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US Oil Politics: अमेरिका का 'साइलेंट' खेल, 50 साल तक चला... खाड़ी देश एक-एक कर बोल्ड, फिर खुद बन गया विनर

Geopolitics of Oil: जब अमेरिका का तेल प्रोडक्शन तेजी से आगे बढ़ रहा था, तो उस दौरान खाड़ी देश आपस में ही लड़ने लगे. तमाम आलोचक और राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि मध्य पूर्व में अस्थिरता के पीछे अमेरिका की पर्दे के पीछे की नीतियों की बड़ी भूमिका रही है. 

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कभी तेल के तरस गया था अमेरिका. (Photo: AI Generated)
कभी तेल के तरस गया था अमेरिका. (Photo: AI Generated)

वैश्विक राजनीति में एक पुरानी कहावत है, 'जो ऊर्जा को नियंत्रित करता है, वही पूरी दुनिया पर राज करता है.' इसी कड़ी में तेल को लेकर वर्चस्व की लड़ाई पिछले 5 दशक में काफी दिलचस्प रही है. 1970 के दशक में जिस तेल के लिए अमेरिका तरस रहा था. आज वहीं अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक बन चुका है, जबकि कभी तेल को हथियार बनाने वाले खाड़ी देश आज खुद चौतरफा संकटों से घिरे हैं. 

दरअसल, 50 साल पहले जो तेल अमेरिका की सबसे बड़ी कमजोरी थी, आज वही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है. खाड़ी देशों की आपसी लड़ाई, अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान-इराक के तेल बाजारों से बाहर होने और अमेरिका की अपनी 'शेल क्रांति' ने मिलकर एक ऐसा चक्रव्यूह रचा, जिससे अमेरिका आज वैश्विक ऊर्जा बाजार का विजेता बनकर उभरा है. अब खाड़ी देश संकट में हैं, और संकटमोचक की भूमिका में वही अमेरिका खड़ा है, जिसे कभी उन्होंने तेल के लिए तरसाया था.

1973 का वो झटका, जिसने अमेरिका को डरा दिया
इतिहास सबूत दे रहा है कि अमेरिका की तेल नीति ने पूरी बाजी ही पलट डाली, बात अक्टूबर 1973 की है. अरब और इजरायल के बीच योम किप्पुर युद्ध छिड़ा हुआ था. अमेरिका ने खुले तौर पर इजरायल की मदद की. इससे नाराज होकर ओपेक के अरब सदस्यों ने अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को तेल निर्यात करने पर बैन लगा दिया. इस फैसले ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को आर्थिक तौर हिला दिया था. अमेरिका में तेल की कीमतें चार गुना बढ़ गईं. पेट्रोल पंपों पर लंबी-लंबी कतारें लग गईं, फैक्ट्रियां बंद होने लगीं और देश में हाहाकार मच गया. 

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पिछले 50 वर्षों में अमेरिका की 'साइलेंट' तैयारी
इस घटना ने अमेरिका के अहंकार को तोड़ दिया और उसे समझ आ गया कि जब तक वह तेल के लिए मिडिल-ईस्ट पर निर्भर रहेगा, उसकी महाशक्ति की गद्दी हमेशा खतरे में रहेगी. इस डर के बाद अमेरिका ने एक लंबी अवधि की रणनीति पर काम करना शुरू किया. अमेरिका ने भविष्य के संकटों से निपटने के लिए जमीन के नीचे तेल का 'इमरजेंसी बैकअप' बनाना शुरू किया. इसके अलावा शेल क्रांति अमेरिका के लिए सबसे बड़ा गेम-चेंजर साबित हुआ. अमेरिका की धरती के नीचे 'शेल चट्टानें' थीं, जिनमें भारी मात्रा में तेल और गैस छिपी थी, लेकिन इसे निकालना बहुत महंगा और कठिन था. अमेरिका ने दशकों तक नई तकनीकों पर अरबों डॉलर खर्च किए. मेहनत रंग लाई और 2000 के दशक के अंत तक अमेरिका ने चट्टानों को तोड़कर तेल निकालने में महारत हासिल कर ली. 

