दुनिया में कोहराम मचा है, युद्ध रुक नहीं रहा है, कच्चा तेल उबल रहा है. पिछले हफ्ते ही अनुमान लगाया जा रहा था, कि कच्चे तेल (ब्रेंट क्रूड) की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है. लेकिन कीमत अचानक 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाएगी. इसका अनुमान किसी को नहीं था. एक डर था, जो सच हो गया है.
दरअसल, फिलहाल ब्रेंट क्रूड की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है. कच्चा तेल आयात करने वाले देशों में चीन सबसे ऊपर है. उसके बाद भारत का नंबर आता है. लेकिन इतना कुछ हो जाने के बाद भी चीन बिल्कुल चुप है, इस चुप्पी के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?
चिंता तो हर छोटे-बड़े देश को है, क्योंकि पिछले एक महीने में कच्चे तेल का भाव 56 फीसदी उछल चुका है, और फिलहाल 108 डॉलर प्रति बैरल के आसपास ट्रेड कर रहा है. दुनिया में तेल का सबसे बड़ा आयातक देश चीन है, लेकिन इसके बावजूद चीन की तरफ से ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं आ रही है. इसके पीछे चीन की कई रणनीति हो सकती है.
1. चीन के पास बड़ा स्ट्रैटेजिक ऑयल रिजर्व
चीन के पास कच्चे तेल का बहुत बड़ा भंडार है. पिछले कई वर्षों से चीन लगातार स्टोरेज बढ़ा रहा है. अनुमान है कि चीन के पास कई महीनों की जरूरत के बराबर कच्चा तेल स्टॉक में मौजूद है. इसलिए अचानक कीमत बढ़ने पर भी घबरा नहीं रहा है.
चीन के पास लगभग 900 मिलियन बैरल (90 करोड़ बैरल) का रणनीतिक तेल भंडार माना जाता है, यह भंडार लगभग (90–120 दिन) की आयात जरूरत को पूरा कर सकता है. चीन की कुल तेल खपत लगभग 15–16 मिलियन बैरल प्रतिदिन के आसपास मानी जाती है, चीन खुद करीब 4 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल निकालता है. यानी उसके पास करीब 4 महीने का तेल है, जबकि भारत के पास 45-50 दिन का तेल रिजर्व है.
2. सस्ते तेल खरीदने में चीन आगे
चीन रूस और ईरान से अब भी सस्ता तेल खरीद रहा है. पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बावजूद रूस से तेल का आयात जारी है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ने से भी चीन पर कम असर पड़ने वाला है.
3. मिडिल ईस्ट से भी डील
चीन ने कई तेल उत्पादक देशों के साथ लंबे समय के समझौते किए हुए हैं, जैसे सउदी और UAE के साथ. इन समझौतों में कीमतें अक्सर स्पॉट मार्केट से कम उतार-चढ़ाव वाली होती हैं. बहुत ज्यादा तेल की कीमतें बढ़ने पर चीन आयात घटाकर स्टॉक इस्तेमाल कर सकता है.
4. आर्थिक और कूटनीतिक रणनीति
चीन अक्सर अंतरराष्ट्रीय संकटों में सार्वजनिक बयान देने से बचता है. वह पर्दे के पीछे कूटनीतिक बातचीत और आर्थिक रणनीति पर ज्यादा काम करता है, ताकि बाजार में घबराहट न फैले और सप्लाई सुरक्षित रहे. तेल पर निर्भरता कम करने के लिए चीन ने कोयला, गैस, परमाणु और ग्रीन एनर्जी में भी बड़ा निवेश किया है, इसलिए तेल की कीमत बढ़ने का असर उसकी पूरी अर्थव्यवस्था पर सीमित रहता है.
5. ट्रंप का चीन दौरा
अमेरिका और चीन के बीच कूटनीतिक स्तर बातचीत जारी है, इसी कड़ी में अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump का चीन दौरा भी तय हुआ है. ट्रंप 31 मार्च से 2 अप्रैल 2026 तक चीन की यात्रा पर रहेंगे. इस दौरान उनकी मुलाकात चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) से बीजिंग में होगी. यह ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में पहली चीन यात्रा होगी, और इस दौर से पहले चीन किसी तरह का विवाद नहीं चाहता है.
बता दें, वैसे ही अमेरिका और चीन के बीच पिछले साल से टैरिफ और व्यापार को लेकर तनाव चल रहा है. दोनों देश इसे कम करने पर बात कर सकते हैं. अमेरिका चाहता है कि चीन रूस और ईरान से कम तेल खरीदे. दोनों देशों के बीच चिप टेक्नोलॉजी, निवेश प्रतिबंध और सप्लाई चेन पर भी चर्चा होगी. खबर है कि इस मुलाकात के दौरान चीन लगभग 500 विमान खरीदने का बड़ा सौदा भी कर सकता है.
चीन रोज कितना तेल आयात करता है?
साल 2025 में चीन ने करीब 557.7 मिलियन टन कच्चा तेल आयात किया था, जो औसतन लगभग 11.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन के बराबर है. 2024 में यह आंकड़ा लगभग 11.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन था. पिछले कुछ महीनों में आयात 12–13 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक भी पहुंच गया, जो कि अपने आप रिकॉर्ड में है, इसका मतलब है कि दुनिया में जितना तेल समुद्र के रास्ते व्यापार होता है, उसका बड़ा हिस्सा चीन अकेला खरीदता है. लेकिन फिर भी दाम बढ़ने से चुप है.