बिहार की सियासत में सबसे लंबी लकीर खींचने वाले नीतीश कुमार के बेटे निशांत इन दिनों चर्चा में हैं. नीतीश ने जब मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर राज्यसभा जाने का फैसला किया, उसी वक्त से निशांत को जेडीयू का भविष्य माना जाने लगा.
खबरें यह भी आईं कि निशांत नई सरकार में उपमुख्यमंत्री हो सकते हैं, लेकिन खुद निशांत ने ही एनडीए सरकार में कोई पद लेने से मना कर दिया. अब उनकी चर्चा प्रस्तावित बिहार यात्रा को लेकर है. जेडीयू सूत्रों के मुताबिक, निशांत 3 मई से अपनी यात्रा की शुरुआत करेंगे और अपने पिता की तरह पश्चिम चंपारण से शुरुआत करेंगे.
नीतीश कुमार की राजनीति को समझने वाले जानते हैं कि उन्होंने हमेशा परिवारवाद का विरोध किया. यही वजह रही कि अपने चरम पर रहते हुए भी उन्होंने निशांत को राजनीति में आगे नहीं बढ़ाया. अब उनकी एंट्री ऐसे समय में हुई है जब नीतीश का राजनीतिक प्रभाव ढलान पर माना जा रहा है. निशांत को करीब से जानने वाले बताते हैं कि उनकी रुचि आध्यात्मिकता में ज्यादा रही है.
लेकिन पार्टी और परिवार के दबाव के चलते उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा. उन्हें यह भी समझाया गया कि अगर वे आगे नहीं आए तो जेडीयू कमजोर हो सकती है. अपने पिता की राजनीतिक विरासत को संभालने की जिम्मेदारी ने ही उन्हें इस दिशा में आगे बढ़ाया.
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निशांत राजनीति में नए जरूर हैं, लेकिन अपने शांत स्वभाव के साथ वे यह समझते हैं कि जेडीयू को संभालना आसान नहीं होगा. उन्होंने उपमुख्यमंत्री या मंत्री पद लेने से इनकार कर एक संकेत दिया है कि वे बिना अनुभव के सत्ता में सीधे शामिल नहीं होना चाहते.
पार्टी के कई नेता चाहते थे कि वे सरकार में शामिल हों, लेकिन उन्होंने अपनी अलग सोच दिखाई. उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती जेडीयू को एकजुट रखना और गुटबाजी को नियंत्रित करना है. नीतीश कुमार की उम्र बढ़ने के साथ पार्टी में कई धड़े उभर चुके हैं, जो आगे चलकर चुनौती बन सकते हैं.
निशांत ने पार्टी में सक्रिय होने के बाद लगातार नेताओं और कार्यकर्ताओं से संवाद बढ़ाया है. अपनी यात्रा से पहले वे जिलाध्यक्षों और पदाधिकारियों से मुलाकात कर चुके हैं. विधायकों से संवाद उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है. उनकी ‘जेन-जी टीम’ भी चर्चा में है, जिसमें करीब एक दर्जन युवा विधायक शामिल हैं. इन विधायकों के जरिए वे जमीनी फीडबैक ले रहे हैं. वे योजनाओं की स्थिति, कमियों और संगठन में उपेक्षित चेहरों पर भी बात कर रहे हैं. यह साफ है कि वे तैयारी के साथ मैदान में उतर रहे हैं.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि निशांत अपने पिता की तरह आत्मविश्वास से भरे नजर नहीं आते. उनका व्यक्तित्व थोड़ा संकोची दिखता है, लेकिन राजनीति में ऐसे कई उदाहरण रहे हैं जहां साधारण व्यक्तित्व वाले नेताओं ने बड़ी सफलता हासिल की. ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक इसका उदाहरण हैं. खुद नीतीश कुमार भी अपने शुरुआती दौर में कम बोलने वाले नेता माने जाते थे. निशांत भी ज्यादा बोलने के बजाय सुनने पर जोर देते हैं, जो उन्हें अलग बनाता है.
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जेडीयू में पहले भी कई नेताओं ने यात्राएं की हैं, लेकिन निशांत की स्वीकार्यता कार्यकर्ताओं के बीच ज्यादा मानी जा रही है. अब सबकी नजर उनकी पहली बिहार यात्रा पर है. राजनीतिक विरासत संभालना आसान नहीं होता, और निशांत के सामने भी यही चुनौती है. आने वाले समय में उनका काम करने का तरीका ही तय करेगा कि वे इस विरासत को कैसे आगे बढ़ाते हैं.