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पहलगाम आतंकी हमले में कौन सी 5 बड़ी चूक हुई और अब क्या है हमारी तैयारी?

पहलगाम हमले में खुफिया विफलता, सुरक्षा ऑडिट की कमी और रिस्पांस टाइम जैसी 5 बड़ी चूकें रहीं. अब सरकार ऑपरेशन सिंदूर, डिजिटल सर्विलांस और सख्त कूटनीतिक कदमों से सुरक्षा अभेद्य बना रही है ताकि भविष्य में ऐसी घटना न हो.

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पहलगाम में बैसरन में हुए आतंकी हमले के बाद अपने पति के शव के पास बैठी महिला. (File Photo: PTI) 
पहलगाम में बैसरन में हुए आतंकी हमले के बाद अपने पति के शव के पास बैठी महिला. (File Photo: PTI) 

22 अप्रैल 2025 की वो तारीख कश्मीर के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई, जब पहलगाम के शांत और खूबसूरत बैसरन मैदान (Baisaran Meadow) में गोलियों की गड़गड़ाहट ने शांति को भंग कर दिया. इस कायरतापूर्ण हमले में 25 पर्यटकों और एक स्थानीय नागरिक की जान चली गई. 

हमले के बाद देश में गुस्से की लहर दौड़ गई, लेकिन साथ ही हमारी सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े हुए. खुफिया विभाग और गृह मंत्रालय ने बाद में स्वीकार किया कि इस हमले को रोकने में कुछ ऐसी बड़ी चूकें हुईं, जिनका फायदा आतंकियों ने उठाया.   

आज एक साल बाद, जब हम उन जख्मों को याद करते हैं, तो यह जानना जरूरी है कि वो कौन सी 5 बड़ी कमियां थीं और भारत सरकार ने भविष्य में ऐसे हमलों को रोकने के लिए अपनी तैयारी को कैसे बदला है.

1. अर्ली वार्निंग और इंटेलिजेंस इनपुट का अभाव

पहलगाम हमले के बाद हुई सर्वदलीय बैठक में यह बात सामने आई कि सुरक्षा एजेंसियों के पास इस विशिष्ट हमले को लेकर कोई सटीक सूचना नहीं थी. आमतौर पर कश्मीर में बड़े आयोजनों या पर्यटन सीजन के दौरान खुफिया एजेंसियां संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखती हैं, लेकिन इस बार आतंकियों ने लो-प्रोफाइल रणनीति अपनाई.

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Pahalgam terrorist attack
आतंकी हमले के बाद घटनास्थल पर पहुंचे सेना के जवान. (File Photo: PTI) 

किसी भी पूर्व चेतावनी पैटर्न का न होना सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी विफलता साबित हुई. आतंकियों ने एक ऐसे इलाके को चुना जो भारी सुरक्षा घेरे में होने के बावजूद उस समय सॉफ्ट टारगेट बन गया. 

2. तीन-स्तरीय सुरक्षा घेरे में सेंध 

पहलगाम जैसे संवेदनशील पर्यटन स्थल पर हमेशा 'थ्री-टियर' सुरक्षा व्यवस्था का दावा किया जाता है. इसमें स्थानीय पुलिस, अर्धसैनिक बल और सेना की टुकड़ियां शामिल होती हैं. इसके बावजूद, आतंकी न केवल बैसारन मैदान तक पहुंचने में सफल रहे, बल्कि उन्होंने वहां काफी समय बिताया.

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चश्मदीदों के मुताबिक, हमलावरों ने पीड़ितों से उनकी धार्मिक पहचान तक पूछी और फिर उन्हें मौत के घाट उतारा. इतनी लंबी प्रक्रिया के दौरान सुरक्षा बलों का मौके पर तुरंत न पहुंच पाना एक बहुत बड़ी ऑपरेशनल चूक मानी गई.

3. हाइब्रिड टेररिज्म और नए चेहरों की पहचान में देरी

Pahalgam terrorist attack
ये है वो एंट्री गेट जिससे लोग बैसरन के पिकनिक स्पॉट पर जाते हैं. (File Photo: PTI) 

सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती 'हाइब्रिड आतंकियों' की रही है. ये वे आतंकी होते हैं जिनका कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं होता. वे आम नागरिकों की तरह समाज में घुले-मिले रहते हैं. पहलगाम हमले में यह देखा गया कि आतंकियों को स्थानीय भौगोलिक स्थिति की पूरी जानकारी थी. वे आधुनिक हथियारों से लैस थे लेकिन उनकी पहचान पहले से किसी भी वॉच-लिस्ट में नहीं थी. इस नए खतरे को भांपने और उसके अनुरूप रणनीति बनाने में हमारी एजेंसियां पीछे रह गईं.

