बलोचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, लेकिन यहां दशकों से अलगाववादी आंदोलन चल रहा है. बलोच लोग पाकिस्तानी सरकार पर अपने प्राकृतिक संसाधनों (गैस, खनिज, तेल) का शोषण करने का आरोप लगाते हैं. जुलाई 2026 में बलोच लिबरेशन आर्मी (BLA) और अन्य गुटों के हमलों ने सुरक्षा स्थिति को और बिगाड़ दिया है.
बलोच लिबरेशन आर्मी एक सशस्त्र राष्ट्रवादी संगठन है, जो बलोचिस्तान को पाकिस्तान से अलग कर स्वतंत्र बनाने की मांग कर रहा है. BLA के अनुसार, पाकिस्तानी सरकार बलोचिस्तान के संसाधनों का शोषण कर रही है, लेकिन स्थानीय लोगों को इसका कोई लाभ नहीं मिलता. वे इसे अपनी आजादी की लड़ाई बताते हैं, जबकि पाकिस्तान, अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने BLA को आतंकवादी संगठन घोषित कर रखा है.
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BLA के लड़ाकों की संख्या और संगठन
BLA के लड़ाकों की सटीक संख्या बताना मुश्किल है क्योंकि ये पहाड़ी इलाकों में छिपकर काम करते हैं.2020 में इसके करीब 600 लड़ाके बताए जाते थे, लेकिन 2025-26 तक यह संख्या बढ़कर 3000 के आसपास पहुंच गई है. BLA के अलावा बलोचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (BLF), बलोच नेशनल आर्मी (BNA) जैसे समूह भी सक्रिय हैं.

सभी बलोच अलगाववादी गुटों के कुल लड़ाके 5 से 10 हजार के बीच हो सकते हैं. पाकिस्तानी सेना का दावा है कि उसने हाल के वर्षों में सैकड़ों लड़ाकों को मार गिराया है. ये संगठन सोशल मीडिया के जरिए युवाओं की भर्ती करते हैं. पाकिस्तानी सरकार पर जबरन गायब करने, मानवाधिकार उल्लंघन और शोषण का आरोप लगाते हैं.
BLA की रणनीति: गुरिल्ला युद्ध और हिट-एंड-रन
BLA पाकिस्तानी सेना से सीधे बड़े युद्ध में नहीं उलझती क्योंकि सेना की ताकत बहुत ज्यादा है. इसलिए वह एसिमेट्रिक वॉरफेयर की रणनीति अपनाती है.
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ऑपरेशन हेरोफ (ब्लैक स्टॉर्म) इसका सबसे बड़ा हालिया अभियान है, जिसमें 10 शहरों में हमले किए गए. BLA का दावा है कि 2025 में उसने 521 हमले किए और 1060 से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिक मारे गए.

बलोचिस्तान अशांति के मुख्य कारण
बलोचिस्तान में यह संघर्ष कई गहरी समस्याओं से जन्मा है...
इन सबके कारण स्थानीय असंतोष बढ़ता गया और सशस्त्र आंदोलन मजबूत होता गया.
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इस संघर्ष से बलोचिस्तान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो रही है. CPEC जैसी बड़ी परियोजनाएं प्रभावित हैं, निवेश रुक रहा है और आम लोगों की जिंदगी मुश्किल हो गई है. पाकिस्तानी सेना बड़े ऑपरेशन चला रही है, लेकिन समस्या जड़ से हल नहीं हो पा रही है.
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सैन्य कार्रवाई से यह मुद्दा सुलझेगा नहीं. बलोच लोगों की शिकायतों को सुनना, विकास कार्यों में उन्हें हिस्सेदार बनाना और राजनीतिक बातचीत जरूरी है.