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सुरों की संगत में थिरका उज्जैन का इतिहास... कमानी के मंच ने सुनाई 5000 साल पुरानी गाथा

उज्जैन के कमानी ऑडिटोरियम में पद्मश्री डॉ. पुरु दाधीच के 88वें जन्म समारोह के अवसर पर 'अशीतित्थ उत्सव-2026' के तहत कथक नृत्य-नाट्य 'प्रतिकल्पायन' की प्रस्तुति दी गई. इस नाट्य-नृत्य ने उज्जयिनी की सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक परंपराओं को शास्त्रीय नृत्य, संगीत और संस्कृत साहित्य के माध्यम से जीवंत किया.

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'अशीतित्थ उत्सव-2026' में 'प्रतिकल्पायन' ने मंच पर जीवंत की उज्जयिनी की सांस्कृतिक यात्रा
'अशीतित्थ उत्सव-2026' में 'प्रतिकल्पायन' ने मंच पर जीवंत की उज्जयिनी की सांस्कृतिक यात्रा

भरत मुनि के नाट्य शास्त्र में श्लोक है, यतो हस्तस्ततो दृष्टिर्यतो दृष्टिस्ततो मनः. यानी जहां हाथों का इशारा हो वहीं दृष्टि जानी चाहिए और जिधर दृष्टि जाए मन वहीं जाता है. शुक्रवार की सांझ जब सूर्य अपनी अस्त दिशा में छिपने को था, राजधानी दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम में तबले की तिरकिट, वीणा की झंकार और मृदंग की थाप पर यही श्लोक मंच पर सार्थक हो रहा था. सुरों के साथ श्लोकों और बंदिशों का जो संगम हुआ तो समय को मानो पंख लग गए. फिर मंच पर जो दृश्य निखर कर आया वह दर्शकों को अपने साथ 5000 साल की समय यात्रा पर ले गया.

जहां उज्जैन के ज्ञान-विज्ञान और इसकी सांस्कृतिक विविधता के दर्शन हुआ. मौका था पद्मश्री डॉ. पुरु दाधीच के 88वें जन्म समारोह का. इस दौरान कमानी ऑडिटोरियम में ''अशीतित्थ उत्सव-2026' के तहत भव्य कथक नृत्य-नाट्य 'प्रतिकल्पायन' की प्रस्तुति दी गई. दाधीच शैली पर आधारित इस प्रस्तुति ने नृत्य, संगीत, संस्कृत साहित्य और भारतीय इतिहास के अद्भुत तालमेल के जरिये उज्जयिनी (उज्जैन) की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक यात्रा को मंच पर साकार किया. कार्यक्रम में कला, संस्कृति और शास्त्रीय नृत्य से जुड़े अनेक गणमान्य लोगों और दर्शकों की उपस्थिति रही.

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'प्रतिकल्पायन' के कॉनसेप्ट, गीत और कोरियोग्राफी पद्मश्री डॉ. पुरु दाधीच ने तैयार की है. यह प्रस्तुति उज्जयिनी के प्राचीन नाम 'प्रतिकल्प' से प्रेरित है. इसमें केवल ऐतिहासिक घटनाओं का मंचन नहीं किया गया, बल्कि उन सांस्कृतिक, धार्मिक और साहित्यिक परंपराओं को भी प्रस्तुत किया गया, जिन्होंने उज्जयिनी को भारतीय सभ्यता के प्रमुख केंद्रों में स्थापित किया.

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नृत्य-नाट्य का आरंभ 'मंगलाचरण' से हुआ, जिसमें समुद्र मंथन, अमृत कलश और शिप्रा नदी से जुड़े सिंहस्थ महाकुंभ की पौराणिक कथा को शास्त्रीय नृत्य शैली में प्रस्तुत किया गया. इसके बाद सतयुग में भगवान महाकाल के ज्योतिर्लिंग स्वरूप के प्रकट होने की कथा, त्रिपुर के विनाश और उज्जैन के धार्मिक महत्व की कथा को बताया गया. जैसे-जैसे युग बदलता गया कथा कहने का तरीका और नाटिका का मंचन प्रभावशाली होता गया.

त्रेतायुग का वर्णन तो सीधे भारत के लोक और ग्रामीण अंचल की ओर ले गया. जहां वन के लिए निकले श्रीराम, सीता और लक्ष्मण उज्जैन में शिप्रा तट पर पहुंचते हैं. यहां ग्रामीण स्त्रियां उनसे उनका परिचय पूछती हैं. संत तुलसीदास की कवितावली की पंक्तियों ने यहां कहानी को न सिर्फ पिरोने, बल्कि रोचक बनाने के साथ कथा प्रवाह को आगे बढ़ाने का काम किया.