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4. सुरक्षा ऑडिट और रिस्पांस टाइम की कमी

हमले के बाद के विश्लेषण में पाया गया कि उन क्षेत्रों में नियमित 'सुरक्षा ऑडिट' की कमी थी जहां पर्यटकों की भारी भीड़ होती है. जब हमला शुरू हुआ, तो पहले रिस्पॉन्स और काउंटर-अटैक के बीच जो समय (Response Time) लगा, उसका फायदा उठाकर आतंकी सुरक्षित भाग निकलने में सफल रहे. पहाड़ी इलाका होने के कारण संचार में देरी और तुरंत रीनफोर्समेंट न पहुंच पाना भी एक बड़ी तकनीकी चूक साबित हुई.

Pahalgam terrorist attack
जयपुर की आयुषी पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए पति नीरज उधवानी के शव पर रोती हुई. (File Photo: PTI) 

5. धार्मिक पर्यटन स्थलों और सॉफ्ट टारगेट्स की सुरक्षा में ढिलाई

धारा 370 के हटने के बाद कश्मीर में स्थिति सामान्य होने के दावों के बीच, सुरक्षा का सारा ध्यान बड़े शहरों और मुख्य राजमार्गों पर केंद्रित हो गया. आतंकियों ने इसी का फायदा उठाया और पहलगाम जैसे सॉफ्ट टारगेट को चुना. सुरक्षा एजेंसियों ने शायद यह अनुमान नहीं लगाया था कि आतंकी किसी खुले मैदान में पर्यटकों को निशाना बनाकर सांप्रदायिक तनाव भड़काने की कोशिश करेंगे.   

अब क्या है भारत की नई तैयारी?  

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इन चूकों से सबक लेते हुए भारत सरकार ने अपनी रणनीति को पूरी तरह बदल दिया है. अब सुरक्षा केवल बंदूकों के भरोसे नहीं, बल्कि तकनीक और कूटनीति के मिश्रण पर आधारित है.

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ऑपरेशन सिंदूर 

आतंकी हमले के तुरंत बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया, जिसका उद्देश्य सीमा पार बैठे मास्टरमाइंड्स और आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद करना था. भारतीय सेना ने अपनी जवाबी कार्रवाई में लाहौर और गुजरांवाला के पास स्थित रडार प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया. आतंकियों के लॉन्च पैड्स को तबाह किया. यह संदेश साफ था कि भारत अब केवल डिफेंसिव नहीं रहेगा.

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हमले के बाद एरिया को सिक्योर करती सेना. (File Photo: PTI) 

QR कोड और डिजिटल सर्विलांस

पहलगाम और अन्य पर्यटन स्थलों पर सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए सरकार ने एक क्रांतिकारी कदम उठाया है. अब सभी पर्यटन सेवा प्रदाताओं (घोड़े वाले, गाइड, दुकानदार) के लिए QR कोड आधारित पहचान प्रणाली अनिवार्य की गई है. इससे किसी भी बाहरी या संदिग्ध व्यक्ति को भीड़ में पहचानना आसान हो गया है. पूरे बैसारन और आसपास के इलाकों को आधुनिक हाई-डेफिनिशन CCTV कैमरों और ड्रोन सर्विलांस के दायरे में लाया गया है.   

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पाकिस्तान पर कूटनीतिक और आर्थिक प्रहार

सरकार ने केवल सैन्य ही नहीं, बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी कड़ा रुख अपनाया है...

  • सिंधु जल संधि रोकना: भारत ने 1960 की इस संधि को निलंबित कर पाकिस्तान पर दबाव बढ़ा दिया है.   
  • अटारी-वाघा बॉर्डर बंद: व्यापार और लोगों की आवाजाही पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है.
  • SAARC वीजा निरस्त: पाकिस्तानी नागरिकों के लिए वीजा छूट योजना को खत्म कर दिया गया है.   

पहलगाम हमले ने हमें सिखाया कि शांति के समय भी सतर्कता कम नहीं होनी चाहिए. आज कश्मीर के पर्यटन स्थलों पर सुरक्षा एजेंसियां अधिक चुस्त हैं. स्थानीय पुलिस के साथ बेहतर तालमेल है. तकनीक का इस्तेमाल कर हर संदिग्ध हरकत पर नजर रखी जा रही है. भारत की यह नई तैयारी केवल आतंकियों को रोकने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें यह बताने के लिए भी है कि अब हर चूक की कीमत बहुत भारी होगी.

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