कतारों में खड़ी गगनचुंबी इमारतें, कांच से चमकते आलीशान मॉल्स, हाई-टेक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और बड़े-बड़े नामी स्कूल-अस्पताल. दूर से देखिए तो लगता है कि आप यूरोप के किसी शहर में आ गए हैं. बिल्डरों ने यहां सिंगापुर जैसी लाइफस्टाइल का सपना बेचकर लाखों लोगों को बसा तो दिया, लेकिन आज इस शहर की पहचान इसकी चमचमाती गगनचुंबी इमारतों से नहीं, बल्कि सड़कों पर लगने वाले उस 'महाजाम' से है, जो रोज सुबह-शाम यहां के नागरिकों के सब्र का इम्तिहान लेता है.
जिस रफ्तार से यहां की आबादी 4 से 5 लाख के पार पहुंच चुकी है, उसके मुकाबले यहां का इंफ्रास्ट्रक्चर आज भी बैलगाड़ी की स्पीड से चल रहा है. हर सुबह जब लोग अपने लाखों-करोड़ों के फ्लैट्स से ऑफिस जाने के लिए निकलते हैं, तो उनका सामना गाड़ियों की लंबी कतारों से होता है, जो मिनटों के सफर को घंटों में तब्दील कर देता है. इस इलाके में गाड़ियां बढ़ गईं, लोग बढ़ गए, लेकिन सड़कें वैसी की वैसी ही संकरी रह गईं. नतीजा हर सुबह और शाम का भयानक महाजाम!

सेक्टर 18 में एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करने वाले रोहित उस दिन को कोसते हैं जब उन्होंने नोएडा एक्सटेंशन में अपने लिए घर खरीदा था. वो कहते हैं- 'यहां घर लेकर जिंदगी की सबसे बड़ी गलती कर दी, ऑफिस की दूरी महज आधे घंटे की है, लेकिन कभी एक घंटे तो कभी डेढ़ घंटे तक लग जाते हैं. पता ही नहीं चलता कब जाम लग जाएगा. हर दिन ऑफिस में लेट पहुंचने पर बॉस की बातें सुननी पड़ती हैं और शाम को जब घर जाकर सुकून से रहने का मौका होता है, तो हम लोग घंटों तक जाम में फंसे रहते हैं'.
ये कहानी ग्रेटर नोएडा वेस्ट में रहने वाले हर उस शख्स की है जो रोजाना अपने दफ्तर के लिए निकलता है. 8-9 घंटे की ड्यूटी के साथ रोज ढाई से तीन घंटे का जाम झेलना यहां के लोगों के लिए आम बात हो गई है, वो भी अगर ऑफिस नोएडा के अंदर है तब. अगर कोई दिल्ली या गुरुग्राम से आवाजाही करता है तो उसकी आफत और भी बढ़ जाती है.
पर्थला और गौर चौक: इंजीनियरिंग फेल्योर या अधूरी प्लानिंग?
इस पूरे महाजाम की सबसे कमजोर कड़ी है पर्थला गोलचक्कर से लेकर गौर चौक तक का पैच. पर्थला फ्लाईओवर बनने के बाद दावा किया गया था कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा वेस्ट के बीच की दूरी खत्म हो जाएगी, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है. फ्लाईओवर से उतरते ही ट्रैफिक सीधे गौर चौक के भयानक बॉटलनैक में जाकर फंस जाता है.
पर्थला फ्लाईओवर से उतरकर गौर चौक की तरफ जाने वाली सड़क वैसे तो कहने को तीन लेन की है, लेकिन पीक ऑवर्स में इन तीनों लेन पर वाहनों का ऐसा रेला उमड़ता है कि सड़क छोटी पड़ जाती है. तीन लेन की क्षमता होने के बावजूद, ऑफिस टाइमिंग पर हजारों गाड़ियों का दबाव इस कदर हावी रहता है कि तीनों लेन पूरी तरह चोक हो जाती हैं. वहां से गुजरने वाली हर छोटी-बड़ी गाड़ी एक-दूसरे से सटकर रेंगने को मजबूर होती है, जिससे यह पूरा तीन लेन का स्ट्रेच एक बड़े और अंतहीन पार्किंग लॉट में तब्दील हो जाता है.
प्रशासन ने इस दबाव को कम करने के लिए जगह-जगह यू-टर्न बना दिए हैं, लेकिन स्थानीय निवासियों और ट्रैफिक एक्सपर्ट्स का मानना है कि सिर्फ यू-टर्न बनाना इस गंभीर समस्या का कोई स्थाई समाधान नहीं है. ट्रैफिक को कभी इधर तो कभी उधर मोड़ने से सिर्फ जाम की लोकेशन बदलती है, समस्या खत्म नहीं होती. ग्रेटर नोएडा वेस्ट को आज जुगाड़ के यू-टर्न्स की नहीं, बल्कि एक बेहद मजबूत और वैज्ञानिक ट्रैफिक मैनेजमेंट प्लान की जरूरत है, जिसमें लेन डिसिप्लिन और सिस्टमैटिक मर्जिंग पॉइंट्स शामिल हों.

