकी के छात्रों को नौकरी ढूंढ़ने के लिए ज्यादातर अपने दम पर मेहनत करनी पड़ती है.
खरे ने कंपनियों से मानविकी के छात्रों को नौकरी देने के अपने अच्छे अनुभव साझा करने की अपील की. साथ ही छात्रों से कहा कि वे अपनी डिग्री को अपनी परेशानियों की वजह न मानें क्योंकि असली चुनौती व्यवस्था में है, जहां अभी भी मानविकी विषयों के महत्व को पूरी तरह नहीं समझा गया है.
इंटरनेट पर प्रतिक्रिया
दिल्ली विश्वविद्यालय के एक छात्र की पोस्ट के बाद यह बहस शुरू हुई कि मानविकी (Arts/Humanities) के छात्रों को इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट के छात्रों की तुलना में कम नौकरी के मौके मिलते हैं. लोगों ने इसे लेकर अपनी प्रतिक्रिया भी दी है. कुछ लोगों ने कहा कि मानविकी की पढ़ाई सोच को व्यापक बनाती है, लेकिन पढ़ाई पूरी होने के बाद नौकरी के विकल्प कम होते हैं.
वहीं, कुछ का मानना है कि समाज अभी भी मानविकी के छात्रों को कम महत्व देता है. कई लोगों ने चिंता जताई कि अब कंपनियां ऐसे कामों के लिए AI का इस्तेमाल करने लगी हैं, जो पहले मानविकी के छात्र करते थे, इसलिए नौकरियां और कम हो रही है. वहीं, कुछ लोगों ने कहा कि मानविकी के छात्रों का मुख्य लक्ष्य हमेशा कॉर्पोरेट नौकरी नहीं होता. वे अक्सर शिक्षण,शोध, सिविल सेवा और अकादमिक क्षेत्र में करियर बनाते हैं.
क्या है बड़ा सवाल?
क्या भारत की कैंपस प्लेसमेंट व्यवस्था अभी भी सिर्फ तकनीकी डिग्री (जैसे इंजीनियरिंग) को ज्यादा महत्व देती है या फिर मानविकी के छात्रों की प्रतिभा और स्किल को भी बराबर पहचान और अवसर मिलने चाहिए?