पुर तें निकसी रघुबीर-वधू, धरि धीर दए मग में डग द्वै,
झलकीं भरि भाल कनी जल की, पुट सूखि गए मधुराधर वै.
फिरि बूझति हैं, चलनो अब केतिक, पर्नकुटि करिहौं कित ह्वै?
तिय की लखि आतुरता पिय की अंखियां अति चारु चलीं जल च्वे.

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इसके जरिये श्रीराम के ईश्वरीय नहीं बल्कि सहज मानवीय रूप के दर्शन होते हैं. वह अपनी पत्नी सीता के दुख को देखकर करुणा से भर जाते हैं और उनकी आंखों में आंसू भी आ जाते हैं. फिर आगे आया द्वापरयुग का प्रसंग, जहां श्रीकृष्ण उज्जैन में सांदिपनी मुनि के आश्रम शिक्षा-दीक्षा के लिए जाते हैं. 

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प्रस्तुति आगे बढ़ती है और एक-एक करके ऐतिहासिक घटनाएं आंखों के आगे दृश्य बनकर आती-जाती रहती हैं. बौद्ध काल, जैन पंथ और इस दौरान उज्जैन के राजाओं का चरित्र चित्रण भी इतिहास का हिस्सा बनता है. राजा उदयन और वासवदत्ता की प्रसिद्ध प्रेमकथा, सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा का धम्म प्रचार, राजा गर्दभिल्ल, कालकाचार्य और शकों से जुड़े घटनाक्रमों को भी नाटकीय अंदाज में प्रस्तुत किया गया.

नृत्य-नाट्य का एक महत्वपूर्ण भाग सम्राट विक्रमादित्य और मालव संघ पर केंद्रित रहा, जिसमें विदेशी सत्ता से मुक्ति और उज्जयिनी में कला एवं साहित्य के स्वर्णिम युग को दर्शाया गया. इसके बाद सम्राट हर्षवर्धन के समय की अमर संस्कृत कृति 'कादंबरी' और परमार नरेश राजा भोज के विद्वत् दरबार का मंचन किया गया. इन प्रस्तुतियों ने संस्कृत साहित्य, काव्य और विद्या की समृद्ध परंपरा को प्रभावी ढंग से सामने रखा.

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कार्यक्रम में मुगल काल के दौरान मालवा की बदलती सांस्कृतिक परिस्थितियों तथा मराठा शासन के समय उज्जैन में विकसित हुई नई सांस्कृतिक परंपराओं को भी स्थान दिया गया. वहीं लावणी नृत्य की खास प्रस्तुति डॉ. सानवी जेठवानी की टीम ने दी. अंतिम दृश्य आधुनिक उज्जैन को समर्पित रहा, जिसमें महाकालेश्वर मंदिर, महाकाल लोक और संध्या आरती की भव्य प्रस्तुति के साथ यह संदेश दिया गया कि समय के साथ अनेक परिवर्तन हुए, लेकिन उज्जयिनी की सांस्कृतिक आत्मा आज भी उतनी ही जीवंत है. 

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इस भव्य प्रस्तुति का संगीत प्रसिद्ध संगीतकार 'कौशिक बसु' ने तैयार किया. मंच पर 'डॉ. विभा दाधीच' ने नटी, 'डॉ. पियूष राज ने सूत्रधार, सुनील सुंकारा ने भगवान शिव तथा संजय जोशी ने विभिन्न भूमिकाएं निभाईं. मुख्य कलाकारों में हर्षिता शर्मा दाधीच, दमयंती मिरादवाल, क्षमा मालवीय, आयुषी मिश्रा, पूर्वा पांडे, अक्षिता पुराणिक, सान्वी मंडलोई, तनिष्ठा विजयवर्गीय और काजल गुरूंग सहित अनेक कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से दर्शकों की खूब सराहना बटोरी. बड़ी संख्या में नृत्यांगनाओं और बाल कलाकारों ने भी मंच पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया.

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प्रकाश संयोजन संदीप दत्ता, मंच सज्जा मोहन सिंह रावत तथा वेशभूषा की जिम्मेदारी नटवर रंगम ने संभाली. आयोजन का समन्वय प्रत्युष पुरु दाधीच, नटवरी कथक नृत्य अकादमी, इंदौर,ने किया. 'प्रतिकल्पायन' की इस प्रस्तुति ने सिद्ध किया कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि बल्कि इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का जरिया भी है. 

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