गौर चौक पर लगता है सबसे ज्यादा जाम
नोएडा एक्सटेंशन का गौर चौक और एक मूर्ति चौक ये वो दो नाम हैं, जो सुबह-शाम दफ्तर आने-जाने वाले लाखों नौकरीपेशा लोगों के लिए किसी डरावने सपने से कम नहीं हैं. वैसे तो यहां के ट्रैफिक को रफ्तार देने के लिए अंडरपास का निर्माण शुरू किया गया था, लेकिन आज यही प्रोजेक्ट लोगों के लिए सबसे बड़ी आफत बन चुका है. निर्माण कार्य के चलते जगह-जगह हुई बेतरतीब खुदाई, सड़कों पर बिखरा पड़ा मलबा और चारों तरफ उड़ती धूल ने यहां से गुजरने वालों की परेशानी को कई गुना बढ़ा दिया है.
पिछले करीब एक साल से ज्यादा समय से यहां के लाखों निवासी इस अंडरपास के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन उन्हें सिर्फ 'तारीख पर तारीख' मिल रही है. पर्थला फ्लाईओवर से आने वाला ट्रैफिक तेजी से नीचे उतरता है, तो दूसरी तरफ आगे इसी अधूरे पड़े अंडरपास के मलबे और संकरी हो चुकी सड़कों के कारण पूरा ट्रैफिक वहीं ठहर जाता है. यह अधूरा प्रोजेक्ट राहत देने के बजाय इस पूरे स्ट्रेच के लिए एक बड़ा 'स्पीड ब्रेकर' बन चुका है.

ट्रैफिक पुलिस भी परेशान
पीक ऑवर्स में यहां लगने वाला भयंकर महाजाम लोगों के लिए सिर दर्द बन गया है. लेकिन सवाल है कि आखिर इस महाजाम की मुख्य वजह क्या है? और इस भयंकर दबाव को संभालने के लिए पीक ऑवर्स में जमीन पर कितनी ट्रैफिक पुलिस तैनात रहती है. इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने और ये जानने के लिए कि आखिर यहां रहने वाले लाखों लोगों को इस जाम से कब मुक्ति मिलेगी जब aajtak.in ने इस बदहाली को लेकर ट्रैफिक विभाग से बात की, तो उनका कहना था, "हम हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठे हैं, लोगों को निकलने का रास्ता देने के लिए हम लगातार काम कर रहे हैं. दबाव कम करने के लिए ग्रीन बेल्ट पर रोड बनाकर गाड़ियों को निकालने का अस्थाई रास्ता तैयार किया गया है."
नाम न छापने की शर्त पर एक अधिकारी ने बताया- 'लोगों से ज्यादा परेशान तो हम लोग हैं, इस इलाके में रोजाना करीब डेढ़ लाख गाड़ियां गुजरती हैं और उन्हें संभालने की जिम्मेदारी सिर्फ 8 लोगों के जिम्मे है. सबसे बड़ी वजह है कि जब सड़कें कम होंगी और गाड़ियां ज्यादा तो जाम तो लगेगा ही, ऊपर से अंडरपास का काम होने की वजह से जगह-जगह खुदाई कर दी गई है जिसकी वजह से जाम रोकना और मुश्किल हो गया है. ऊपर से अगर कोई गाड़ी खराब हो जाए तो उसे हटाने की जिम्मेदारी हमारी होती है, मुश्किल ये है कि हमारे पास क्रेन तो है नहीं कि हम उसे हटा लेंगे, किसी तरह जुगाड़ से काम चलाते हैं.'
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अधिकारी ने जाम के कुछ तकनीकी पेंच समझाते हुए आगे कहा, "दिक्कत सिर्फ सड़कों की नहीं है, बल्कि सीएनजी और पेट्रोल पंपों पर लगने वाली गाड़ियों की लंबी कतारें भी हिंडन पुल से लेकर पर्थला और पुस्ता रोड तक ट्रैफिक को पूरी तरह चोक कर देती हैं. हम इन रास्तों पर कट और यू-टर्न को मैनेज करके दबाव कम करने की कोशिश में जुटे हैं. सड़कों के चौड़ीकरण की लगातार मांग कर रहे हैं, लेकिन उसकी कोई सुनवाई नहीं है." वो उम्मीद करते हैं कि अंडरपास बनने के बाद शायद हालात सुधर जाएं, लेकिन उसमें भी कितना वक्त लगेगा कुछ नहीं कह सकते. पहले अंडरपास बनने की डेडलाइन 15 अगस्त दी गई थी, लेकिन हालात ऐसे नहीं लगते हैं कि उसका काम समय पर पूरा हो पाएगा.

