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सम्राट-विजय-बिजेंद्र यूं ही नहीं बने 'सत्ता की त्रिमूर्ति', लालू-तेजस्वी की उम्मीदों पर पानी फेरने का प्लान

बिहार में एनडीए की सरकार बन गई है. सम्राट चौधरी सीएम बने हैं तो विजय चौधरी और बिजेंद्र यादव डिप्टी सीएम. एनडीए ने सत्ता की त्रिमूर्ति के जरिए बिहार की राजनीतिक समीकरण को साधने का दांव चला है तो साथ ही लालू और तेजस्वी यादव को सियासी तौर पर उभरने का भी मौका नहीं देना चाहती है.

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बिहार में एनडीए की सत्ता के त्रिमूर्ति (Photo-ITG)
बिहार में एनडीए की सत्ता के त्रिमूर्ति (Photo-ITG)

बिहार में सत्ता परिवर्तन हो गया है. नीतीश कुमार की जगह सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बन गए हैं. लोकभवन में राज्यपाल जनरल सैयद अता हसनैन ने सम्राट को गोपनीयता की शपथ दिलाई. इसके साथ ही जेडीयू कोटे से विजय चौधरी और विजेंद्र यादव को डिप्टीसीएम बनाया गया है. 

बिहार में अभी तक तक सत्ता की कमान नीतीश के हाथों में थी तो बीजेपी से दो डिप्टीसीएम थे, लेकिन नेतृत्व बदलने के साथ ही सत्ता का सियासी समीकरण भी बदला है. बीजेपी ने सम्राट चौधरी को आगे किया तो जेडीयू ने नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद माने जाने वाले विजेंद्र और विजय पर भरोसा जताया. 

बिहार में एनडीए सरकार की अगुवाई अब बीजेपी के हाथों में गई है तो बैक सीट पर जेडीयू है. इस तरह से सत्ता की 'त्रिमूर्ति' के  जरिए बीजेपी और जेडीयू ने बिहार के सियासी गणित को बैठाए रखने के लिए मजबूत दांव चला है, जिस सोशल इंजीनियरिंग के सहारे नीतीश ने दो दो दशक तक बिहार में सत्ता की धुरी बने हुए थे. 

सत्ता की त्रिमूर्ति का सियासी समीकरण
बिहार के राजनीतिक समीकरण को देखते हुए एनडीए ने सत्ता के सिंहासन पर अपने नेताओं को बैठाया है. मुख्यमंत्री की कुर्सी सम्राट चौधरी को सौंपी गई है, जो ओबीसी की कोइरी जाति से आते हैं. आरजेडी और जेडीयू से होते हुए सम्राट चौधरी बीजेपी में आए हैं.  

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जेडीयू कोटे से डिप्टीसीएम बनने वाले विजय कुमार चौधरी पूर्व सीएम नीतीश कुमार के करीबी और भरोसेमंद है. विजय चौधरी भूमिहार जाती से आते हैं, जो बिहार के सवर्ण जातियों में सबसे पावरफुल सियासी तौर पर मानी जाती है. इसके अलावा नीतीश कुमार ने बिजेंद्र प्रसाद यादव को डिप्टीसीएम बनाया है, जो ओबीसी की सबसे बड़ी आबादी वाली यादव जाति से आते हैं. 

एनडीए ने बिहार में अपने त्रिमूर्ती के जरिए कोईरी और यादव के जरिए ओबीसी की दो बड़ी जातियों को साधे रखने की कवायद की तो अगड़ों में भूमिहार समाज से डिप्टीसीएम देकर सियासी बैलेंस बनाए रखने की प्लानिंग है. इस तरह बिहार की तीन बड़ी जातियों पर एनडीए ने दांव खेला है. 

यादव-कोइरी और भूमिहार कॉम्बेनिशन
बिहार की राजनीति जाति के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है. मंडल कमीशन के बाद बिहार की राजनीति पूरी तरह से बदल गई है और अगड़ी जातियों के बजाय ओबीसी केंद्रित हो गई है. लालू यादव ने जिस तरह से ओबीसी और दलित जातियों को लामबंद किया, उसके चलते बिहार की राजनीति से अगड़ी जातियों का वर्चस्व टूट गया. लालू की राजनीति को पहली चोट नीतीश कुमार ने दी, जब उन्होंने बिहार के 'त्रिवेणी' (यादव, कुर्मी और कोइरी) से पॉलिटिक्स से कुर्मी और कोइरी को अलग कर अपनी राजनीति ही खड़ी कर दी. 

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नीतीश ने लालू यादव के एम-वाई समीकरण के सामने लव-कुश राजनीति खड़ी की. पटना के गांधी मैदान में 'कुर्मी महाचेतना रैली' से कुर्मी और कोइरी की राजनीति को अपने साथ जोड़ा.  लालू यादव के यादव वोट बैंक के विरुद्ध लव-कुश समीकरण को सिर्फ बनाया ही नहीं दी बल्कि इस समीकरण को गठबंधन की राजनीति शुरू किया, जिसके चलते अगड़ी जातियां भी नीतीश के करीब आईं. इसके पीछे बीजेपी का हाथ रहा, जिसने बहुत बारीकी से किया. अब नीतीश के सत्ता से हटने के बाद उसी दांव को फिर से आजमाने की कवायद की गई है. 

बिहार में सत्ता परिवर्तन के साथ सियासी समीकरण को मजबूत रखने के लिए ही मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को एनडीए की सत्ता चलाने का नेतृत्व सौंपा है. लगभग दो दशक तक लव कुश समीकरण का दांव आजमाने वाले नीतीश कुमार ने सत्ता की बागडोर कुशवाहा समाज से आने वाले सम्राट चौधरी को सौंपी तो साथ में यादव समाज से आने वाले बिजेंद्र यादव और विजय चौधरी को डिप्टीसीएम बनाकर लगा दिया. इस तरह कोइरी-यादव और भूमिहार वोटों का समीकरण बनाने की रणनीति अपनाई है. बिहार में यह तिकड़ी यादव-कोइरी-भूमिहार समीकरण को मजबूत करने का दांव माना जा रहा है. 