खाड़ी देशों की आपसी जंग और अमेरिकी प्रतिबंध
तकनीक के आते ही अमेरिका में तेल का प्रोडक्शन इतनी तेजी से बढ़ा कि उसने रूस और सऊदी अरब दोनों को पीछे छोड़ दिया. साल 2015 में अमेरिका ने अपने 40 साल पुराने तेल निर्यात प्रतिबंध को खत्म कर दिया और दुनिया को तेल बेचना शुरू कर दिया. इस बीच जब अमेरिका का तेल प्रोडक्शन तेजी से आगे बढ़ रहा था, तो उस दौरान खाड़ी देश आपस में ही लड़ने लगे. तमाम आलोचक और राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि मध्य पूर्व में अस्थिरता के पीछे अमेरिका की पर्दे के पीछे की नीतियों की बड़ी भूमिका रही है. 

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खाड़ी के दो सबसे बड़े तेल उत्पादक ईरान और इराक दशकों तक युद्ध और प्रतिबंधों की आग में झुलसते रहे. 1980 के दशक में दोनों के बीच 8 साल तक खूनी जंग चली. इसके बाद 1990 और 2003 में इराक पर अमेरिकी हमलों ने उसके तेल बुनियादी ढांचे को पूरी तरह तबाह कर दिया. अमेरिका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम का हवाला देकर उस पर इतने कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए कि ईरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपना तेल खुलकर बेच ही नहीं पाया. 

शिया-सुन्नी के बीच वर्चस्व की लड़ाई 
ईरान-इराक को करीब से जानने वाले बताते हैं कि इन दोनों के बीच दुश्मनी को कम करने के लिए अमेरिका ने कभी भी ईमानदारी से प्रयास नहीं किया. जिससे वर्षों तेल के इस गढ़ में तनाव बना रहा. सऊदी अरब को सुरक्षा का भरोसा देकर अमेरिका ने उसे अपना सहयोगी बनाए रखा, जिससे ओपेक कभी दोबारा 1973 जैसा एकजुट होकर अमेरिका के खिलाफ कड़ा फैसला नहीं ले पाया. 

जानकार बताते हैं कि पिछले 5 दशकों में अमेरिका की नीतियों ने अप्रत्यक्ष रूप से खाड़ी देशों को कमजोर किया और खुद को मजबूत बनाया. अमेरिका ने इराक पर सैन्य कार्रवाई की और ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए. इसका नतीजा यह हुआ कि ये दोनों बड़े तेल उत्पादक देश वैश्विक बाजार से लगभग बाहर हो गए या उनका इंफ्रास्ट्रक्चर तबाह हो गया. 

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मौजूदा दौर के लिए कौन जिम्मेदार?
मौजूदा समय में हालात बिल्कुल बदल चुके हैं. मध्य पूर्व में तनाव चरम पर है. ईरान और अमेरिका के बीच सैन्य टकराव के चलते रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' जहां से दुनिया का 20% तेल गुजरता है, तनाव की वजह से ये रूट बाधित है. अगर यह संकट 1973 में हुआ होता, तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह ठप हो जाती. लेकिन आज इसका सबसे बड़ा फायदा अमेरिका को मिल रहा है.

अगर भारत के नजरिये से देखें तो हम अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करते हैं, इसलिए वैश्विक ऊर्जा बाजार में होने वाली हर हलचल का सीधा असर हमारी जेब और देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. भारत मुख्यतौर पर तेल के लिए खाड़ी देश इराक, सऊदी अरब और यूएई पर निर्भर रहा है. लेकिन मौजूदा संकट ने भारत को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है. आपूर्ति बनाए रखने के लिए भारतीय रिफाइनरियों ने अब अमेरिका और रूस से तेल का आयात रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ा दिया है. अमेरिका से तेल मंगाने में जहाजों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है. इससे जहाजों का किराया और बीमा लागत काफी बढ़ गया है, जिससे तेल भारत पहुंचते-पहुंचते महंगा हो रहा है. अमेरिका का तेल राजा बनना भारत को पूरी तरह तबाह होने से तो बचा रहा है, लेकिन मध्य पूर्व की आग भारत की आर्थिक रफ्तार को धीमा जरूर कर रही है.

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