पुणे के चर्चित लोहागढ़ किला मौत मामले में अब जांच उस चट्टान के कुछ फीट हिस्से पर आकर टिक गई है, जहां से 18 जून को 26 वर्षीय केतन अग्रवाल की गिरकर मौत हुई थी. शुरुआती जांच में इसे ट्रैकिंग के दौरान हुआ हादसा माना गया था, लेकिन तीन सप्ताह के भीतर यह मामला कथित हत्या की जांच में बदल गया.
इस मामले में केतन की मंगेतर 20 वर्षीय सिया गोयल और उसके कथित प्रेमी 22 वर्षीय चेतन चौधरी को गिरफ्तार किया गया है. पुणे ग्रामीण पुलिस का आरोप है कि सिया अपनी तय शादी से खुश नहीं थी और चेतन से प्रेम संबंध में थी. इसी वजह से दोनों ने मिलकर केतन की हत्या की साजिश रची और उसे लोहागढ़ किले से नीचे धक्का दे दिया.
पुलिस का दावा क्या है?
पुलिस के मुताबिक, सिया और चेतन ने हत्या की योजना पहले से बनाई थी. जांच में कैफे में हुई मुलाकातों, कथित रिहर्सल और हत्या की एक असफल कोशिश का भी जिक्र किया गया है. पुलिस का कहना है कि दोनों ने योजना के तहत केतन को किले पर ले जाकर नीचे धक्का दिया.
हालांकि फिलहाल यह केवल पुलिस का आरोप है. अदालत में अभी तक इनमें से कोई भी बात साबित नहीं हुई है. सिया गोयल और चेतन चौधरी अभी केवल आरोपी हैं, दोषी नहीं.
अदालत में क्या साबित करना होगा?
किसी भी अदालत में दोष सिद्ध करने के लिए पुलिस को आरोपों से आगे बढ़कर ठोस सबूत पेश करने होंगे. अगर सिया और चेतन के बीच प्रेम संबंध था तो वह केवल हत्या का संभावित कारण यानी मकसद साबित कर सकता है. कैफे में मुलाकातें और कथित रिहर्सल योजना का संकेत दे सकती हैं. मोबाइल फोन रिकॉर्ड, बातचीत, कपड़े, सीसीटीवी फुटेज, लोकेशन डेटा और घटना के बाद दोनों का व्यवहार भी जांच की कड़ी मजबूत कर सकते हैं.
लेकिन अदालत में सबसे अहम सवाल यही रहेगा कि केतन खुद फिसला, संतुलन बिगड़ने से गिरा या फिर किसी ने जानबूझकर उसे धक्का दिया. जब तक पुलिस इस सवाल का स्पष्ट और विश्वसनीय जवाब नहीं दे देती, तब तक पूरी कहानी अधूरी मानी जा सकती है.
पुलिस के पास सबसे बड़ी कमी क्या है?
मामले की जांच के दौरान पुणे ग्रामीण पुलिस ने नार्को या लाइ डिटेक्टर टेस्ट की अनुमति मांगते हुए अदालत में जो आवेदन दिया था, उसमें कथित तौर पर यह स्वीकार किया गया कि उनके पास ऐसा कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं है जिसने धक्का देते हुए देखा हो. पुलिस के पास ऐसा कोई निर्णायक सबूत भी नहीं है जिससे यह निश्चित रूप से साबित हो सके कि केतन को किसने धक्का दिया.
पुलिस ने अदालत में यह जरूर कहा कि उसके पास सिया और चेतन के कथित स्वीकारोक्ति बयान हैं. लेकिन भारतीय कानून में पुलिस हिरासत में दिए गए स्वीकारोक्ति बयान सामान्य तौर पर अदालत में स्वीकार्य साक्ष्य नहीं माने जाते.
वरिष्ठ वकील ने क्या कहा?
वरिष्ठ अधिवक्ता तनवीर अहमद मीर, जिन्होंने आरुषि-हेमराज हत्याकांड में इलाहाबाद हाई कोर्ट में राजेश और नूपुर तलवार की ओर से पैरवी की थी, उनका कहना है कि पुलिस हिरासत में दिए गए स्वीकारोक्ति बयान कानूनी रूप से भरोसेमंद नहीं होते.
उनका कहना है कि अदालतें जनभावना के आधार पर फैसला नहीं करतीं. बाहर लोगों की राय कुछ भी हो सकती है, लेकिन अदालत केवल यह देखती है कि अभियोजन पक्ष क्या साबित कर पाया है. मीर के अनुसार यह पूरा मामला मुख्य रूप से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित दिखाई देता है, और ऐसे मामलों में अभियोजन पक्ष को हर कड़ी बिना किसी कमजोरी के जोड़नी पड़ती है.
परिस्थितिजन्य साक्ष्य में क्या है कानून?
भारतीय कानून में हत्या साबित करने के लिए प्रत्यक्षदर्शी या वीडियो होना जरूरी नहीं है. केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर भी दोष सिद्ध किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए सबूतों की पूरी श्रृंखला मजबूत और बिना किसी टूटन के होनी चाहिए.
