अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर आज चंडीगढ़ पहुंचे हैं. वे भारतीय सेना के पश्चिमी कमान (Western Command) के मुख्यालय का दौरा करने वाले हैं. यह जानकारी खुद राजदूत ने अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट @USAmbIndia पर पोस्ट करके दी. उन्होंने लिखा: Just landed in Chandigarh. Looking forward to visiting the Western Command of the Indian Army. (चंडीगढ़ पहुंच गया हूं. भारतीय सेना के पश्चिमी कमान के दौरे का इंतजार है.
यह दौरा भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग का एक और उदाहरण है. लेकिन कई लोग पूछ रहे हैं – विदेशी राजदूत सेना के ठिकानों या कमान मुख्यालयों का दौरा क्यों करते हैं? क्या यह नया है या पहले की सरकारों में भी होता था?
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Just landed in Chandigarh. Looking forward to visiting the Western Command of the Indian Army
— Ambassador Sergio Gor (@USAmbIndia) February 16, 2026
यह दौरा क्यों हो रहा है? इसका उद्देश्य क्या है?
विदेशी राजदूतों या राजनयिकों का भारतीय सेना के कमान मुख्यालयों या सैन्य ठिकानों का दौरा कोई नई बात नहीं है. ऐसे विजिट मुख्य रूप से इन कारणों से होते हैं...
रक्षा सहयोग मजबूत करना: भारत और अमेरिका के बीच रक्षा साझेदारी तेजी से बढ़ रही है. दोनों देश जॉइंट मिलिट्री एक्सरसाइज करते हैं (जैसे युद्ध अभ्यास टाइगर ट्रायम्फ), हथियार खरीद-बिक्री करते हैं. खुफिया जानकारी साझा करते हैं. ऐसे दौरे से दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे को बेहतर समझती हैं.
स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप: अमेरिका भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण पार्टनर मानता है. चीन की बढ़ती ताकत के खिलाफ दोनों देश QUAD (अमेरिका, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया) जैसे गठबंधन में साथ हैं. ऐसे विजिट से विश्वास बढ़ता है. भविष्य में संयुक्त ऑपरेशन की तैयारी होती है.
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व्यावहारिक चर्चा: राजदूत सेना के अधिकारियों से मिलकर तकनीक ट्रांसफर, ट्रेनिंग प्रोग्राम और नए हथियार सिस्टम पर बात करते हैं. उदाहरण के लिए, भारत अमेरिका से अपाचे हेलीकॉप्टर, ड्रोन और अन्य उपकरण खरीद रहा है.
संदेश देना: ऐसे दौरे से दोनों देश दुनिया को संदेश देते हैं कि उनकी दोस्ती मजबूत है. यह दुश्मन देशों (जैसे चीन या पाकिस्तान) के लिए भी एक संकेत होता है.
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, विदेशी राजदूतों के ऐसे विजिट बहुत कम होते हैं. इन्हें सरकार की मंजूरी के बाद ही आयोजित किया जाता है. भारतीय सेना बहुत सतर्क रहती है. संवेदनशील जानकारी कभी साझा नहीं करती.
Hosted a warm reception at home tonight with dear friends from India, the diplomatic community, business leaders and partners from the US. Amid our nations' renewed trade framework and deepening strategic ties, the real magic happens in these personal moments—where trust, ideas,… pic.twitter.com/4PKa5upV70
— Ambassador Sergio Gor (@USAmbIndia) February 9, 2026
क्या पिछली सरकारों में भी ऐसे दौरे होते थे?
हां, बिल्कुल होते थे. भारत-अमेरिका रक्षा संबंध 2000 के दशक में ही मजबूत होने शुरू हुए थे, खासकर कांग्रेस की यूपीए सरकार (2004-2014) के समय में.
2008 का सिविल न्यूक्लियर डील: मनमोहन सिंह सरकार में अमेरिका के साथ न्यूक्लियर समझौता हुआ, जिसके बाद रक्षा सहयोग तेजी से बढ़ा. इसके बाद अमेरिकी रक्षा अधिकारी और राजनयिक भारत आते रहे.
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कुल मिलाकर, ऐसे विजिट किसी एक सरकार की देन नहीं हैं. यह दोनों देशों की लंबे समय से चली आ रही रक्षा नीति का हिस्सा है. यूपीए सरकार में शुरू हुआ, तो मोदी सरकार में यह और तेज हुआ है.
वर्तमान में क्यों ज्यादा चर्चा?
आजकल सोशल मीडिया पर यह पोस्ट वायरल हो रही है. कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि विदेशी राजदूत को सेना के कमान में जाने की क्या जरूरत? लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि यह सामान्य राजनयिक गतिविधि है. पश्चिमी कमान पंजाब और राजस्थान सेक्टर संभालती है, जो पाकिस्तान सीमा के पास है. इसलिए यह दौरा और भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
अमेरिकी दूतावास का कहना है कि ऐसे विजिट से दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे से सीखती हैं और वैश्विक शांति के लिए साथ काम करती हैं. सर्जियो गोर का यह दौरा भारत-अमेरिका की मजबूत होती दोस्ती का प्रतीक है. ऐसे विजिट न तो नए हैं और न ही किसी एक पार्टी की नीति. यह दोनों देशों की रणनीतिक जरूरत है. भारतीय सेना की गोपनीयता हमेशा सुरक्षित रहती है. ये दौरे सिर्फ सहयोग बढ़ाने के लिए होते हैं.