पश्चिम बंगाल सरकार ने लम्बे इंतजार के बाद औद्योगिक नीति का मसौदा पेश कर दिया. नीति में श्रम साध्य क्षेत्र सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यमों (एमएसएमई) के टिकाऊ विकास को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखा गया है.
राज्य सरकार ने शनिवार को यह मसौदा अपनी वेबसाइट पर डाला और औद्योगिक प्रतिनिधि संगठनों तथा कारोबारी जमात से सुझाव मांगे. सरकार ने कहा है कि नीति के मसौदे में नए निवेशकों को कई तरह के प्रोत्साहन देने की व्यवस्था की गई है और मुख्य ध्यान सरकारी-निजी भागीदारी (पीपीपी) के माध्यम से राज्य में औद्योगिक पार्को तथा केद्रों का विकास करना है.
औद्योगिक लॉबियों ने हालांकि कहा कि मसौदा नीति भूमि अधिग्रहण और भू-हदबंदी जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चुप है, जो समस्या की मुख्य जड़ है.
बंगाल नेशनल चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के सचिव डी.पी. नाग ने कहा, 'औद्योगिक नीति के मसौदे में भूमि अधिग्रहण और भू-हदबंदी जैसे प्रमुख मुद्दों पर कुछ नहीं कहा गया है. इसमें भूमि के (कृषि भूमि से औद्योगिक भूमि में) बदलाव के बारे में भी कुछ नहीं कहा गया है.'
नीति के मिशन बयान के मुताबिक सरकार विनिर्माण क्षेत्र की विकास दर 2010-11 के 4.7 फीसदी से बढ़ाकर नीति की पूर्णता के वर्ष में 20 फीसदी करना चाहती है और 2013-14 में 13.14 लाख लोगों के लिए रोजगार का सृजन करना चाहती है और आगे भी यह गति बनाए रखना चाहती है.
सरकार ने कहा कि नीति में मनोरंजन, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भी तेज विकास का लक्ष्य रखा गया है.
औद्योगिक नीति के मसौदे की घोषणा करते हुए शनिवार को उद्योग मंत्री पार्था चटर्जी ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा है कि नई औद्योगिक नीति पर सरकार शीघ्र ही दस्तावेज प्रकाशित करेगी.
नई नीति इस साल जनवरी में ही पेश की जाने वाली थी. चटर्जी ने कहा कि नई नीति तैयार किए जाने से पहले सरकार ने 10 अन्य राज्यों की औद्योगिक नीतियों का अध्ययन और विश्लेषण किया. उन्होंने कहा कि सरकार 30 जून तक उद्योग जगत के सुझावों का इंतजार करेगी और यदि कोई सुझाव व्यावहारिक लगा तो उसे अंतिम नीति में शामिल किया जाएगा.
ममता बनर्जी सरकार ने अपने कार्यकाल के दो वर्ष पूरे होने के दो दिन पहले नई नीति का मसौदा जारी किया है. इससे पहले 1994 में तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने ओद्योगिक नीति की घोषणा की थी. स्वर्गीय ज्योति बसु उस वक्त मुख्यमंत्री थे.