जब हम घर की कल्पना करते हैं, तो हमारे मन में मजबूती, सुकून और सुविधा की एक तस्वीर उभरती है, लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि सात समंदर पार अमेरिका और हमारे भारत के घरों में जमीन-आसमान का अंतर है. भारत में जहां घर 'पुश्तैनी विरासत' और 'ईंट-पत्थर की मजबूती' का प्रतीक हैं, वहीं अमेरिका में इन्हें 'आधुनिक इंजीनियरिंग' और 'प्लग-एंड-प्ले सुविधा' के तौर पर देखा जाता है.
निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री से लेकर किचन की बनावट तक इन दोनों देशों की जीवनशैली और भौगोलिक परिस्थितियों ने घरों के ढांचे को पूरी तरह बदल दिया है. जानते हैं कि भारतीय और अमेरिकी घरों के बीच वे कौन से बड़े अंतर हैं, जो इन दोनों दुनियाओं को एक-दूसरे से बिल्कुल अलग बनाते हैं.
भारत में घर बनाना एक लंबी अवधि का निवेश और पीढ़ियों की विरासत माना जाता है, इसलिए यहां कंक्रीट, ईंट और सीमेंट जैसी भारी सामग्रियों को प्राथमिकता दी जाती है. यह सामग्रियां भारत की भीषण गर्मी और मानसूनी बारिश को सहने में सक्षम हैं, क्योंकि कंक्रीट का उच्च 'थर्मल मास' तापमान को नियंत्रित रखता है. इसके विपरीत, अमेरिका में लकड़ी के प्रचुर भंडार और वहां की ठंड को देखते हुए लकड़ी और ड्राईवॉल का उपयोग किया जाता है. लकड़ी एक प्राकृतिक इंसुलेटर है, जो फाइबरग्लास जैसे इंसुलेशन के साथ मिलकर कड़ाके की ठंड में घर के अंदर की गर्मी को बरकरार रखती है.
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निर्माण की प्रक्रिया में भी एक बड़ा अंतर समय और श्रम लागत का है. अमेरिका में 'लेबर कॉस्ट' बहुत अधिक होने के कारण लकड़ी के ढांचे और ड्राईवॉल का उपयोग किया जाता है, क्योंकि इन्हें काटना, जोड़ना और स्थापित करना कंक्रीट की तुलना में बहुत तेज और सस्ता होता है. जहां भारत में कंक्रीट का ढांचा बनाने में महीनों का समय और भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है, वहीं अमेरिका में लकड़ी के 'प्री-फैब्रिकेटेड' ढांचे कुछ ही हफ्तों में खड़े किए जा सकते हैं.
हालांकि, लकड़ी के घर आग और दीमक के प्रति संवेदनशील होते हैं, लेकिन उनका लचीलापन उन्हें भूकंप के झटकों के प्रति अधिक सुरक्षित बनाता है. भारत में घर मजबूती और स्थायित्व पर केंद्रित हैं, तो अमेरिका में इनका निर्माण सुविधा, गति और ऊर्जा दक्षता को ध्यान में रखकर किया जाता है.
किचन का ' मॉडल
भारत और अमेरिका में अपार्टमेंट्स के हैंडओवर के तरीकों में यह अंतर वहां के रियल एस्टेट मार्केट की परिपक्वता और उपभोक्ता की जीवनशैली को दर्शाता है. भारत में जब कोई खरीदार फ्लैट लेता है, तो वह उसे अपनी पसंद और वास्तु के अनुसार ढालना चाहता है, यही कारण है कि बिल्डर अक्सर किचन को 'शेल' रूप में छोड़ देते हैं, ताकि खरीदार अपनी पसंद का पत्थर, लकड़ी का रंग और चिमनी का ब्रांड चुन सके. इसके विपरीत, अमेरिका में अपार्टमेंट्स 'प्लग एंड प्ले' मॉडल पर काम करते हैं.
वहां माना जाता है कि घर में प्रवेश करते ही वह पूरी तरह वर्किंग होना चाहिए, इसलिए किचन के सभी उपकरण पहले से ही बिल्डर या लैंडलॉर्ड की जिम्मेदारी होते हैं. वहीं भारतीय घरों में अलमारियां अलग से बनवाई जाती हैं जो कमरे का काफी स्पेस लेती हैं, अमेरिका में 'अलमारियां दीवार के अंदर बनी होती हैं, जिन्हें 'बिल्ट इन स्टोरेज कहा जाता है, इससे कमरे का फर्श पूरी तरह खाली रहता है.
भारत में हम वॉशिंग मशीन के लिए बालकनी या किचन के पास 'वॉश एरिया' का उपयोग करते हैं और कपड़े बाहर सुखाने को प्राथमिकता देते हैं अमेरिका में लगभग हर फ्लैट में इन-यूनिट वॉशर और ड्रायर होता है, कपड़ों को बाहर सुखाने का चलन सामाजिक रूप से बहुत कम है.
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कैसे मेंटेन होता है तापमान
भारत और अमेरिका के घरों में तापमान बनाए रखने का तरीका बहुत अलग है. भारत में हम ज़रूरत के हिसाब से कमरे में अलग से स्प्लिट या विंडो एसी लगाते हैं ताकि बिजली बचा सकें और केवल वही हिस्सा ठंडा रहे, जहां हम मौजूद हैं. इसके उलट, अमेरिका में 'सेंट्रल एचवीएसी' (HVAC) सिस्टम होता है, जो घर के निर्माण के समय ही दीवारों के अंदर फिट कर दिया जाता है. एक ही थर्मास्टेट से पूरे घर को एक साथ ठंडा या गर्म किया जा सकता है, जिससे हर कोने में तापमान एक समान बना रहता है. भारत में यह एक अलग से लगने वाला उपकरण है, जबकि अमेरिका में यह घर की बुनियादी सुविधा का हिस्सा है.
भारत और अमेरिका में बाथरूम की गिनती और उनके उपयोग का तरीका काफी अलग है. भारत में आमतौर पर फ्लैटों को बाथरूम की संख्या के आधार पर देखा जाता है, जैसे एक 2BHK घर में दो पूरे बाथरूम होते हैं. इसके विपरीत, अमेरिका में बाथरूम को '1.5' या '2.5' जैसी श्रेणियों में गिना जाता है.