भारतीय शेयर बाजार (Share Market) में कारोबारी हफ्ते के आखिरी दिन भूचाल देखने को मिला. वैसे गिरावट का सिलसिला पिछले कई महीनों से चल रहा है, शुक्रवार को सेंसेक्स 1,092 अंक गिरकर बंद हुआ. जबकि निफ्टी में साढ़े 300 अंकों से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई. निवेशकों को समझ में नहीं आ रहा है, अब आगे क्या होगा? क्योंकि निफ्टी की चाल को देखें को दो साल में जहां से चले थे, वहीं पहुंच गए.
दरअसल निफ्टी- 50 लगातार बिकवाली के दबाव में टूटकर 23,500 के स्तर के करीब पहुंच गया है. सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात यह है कि जून 2024 में भी निफ्टी इसी 23,500 के स्तर के आसपास ट्रेड कर रहा था, इसका सीधा मतलब यह है कि पिछले दो साल में बाजार का रिटर्न लगभग शून्य यानी फ्लैट रहा है और इस दौरान निवेशकों के हाथ पूरी तरह खाली रहे हैं.
जून 2024 में जब लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद बाजार में स्थिरता आई थी, तब निफ्टी ने पहली बार 23,500 अंक के ऐतिहासिक स्तर को छुआ था. उस समय निवेशकों में भारी उत्साह था और उम्मीद थी कि बाजार यहां से एक नई छलांग लगाएगा. बाद के महीनों में बाजार ने रफ्तार पकड़ी भी और नए शिखर छुए, निफ्टी 26400 अंक तक गया, लेकिन 2026 के मध्य तक आते-आते सारी बढ़त हवा हो गई. मई के आखिरी कारोबारी दिन निफ्टी वापस दो साल के अपने पुराने ठिकाने पर लौटकर आ खड़ा हुआ है.
अब जब दो साल से निफ्टी एक ही दायरे में है, तो फिर बेहतरीन रिटर्न की उम्मीद कैसे कर सकते हैं, जब इंडेक्स नहीं चलेगा, तो इसका असर हर निवेशक के पोर्टफोलियो पर दिखेगा. खासकर पिछले दो साल बाजार के इक्विटी मार्केट में निवेश करने वाले निवेशक हो, या फिर म्यूचुअल फंड के निवेशक, हर किसी को नुकसान उठाना पड़ा है.
जिन निवेशकों ने जून 2024 में या उसके बाद बाजार में पैसा लगाया था, उनका पोर्टफोलियो आज दो साल बाद भी जस का तस या घाटे में नजर आ रहा है. जब भी थोड़ा संभालता है, तो ऊपरी स्तरों पर भारी मुनाफावसूली देखने को मिलता है. शुक्रवार को भारी गिरावट की वजह से निवेशकों को 5.50 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ.
बाजार दो साल से एक दायरे में
बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले दो साल से इंडेक्स सुस्त रहने का मुख्य कारण विदेशी निवेशकों (FIIs) की बिकवाली रहा है, विदेशी संस्थागत निवेशक लगातार भारतीय बाजार से अपना पैसा निकाल रहे हैं. वैश्विक स्तर पर अन्य उभरते बाजारों (जैसे चीन या अन्य देश) के मुकाबले भारत की अर्निंग ग्रोथ थोड़ी धीमी रहने की आशंका से विदेशी फंड लगातार आउटफ्लो कर रहे हैं.
महंगे वैल्यूएशन और कमजोर कॉर्पोरेट नतीजे
पिछले कुछ तिमाहियों में भारत की दिग्गज कंपनियों के वित्तीय नतीजे बाजार की उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहे हैं. जब कंपनियों का मुनाफा नहीं बढ़ा और शेयरों के दाम आसमान पर थे, तो बाजार में प्राइस करेक्शन होना लाजिमी था. इस बीच दुनिया भर में चल रहे युद्ध और तनाव के माहौल ने भी भारतीय बाजार पर दबाव बढ़ाया है. खासकर क्रूड ऑयल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने सेंटिमेंट को लगातार खराब किया है.