दिल्ली की राजनीति में एक ऐसा बंगला है, जिसका नाम लेते ही सत्ता के गलियारों में कई कहानियां सुनने को मिलती है. राजधानी के सिविल लाइंस स्थित 33 शमनाथ मार्ग का यह सरकारी बंगला दशकों से "मनहूस" बंगले के रूप में चर्चित रहा है, लेकिन अब इस 70 साल पुराने पते को नया मालिक मिल गया है और इसके साथ ही इस रहस्यमयी बंगले की कहानी में एक नया अध्याय जुड़ गया है.
33 शमनाथ मार्ग को दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश का आधिकारिक आवास बनाया गया था. इसके बाद जिन-जिन मुख्यमंत्रियों ने यहां निवास किया, उनका कार्यकाल किसी न किसी कारण से पूरा नहीं हो सका. राजनीतिक गलियारों में यह धारणा बन गई कि इस बंगले में रहने वाले मुख्यमंत्री सत्ता में लंबे समय तक टिक नहीं पाते. यही वजह रही कि पिछले करीब दो दशकों से यह बंगला लगभग खाली पड़ा रहा है.
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अब कौन बनेगा इस पते का नया मालिक?
दिल्ली सरकार ने इस बंगले को मुख्यमंत्री आवास के तौर पर इस्तेमाल करने के बजाय इसे नए उद्देश्य के लिए विकसित करने का फैसला किया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार यहां राज्य आपदा प्रबंधन से जुड़ा आधुनिक कार्यालय और कमांड सेंटर बनाने की तैयारी कर रही है. इसके लिए ब्रिटिशकालीन इस इमारत को ध्वस्त करने पर भी विचार किया जा रहा है. यानी अब यह पता किसी मुख्यमंत्री का आवास नहीं, बल्कि आपदा प्रबंधन व्यवस्था का नया केंद्र बन सकता है.
ब्रिटिश दौर की विरासत बताया जाता है कि यह बंगला 1920 के दशक में बनाया गया था. दो मंजिला इस विशाल परिसर में चार बेडरूम, ड्राइंग रूम, बड़ा लॉन, फव्वारे और स्टाफ क्वार्टर जैसी सुविधाएं मौजूद हैं. दिल्ली विधानसभा के नजदीक होने के कारण यह मुख्यमंत्री आवास के लिए उपयुक्त माना जाता था, लेकिन अंधविश्वास और राजनीतिक संयोगों ने इसकी पहचान बदल दी.
क्या टूटेगा 'मनहूस' होने का मिथक?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी इमारत का भाग्य तय नहीं होता, लेकिन भारतीय राजनीति में प्रतीकों और मान्यताओं का असर हमेशा से रहा है. ऐसे में अगर यह बंगला अब प्रशासनिक केंद्र के रूप में नई पहचान पाता है, तो संभव है कि "मनहूस बंगले" की छवि भी हमेशा के लिए खत्म हो जाए.
दिल्ली की राजनीति में 33 शमनाथ मार्ग सिर्फ एक पता नहीं, बल्कि सत्ता, संयोग और अंधविश्वास की एक ऐसी कहानी है, जो अब बदलाव की दहलीज पर खड़ी दिखाई दे रही है.