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न सवर्ण, न दलित... नीतीश की जगह लेने के लिए एनडीए के ये 4 चेहरे हैं रेस में

नीतीश कुमार के राज्यसभा के लिए नामांकन करने के बाद यह तय हो गया कि बिहार में सत्ता परिवर्तन होने जा रहा है. बीजेपी बिहार में अपना सीएम बनाने जा रही है, लेकिन जिन नेताओं के नाम सामने आए हैं, वो सभी ओबीसी समुदाय से हैं. ऐसे में बीजेपी कैसे सवर्ण जाति के साथ बैलैंस बनाएगी?

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बिहार में बीजेपी किसे बनाएगी अपना सीएम (Photo-PTI)
बिहार में बीजेपी किसे बनाएगी अपना सीएम (Photo-PTI)

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार की राजनीति छोड़कर अब दिल्ली यानि केंद्र की सियासत में जाने का फैसला किया है. नीतीश कुमार ने राज्यसभा के लिए अपना नामांकन दाखिल कर दिया है, जिसके बाद सियासी पावर भी बदलने जा रहा है. बिहार में सत्ता की कमान पहली बार बीजेपी के हाथों में आ रही है. ऐसे में सभी की निगाहें बीजेपी पर टिकी हुई हैं?

बीजेपी हमेशा अपने फैसलों से राजनीतिक पंडितों को चौंकाती रही है, लेकिन बिहार की मौजूदा परिस्थितियों में बीजेपी के चार बड़े नेताओं के नाम मुख्यमंत्री पद की रेस में सबसे ऊपर चल रहे हैं. 

बिहार में सीएम की रेस में बीजेपी के जिन चेहरों के नाम सामने आ रहे हैं, उसमें कोई भी ब्राह्मण, राजभूत और भूमिहार समुदाय से नहीं है बल्कि चारो चेहरे ओबीसी समुदाय से हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि बीजेपी किसी सवर्ण नेता के बजाय ओबीसी चेहरे पर ही क्यों दांव खेलना चाह रही है? 

सीएम की रेस में  बीजेपी के चार ओबीसी चेहरे 
नीतीश कुमार के राज्यसभा नामांकन करने के साथ चर्चा तेज है कि बिहार में बीजेपी का मुख्यमंत्री होगा. बीजेपी की ओर से मुख्यमंत्री की रेस में राज्य के डिप्टीसीएम सम्राट चौधरी, मंत्री दिलीप जायसवाल, केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय और पांच बार के विधायक संजीव चौरसिया के नाम आगे हैं. इसके अलावा भी कई अन्य नाम के कयास लगाए जा रहे हैं, लेकिन उनके नाम सामने नहीं आए हैं. 

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बीजेपी के जिन चार नेताओं के नाम सीएम की रेस में आगे हैं, उनमें एक बात सामान्य है कि चारो चेहरे ओबीसी जाति से हैं. सम्राट चौधरी ओबीसी की कोइरी जाति से आते हैं तो दिलीप जायसवाल भी ओबीसी के कलवार जाति से हैं. इसके अलावा केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय ओबीसी की सबसे बड़ी आबादी वाले यादव समुदाय से आते हैं. ऐसे ही संजीय चौरसिया भी ओबीसी के तमालो जाति से हैं. 

ब्राह्मण-राजपूत-भूमिहार चेहरे क्यों नहीं?

बीजेपी का परंपरागत वोटबैंक सवर्ण जातियां रही है. एक समय बीजेपी को ब्राह्मण और बनियों की पार्टी कहा जाता था. बिहार में  बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत भूमिहार, ब्राह्मण और राजपूत समुदाय रही है. यही वजह है कि बीजेपी ज्यादातर टिकट भी इन्हीं सवर्ण जातियों को देती रही है. 2024 और 2025 में नीतीश कुमार के नेतृ्त्व में एनडीए की सरकार बनी तो बीजेपी ने एक सवर्ण को डिप्टीसीएम जरूर बनाए रखा. 

नरेंद्र मोदी के दौर से पहले नीतीश सरकार में बीजेपी कोटे से सुशील मोदी डिप्टीसीएम हुआ करते थे. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार दोबारा से एनडीए में वापसी किए तो बीजेपी ने भले ही सुशील मोदी की जगह पर दो डिप्टीसीएम बनाए,जिसमें एक ओबीसी से रेणु देवी और एक वैश्य समुदाय से तारकेश्वर प्रसाद थे. तारकेश्वर प्रसाद सामान्य वर्ग के वैश्य समुदाय से हैं. 

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2024 में नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई तो बीजेपी ने फिर से दो डिप्टीसीएम बनाए. ओबीसी से सम्राट चौधरी को डिप्टीसीएम बनाया तो सवर्ण जाति में भूमिहार समाज से आने वाले विजय कुमार सिन्हा को भी उपमुख्यमंत्री बनाया. 2025 नवंबर में नीतीश कुमार के अगुवाई में सरकार बनी तो बीजेपी ने सम्राट चौधरी के संग विजय कुमार सिन्हा को डिप्टीसीएम बनाए रखा.

बिहार में बीजेपी ने ओबीसी के साथ सवर्ण जातियों को हमेंशा अहमियत देती रही है,क्योंकि एक मजबूत सियासी आधार को बनाए रखा. अब जब बीजेपी को बिहार में पहली बार अपना सीएम बनाने का मौका मिला है तो ओबीसी पर दांव खेलने की रणनीति बनाई है. अभी तक बीजेपी के जिन नेताओं के नाम सीएम रेस में आए हैं, उसमें कोई भी चेहरा सवर्ण जाति का नहीं है. 

बीजेपी के सामने जातिय फैक्टर साधने की चुनौती

बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा अहम भूमिका निभाते रहे हैं. राज्य में पिछड़ा, अति पिछड़ा (EBC), दलित और सवर्ण मतदाताओं का संतुलन चुनावी राजनीति में निर्णायक माना जाता है. बीजेपी की छवि एक सवर्ण पार्टी की रही है, उसने भले ही ओबीसी से आने वाले सम्राट चौधरी से लेकर नित्यनंद राय को अहमियत देती रही है, उसके बाद भी अपनी सवर्ण छवि को नहीं तोड़ सकी है. 

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नीतीश कुमार ओबीसी के कुर्मी जाति से आते हैं. बीजेपी बिहार में अभी तक नीतीश के चेहरे को आगे कर चुनाव लड़ती रही है, जिसके चलते सवर्ण और ओबीसी दोनों जाति के साथ सियासी बैलेंस को बनाए रखा. बीजेपी अब जब नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद उनकी जगह पर अपना सीएम बनाने जा रही है तो ओबीसी चेहरे पर ही दांव खेलने की रणनीति बनाई है ताकि सामाजिक संतुलन को  साधे रखा जा सके.  

बीजेपी ने बिहार में किसी ऐसे नेता को मुख्यमंत्री बना सकती है जो पिछड़े या अति पिछड़े वर्ग से आता हो. इससे पार्टी को आगामी चुनावों में राजनीतिक लाभ मिलने की उम्मीद हो सकती है.सम्राट चौधरी खुद कुशवाहा समाज से आते हैं, जो बिहार की राजनीति में प्रभावशाली पिछड़ा वर्ग माना जाता है. इसके अलावा नित्यनंद राय यादव जाति से हैं. ऐसे ही बाकी दोनों चेहरे भी ओबीसी से हैं. 

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