जंगी सायरन बज रहे हैं. गोला-बारूद दागे जा रहे हैं और मिसाइलों तक की तैयारी है. उधर, आसमान लाल-पीला हो उठा है, नीचे अवाम में हाय-तौबा मची है. बताइये कोई सेंस है इस बात की कि ऐसे माहौल में एक सूफी तराना 'दमादम मस्त कलंदर' फिजा में गूंजे. लेकिन जुमा की इस रोज ऐसा ही हुआ. अफगानिस्तान और पाकिस्तान में जंग शुरू हो गई है.
अफगानिस्तान ने पाकिस्तान पर शुक्रवार तड़के जवाबी कार्रवाई करते हुए 55 सैनिकों को मार गिराया. इसके साथ ही दो बेस और 19 चेक पोस्ट पर कब्जा कर लिया. पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा एम.आसिफ ने कहा पाकिस्तान का सब्र जवाब दे गया है. अब आपके (अफगानिस्तान) और हमारे बीच खुली जंग है. अब ये दमा दम मस्त कलंदर होगा.'
13वीं सदी से उठती आवाज: लाल शाहबाज़ कलंदर की विरासत
बस यहीं से ध्यान जंग से हटा और 13वीं सदी के एक सूफी तराने पर जा अटका. तराना ही दमादम मस्त कलंदर, जिसे माना जाता है कि लगभग 800 साल पहले अमीर खुसरो ने लिखा था. उस वक्त सिंध (अब पाकिस्तान में) के एक प्रसिद्ध सूफी संत लाल शाहबाज़ कलंदर (1177-1274) हुआ करते थे. यह उन्हें ही समर्पित कव्वाली तराना है. बाद में 18वीं सदी की शुरुआत में इसे बुल्ले शाह ने नए ढंग से संवारा और फिर इसे इतना गाया कि ये फेमस हो गया.
पाकिस्तान के अख़बार Dawn की मानें तो 'दमादम मस्त क़लंदर' सिर्फ एक सूफी कलाम नहीं, बल्कि सत्ता और उसकी पुरानी पड़ चुके, जकड़े हुए सिस्टम के खिलाफ एक विरोध की आवाज भी है. कहा जाता है कि जब सूफी परंपरा के कुछ लोग शाही दरबारों में जगह पाने लगे और सूफियों को राज्य सम्मान व उपाधियां दी जाने लगीं, तब कलंदर की परंपरा ने दरबारी कल्चर से दूरी बनाए रखी. यही कारण है कि सदियों बाद भी लाल शाहबाज कलंदर का नाम स्प्रिचुअल फ्रीडम के ही साथ-साथ विरोध और विद्रोह का भी प्रतीक बना हुआ है.

सूफी कलाम से सियासत तक
रिपोर्ट्स के मुताबिक, 1973 में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने 'दमादम मस्त क़लंदर' शब्द का इस्तेमाल उस समय के निकट भविष्य में होने वाली राजनीतिक उथल-पुथल की भविष्यवाणी के संदर्भ में किया था. बाद में पीर पगारो ने भी इसे राजनीतिक संदेश के तौर पर प्रयोग किया. यह भी कहा जाता है कि कोर्ट के फैसले से ठीक पहले भुट्टो ने ‘क़लंदर, पट रख जान’ (ओ कलंदर, मेरी इज्जत बचाना) कहा था. हालांकि यह महज दावा है और इसकी कभी पुष्टि नहीं हो सकी. क्योंकि कुछ मानने वाले ऐसा कहते हैं कि भुट्टों इतनी आसनी से सिंधी लहजों का इस्तेमाल अपनी बोलचाल में नहीं करते थे.
इतिहासकार यह भी स्पष्ट करते हैं कि संत झूलेलाल और लाल शाहबाज़ कलंदर अलग-अलग संत परंपराओं से जुड़े हुए हैं, हालांकि लोकमानस में दोनों की छवियां कई बार एक-दूसरे में घुल-मिल जाती हैं.