साल 1952 में सुप्रीम कोर्ट ने 'हनुमंत बनाम मध्य प्रदेश राज्य' मामले में कहा था कि केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. इसके बाद 1984 में 'शरद बिर्धिचंद सरडा बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के लिए पांच महत्वपूर्ण सिद्धांत तय किए, जिन्हें 'पंचशील सिद्धांत' कहा जाता है.
इन सिद्धांतों के अनुसार हर परिस्थिति पूरी तरह साबित होनी चाहिए, सभी परिस्थितियां केवल आरोपी की ओर ही इशारा करें, वे निर्णायक हों, किसी दूसरे उचित संभावित कारण को पूरी तरह खत्म करें और सभी कड़ियां मिलकर ऐसी श्रृंखला बनाएं जिसमें आरोपी के निर्दोष होने की कोई उचित संभावना न बचे. तनवीर मीर इसे 'अटूट श्रृंखला' बताते हैं. उनके मुताबिक अभियोजन पक्ष केवल यह नहीं कह सकता कि कई बातें संदिग्ध हैं. उसे हर महत्वपूर्ण तथ्य साबित कर अगले तथ्य से मजबूती से जोड़ना होगा.
आरुषि-हेमराज मामला क्यों दिया जा रहा उदाहरण?
मीर का कहना है कि आरुषि-हेमराज हत्याकांड इस तरह के मामलों का सबसे बड़ा उदाहरण है. वर्ष 2013 में सीबीआई की विशेष अदालत ने राजेश और नूपुर तलवार को दोषी ठहराया था, लेकिन 2017 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया.
हाई कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला स्थापित नहीं कर पाया. यह भी निर्णायक रूप से साबित नहीं हो सका कि घर में कोई बाहरी व्यक्ति प्रवेश नहीं कर सकता था. साथ ही हत्या में इस्तेमाल हथियार को लेकर भी संदेह बना रहा.
बचाव पक्ष ने यह संभावना भी रखी कि पहले संदिग्ध रहे कृष्णा थडराई भी हत्या कर सकते थे. बचाव पक्ष को यह साबित नहीं करना था कि हत्या उसी ने की, बल्कि केवल इतना दिखाना था कि दूसरी संभावना भी मौजूद है. यही उचित संदेह पैदा करने के लिए पर्याप्त माना गया.
पुणे मामले में अदालत किन बातों पर ध्यान दे सकती है?
अब पुणे ग्रामीण पुलिस को अपनी हर दलील अदालत में साक्ष्यों के जरिए साबित करनी होगी. सिया का कथित असंतोष हत्या का मकसद साबित कर सकता है. चेतन के साथ कथित संबंध, कैफे में मुलाकातें और रिहर्सल साजिश की ओर इशारा कर सकते हैं. फोन रिकॉर्ड, चैट, सीसीटीवी और लोकेशन डेटा यह दिखाने की कोशिश करेंगे कि हत्या की योजना पहले से बनाई गई थी.
इसके अलावा घटना के बाद दोनों का व्यवहार भी महत्वपूर्ण रहेगा. क्या उन्होंने तुरंत मदद बुलाई? क्या शोर मचाया? क्या वे मौके पर रुके या वहां से चले गए? क्या उन्होंने केतन के परिवार को गुमराह किया? क्या कपड़े छिपाए गए? क्या चैट मिटाई गई या फोन बंद किए गए? ये सभी बातें अदालत में जांच का हिस्सा बन सकती हैं.
लेकिन ये सभी परिस्थितियां केवल श्रृंखला को मजबूत करेंगी. केवल मकसद हत्या साबित नहीं करता. केवल योजना हत्या साबित नहीं करती. घटना के बाद झूठ बोलना भी अपने आप हत्या का प्रमाण नहीं बन जाता.
सबसे बड़ा सवाल अब भी वही
तनवीर मीर का मानना है कि सबसे महत्वपूर्ण सवाल वही चट्टान होगी, जहां से केतन गिरा. अदालत यह भी देख सकती है कि वहां की ढलान कैसी थी, किनारा कितना खतरनाक था, वहां तक पहुंचने का रास्ता कैसा था, केतन ने किस तरह के जूते पहने थे, शरीर किस दिशा में गिरा, चोटें कैसी थीं और क्या सामान्य परिस्थितियों में वहां से फिसलकर गिरना संभव था.
कानूनी रूप से सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या केतन खुद गिरा था या उसे धक्का दिया गया था. अगर धक्का दिया गया तो क्या वह जानबूझकर हत्या करने के इरादे से दिया गया था या किसी बहस या हाथापाई के दौरान हादसे में ऐसा हुआ.
यही वजह है कि इस पूरे मामले का फैसला केवल पुलिस के दावों से नहीं होगा. अदालत में अभियोजन पक्ष को हर उचित संभावना को खारिज करते हुए यह साबित करना होगा कि केतन की मौत केवल और केवल जानबूझकर दिए गए धक्के की वजह से हुई.
इसलिए लोहागढ़ किले की वही कुछ फीट चट्टान इस पूरे मुकदमे का सबसे महत्वपूर्ण सबूत बन सकती है. सुर्खियां भले अपनी राय बना चुकी हों, लेकिन अदालत केवल सबूतों के आधार पर ही फैसला सुनाएगी.