राजनीति में एनडीए का हिट फॉर्मूला
नीतीश कुमार ने 20 साल पहले कुर्मी-कोइरी समीकरण बनाकर ही आरजेडी से सत्ता छीनी थी. इसे नीतीश ने लव-कुश फॉर्मूले का नाम दिया था. बिहार में यादव के बाद कुर्मी और कोइरी दो बड़ी ओबीसी जातियां हैं. नीतीश कुर्मी जाति से आते हैं तो सम्राट चौधरी कोइरी समुदाय से आते हैं. 2025 में बिहार चुनाव में एनडीए की जीत में इन दोनों ही जातियों का रोल काफी अहम था. 

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बिहार में कुर्मी समाज की आबादी 2.5 फीसदी है तो पांच फीसदी आबादी कोइरी समाज की है. इस बार विधानसभा के चुनाव में कोइरी जाति के 24 विधायक जीतकर आए हैं तो कुर्मी जाति के 14 विधायक जीते हैं.  कोइरी विधायक बीजेपी से 5, जेडीयू से 11, एलजेपी से एक, आरएलएम से 2 और महागठबंधन से 5 जीते हैं. कुर्मी विधायक बीजेपी से दो और जेडीयू से 12 जीते हैं. 

नीतीश कुमार का पारंपरिक आधार माने जाने वाले कुर्मी-कोइरी समुदायों के 71 फीसदी वोट एनडीए को मिले थे वहीं, पिछड़ी जातियों के अलग-अलग समूह के कुल मिलाकर 68 फीसदी वोट एनडीए को मिले हैं.  साल 2020 के चुनावों में इन जातियों का समर्थन कम था. 2020 में 66 फीसदी कुर्मी-कोइरी और 58 फीसदी बाकी ओबीसी ने एनडीए को कम वोट दिया था. इसके ही चलते इस बार 5 फीसदी कुर्मी-कोइरी का ज्यादा वोट एनडीए को मिला और अन्य ओबीसी जाति का 10 फीसदी ज्यादा वोट मिले हैं. 

लालू यादव को सियासी चोट देने का प्लान
बीजेपी बिहार में ओबीसी वोटों पर अपना खास फोकस रख रही है. सम्राट चौधरी के जरिए बीजेपी ने कोइरी समाज को मैसेज दिया है तो जेडीयू ने बिहार में विजय चौधरी और विजेंद्र यादव के जरिए भूमिहार और यादव को संदेश दिया. भूमिहार वोटर भी 
एनडीए का परंपरागत माना जाता है. इसीलिए विजय कुमार चौधरी को डिप्टीसीएम बनाया है. भूमिहार समाज से आते हैं, जो बीजेपी का परंपरागत वोटर है. जेडीयू ने विजय चौधरी के जरिए सिर्फ भूमिहार समाज को नहीं, बल्कि बिहार की अगड़ी जातियों को संदेश देने का दांव खेला है. 

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बिहार में भले ही भूमिहार समाज की आबादी 2.86 फीसदी है, लेकिन सियासी तौर पर काफी अहम फैक्टर है. इस बार चुनाव में 25 भूमिहार विधायक जीते हैं, जिसमें 23 एनडीए से और 2 आरजेडी से जीते हैं. बीजेपी से 13, जेडीयू से 7 और बाकी अन्य घटक दल से हैं. वहीं, सवर्ण जातियों से 72 विधायक जीतकर आए हैं.  

बिहार में राजपूत, ब्राह्मण और भूमिहार के कुल वोट 10 फीसदी के करीब है, लेकिन राजनीतिक ताकत आबादी से कहीं ज्यादा है. वोटिंग पैटर्न दिखाता है कि अगड़ी जातियों का करीब पूरा वोटबैंक एनडीए के पीछे एकजुट हो गया. इसीलिए अगड़ी जाति को साधे रखने की स्टैटेजी है. 

बिहार में यादव ओबीसी का सबसे बड़ा वोटबैंक है,  जिनकी आबादी करीब 16 फीसदी के करीब है. यादव ओबीसी की सबसे ज्यादा ताकतवर जाति मानी जाती है. बिहार में लालू यादव ने यादव वोटों के सहारे 15 साल तक राज किया है, लेकिन अब उस पर जेडीयू की भी नजर है, जिसके लिए बीजेंद्र यादव को डिप्टीसीएम बनाया है ताकि तेजस्वी यादव किसी भी तरह से सेंधमारी न कर सके. 

नीतीश के दांव से  विपक्ष चित होगा?
नीतीश कुमार ने सम्राट चौधरी के साथ विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव को सत्ता के समीकरण के लिए चुनकर बिहार की सियासत में कुशवाहा, भूमिहार और यादव का मजबूत समीकरण भी दे दिया. नीतीश ने दो डिप्टी सीएम बनाकर पार्टी के नींव को न केवल मजबूत किया बल्कि विश्वसनीय और वरीय साथियों को सम्मान भी किया.

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जेडीयू डिप्टीसीएम की कुर्सी किसी कुर्मी को न दे कर यादव समाज से आने वाले विजेंद्र यादव को दे कर भी बिहार में यादव राजनीति को आक्रामक विरोध से बचाया. इस तरह से एनडीए ने जातीय समीकरण का ऐसा दांव चला है, जिसके सामने तेजस्वी यादव से लिए नई सोशल इंजीनियरिंग बनानी होगी? 
 

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