'दमादम मस्त क़लंदर' 13वीं सदी के सूफी संत लाल शाहबाज़ कलंदर की शान में रचा गया कलाम माना जाता है. उनकी दरगाह पाकिस्तान के सिंध प्रांत के सेहवान शहर में है. 16 फरवरी 2017 को आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ने इस दरगाह पर अटैक किया, जिसमें कम से कम 88 लोगों की मौत हो गई. हमले के महज 12 घंटे के भीतर दर्जनों श्रद्धालु पुलिस बैरिकेडिंग तोड़कर दरगाह में दाखिल हुए और पारंपरिक सूफी नृत्य ‘धमाल’ किया. दरगाह के खादिम डॉ. सैयद मेहदी रज़ा शाह ने इसे आतंक के खिलाफ़ खुला विद्रोह और
चुनौती बताया.
धमाल, दरगाह और साझा आस्था
सेहवान, कराची से लगभग छह घंटे की दूरी पर मौजूद है. यहां पाकिस्तान के सबसे अधिक श्रद्धालु आते हैं. यहां हिंदू और मुस्लिम अपनी धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर एक साथ धमाल करते हैं. हालांकि पाकिस्तान में कुछ लोग धमाल को इस्लामी परंपरा का हिस्सा नहीं मानते, जबकि अन्य विद्वान तुर्की के रूमी, भारत के अमीर खुसरो, बुल्ले शाह और निजामुद्दीन औलिया जैसे सूफी संतों की परंपरा का हवाला देते हैं, जहां संगीत और आध्यात्मिक नृत्य साधना का जरिया रहे हैं. लाहौर का दाता दरबार, जहां अली हजवीरी (दातागंज बख्श) की मजार है, वहां न तो धमाल की परंपरा है और न ही कव्वाली की.

‘दमादम मस्त क़लंदर’ की रचना को लेकर मतभेद
सिंधी कवि नंद जावेरी की मानें तो इस गीत को लेकर कई भ्रांतियां हैं. उनका कहना है कि यह कलाम सिर्फ अली शाहबाज़ क़लंदर ही नहीं बल्कि संत झूलेलाल के लिए भी है. गीत की पंक्तियों 'लाल मेरी पत रखियो भला झूलेलालन, सिंदड़ी दा, सेहवान दा अली शाहबाज़ क़लंदर” में ‘लाल’ और ‘शाहबाज़ क़लंदर’ शब्दों को लोग सीधे हज़रत लाल शाहबाज़ क़लंदर से जोड़ते हैं. इस तरह कव्वाली की एक ही पंक्ति में झूलेलाल और अली शाहबाज कलंदर एक साथ ही आ जाते हैं. ‘क़लंदर’ दरअसल एक सबसे ऊंची आध्यात्मिक उपाधि मानी गई है, जो बहुत कम सूफी संतों को दी गई.
'दमादम मस्त क़लंदर' को उपमहाद्वीप का ‘सूफी स्टैंडर्ड’ कहा जाता है. भारत और पाकिस्तान में सैकड़ों कलाकारों ने इसे कव्वाली, लोकगीत और फिल्मी अंदाज़ में गाया है. इस कलाम की लोकप्रियता सिर्फ़ सिंधी समुदाय तक सीमित नहीं रही. झूलेलाल, जिन्हें नदी देवता माना जाता है, हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों में पूजे जाते हैं. यही साझा आस्था “दमादम मस्त क़लंदर” को एक ऐसे कल्चरल ब्रिज में बदल देती है, जो मज़हबी सीमाओं से परे जाकर आध्यात्मिक एकता और विद्रोह की भावना को जीवित रखता है.
जब पाक रक्षामंत्री ख्वाजा आसिफ ने इसका जिक्र अपने बयान में किया तो 13वीं सदी का ये तराना अपनी पूरी शान-ओ-शौकत के साथ फिर से जेहन में जिंदा हो गया.