प्रशासन की नाकामी
NEFOMA के प्रेसिडेंट अन्नू खान पिछले कई सालों से अथॉरिटी के चक्कर काट रहे हैं. aajtak.in से ग्राउंड जीरो पर बात करते हुए उनका दर्द और गुस्सा दोनों फूट पड़ा. उन्होंने कहा, "अधिकारियों ने इस शहर की ऐसी 'शानदार' प्लानिंग की है कि आज लाखों लोग अपनी किस्मत को रो रहे हैं. बिल्डरों को खुली छूट देकर यहां गगनचुंबी मॉल और बड़ी-बड़ी सोसायटियां तो खड़ी करवा दी गईं, लेकिन इंसानों के चलने के लिए दो गज जमीन नहीं छोड़ी गई. इस पूरे इलाके में आज हालात इतने बदतर हैं कि सड़कों पर पैदल चलने तक की जगह नहीं बची है."
अपने रोज के अनुभव का एक कड़वा उदाहरण देते हुए उन्होंने आगे कहा, "मेरा दफ्तर घर से महज 3-4 किलोमीटर की दूरी पर है, लेकिन विडंबना देखिए कि मुझे अपनी चमचमाती गाड़ी घर पर छोड़कर पैदल ऑफिस जाना पड़ता है. अगर गाड़ी से निकलूंगा, तो मिनटों का यह सफर तय करने में आधा से एक घंटा कब बीत जाएगा, पता ही नहीं चलता. यहां गाड़ियां सड़कों पर चलती नहीं, बल्कि प्रशासन की नाकामी का तमाशा देखती हुई खड़ी रहती हैं."
इस इलाके की बदहाली और प्रशासनिक दावों की पोल रोजाना गूगल मैप की तस्वीरें खोल देती हैं. सुबह 8:30 बजते ही पर्थला खंजरपुर से लेकर गौर चौक और एक मूर्ति तक का पूरा इलाका गूगल मैप पर लाल नजर आने लगता है, जो दिखाता है कि यहां गाड़ियां रेंग भी नहीं रही हैं बल्कि पूरी तरह थम चुकी हैं. यह लाल रंग सिर्फ ट्रैफिक का नहीं, बल्कि लाखों नौकरीपेशा लोगों के उस मानसिक तनाव और वक्त की बर्बादी का सूचक है, जो वो हर रोज इस बदइंतजामी के कारण सड़कों पर भुगतते हैं.

ग्रेटर नोएडा वेस्ट की यह जमीनी हकीकत साफ बताती है कि यह समस्या सिर्फ गाड़ियों की संख्या बढ़ने की नहीं, खराब प्लानिंग का नतीजा है. जब तक प्रशासन जमीन पर एक मजबूत, वैज्ञानिक ट्रैफिक मैनेजमेंट प्लान लागू नहीं करेगा, तब तक सड़कों का यह 'महाजाम' यहां के लाखों फ्लैट खरीदारों की किस्मत का परमानेंट हिस्सा बना रहेगा.
इस पूरे मुद्दे पर aajtak.in ने नोएडा अथॉरिटी के वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क करने और उनका पक्ष जानने की कोशिश की है. अथॉरिटी का जवाब आते ही उनके पक्ष को भी इस रिपोर्ट में शामिल किया जाएगा.