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बजट के बहाने याद आया हस्तिनापुर... जैन तीर्थ में कैसे तब्दील हो गई महाभारत की राजधानी?

हस्तिनापुर, जो महाभारत की राजधानी के रूप में प्रसिद्ध है, आज एक प्रमुख जैन तीर्थ स्थल के रूप में जाना जाता है. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट में इसे पुरातात्विक-पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने की घोषणा की है. पुरातत्व खुदाइयों में कई प्राचीन अवशेष मिले हैं, जिन्हें लेकर रिसर्च जारी है. जबकि जैन परंपरा ने यहां कई धार्मिक संरचनाएं स्थापित की हैं.

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हस्तिनापुर में मौजूद पांडव टीला... महाभारत की राजधानी में पौराणिक गाथा की यही एक पहचान मौजूद है
हस्तिनापुर में मौजूद पांडव टीला... महाभारत की राजधानी में पौराणिक गाथा की यही एक पहचान मौजूद है

मेरठ से लगभग 38–40 किलोमीटर दूर मवाना तहसील में बसा हस्तिनापुर एक बार फिर चर्चा में है. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार को बजट पेश करते हुए हस्तिनापुर को पुरातात्विक-पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने का ऐलान किया. बजट भाषण में नाम आते ही अचानक ध्यान उस नगर की ओर चला गया, जिसे महाभारत की राजधानी के रूप में तो जाना जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत में जिसकी पहचान पिछले कई दशकों से एक प्रमुख जैन तीर्थ के रूप में बनी हुई है.

यही सवाल सबसे अहम है—5000 साल पुरानी पौराणिक-ऐतिहासिक विरासत को समेटे हस्तिनापुर की पहचान महाभारत से खिसककर जैन तीर्थ में कैसे बदल गई?

महाभारत की असल जमीन पर पसरा सन्नाटा

हस्तिनापुर का नाम लेते ही कौरव-पांडव, राजसभा, द्यूत क्रीड़ा और महायुद्ध की स्मृतियां मन में उभर आती हैं. महाभारत को भारतीय परंपरा में हज़ारों वर्ष पुरानी घटना माना जाता है, इसलिए यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि उस कथा से जुड़े कुछ ठोस निशान आज भी यहां मिलेंगे. लेकिन जब आप हस्तिनापुर पहुंचते हैं, तो निराशा हाथ लगती है. यहां न कौरवों से जुड़ा कोई स्मारक दिखाई देता है, न पांडवों की उपस्थिति का कोई स्पष्ट स्थापत्य प्रमाण. कोई ऐसा मंदिर भी नहीं मिलता जो निर्विवाद रूप से महाभारत काल का होने का दावा कर सके.

नगर के बीचों-बीच एक विशाल टीला जरूर है, करीब 55–60 फुट ऊंचा, जिसे स्थानीय लोग ‘पांडव टीला’ कहते हैं. लोकमान्यता है कि इसी टीले के नीचे हस्तिनापुर का वैभवशाली महल दबा हुआ है. कथाओं में यह भी कहा जाता है कि किसी शाप के कारण पूरा नगर धीरे-धीरे मिट्टी में समा गया.

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‘द्रौपदी का शाप’: लोकमान्यता से असल हाल तक

हस्तिनापुर से जुड़ी सबसे प्रचलित कथा द्रौपदी के शाप की है. मान्यता के अनुसार, जब कौरवों ने राजसभा में द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया, तब क्रोध में भरी द्रौपदी सब कुछ भस्म कर देना चाहती थीं, लेकिन गांधारी ने उन्हें रोक लिया. द्रौपदी ने तत्काल विनाश के बजाय हस्तिनापुर के धीरे-धीरे मिट्टी में मिल जाने का शाप दिया.

यह कथा आस्था का विषय है, लेकिन इसे एक सामाजिक-ऐतिहासिक रूपक के रूप में भी देखा जाता है. मिट्टी मिल जाने की प्रक्रिया धीमी ही होती है. पहले दीवारों को दीमकें खाती हैं, फिर एक-एक कर लोग मरते जाते हैं, या पलायन होता है. आपसी संघर्ष पनपता है, कुछ और लोग मारे जाते हैं. इमारत खोखली होती जाती है. उसमें वीरानी छा जाती है. कुछ दिनों तक वह भूतिया रहती है, फिर खंडहर बनने लगती है और मिट्टी में दब जाती है. हस्तिनापुर के साथ ये सब कुछ हुआ. कम से कम लोककथाएं यही संकेत देती हैं.

Hastinapur
साल 2022 में भी हस्तिनापुर के पांडव टीले पर खुदाई हुई थी

पुरातत्व कोशिशें जारी रहीं, लेकिन नतीजा जीरो

ऐसा नहीं है कि हस्तिनापुर की प्राचीनता को लेकर प्रयास नहीं हुए. आजादी के बाद इस दिशा में गंभीर पहल की गई. शोभित यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर प्रियंक भारती बताते हैं कि पांडव टीला और उसके आसपास कई बार खुदाई की जा चुकी है. 1950–52 के बीच प्रसिद्ध पुरातत्वविद और इतिहासकार प्रोफेसर बीबी लाल ने यहां उल्टा खेड़ा क्षेत्र में खुदाई कराई थी. इसके लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1949 में अनुमति दी थी. खुदाई में 1100 से 800 ईसा पूर्व के बीच की कई वस्तुएं मिलीं.

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भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के 1954–55 में प्रकाशित बुलेटिन 'Ancient India' के अनुसार, पांडव टीला की खुदाई में भूरे रंग की पॉटरी मिली, जिसे उस दौर की ‘डीलक्स पॉटरी’ माना गया. करीब 20 फुट नीचे तक की खुदाई में एक बड़े ढांचे के अवशेष भी मिले, जिसे महल का स्वरूप माना गया.

इसके बाद 2006 और 2018 में बागपत के सिनौली क्षेत्र में हुई खुदाइयों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की प्राचीन संस्कृति पर नई रोशनी डाली. 2021–22 में पांडव टीला पर फिर खुदाई शुरू हुई. इस बार करीब 30 मीटर तक की खुदाई में प्राचीन स्तंभों के अवशेष, अलग-अलग काल के बर्तन, हाथीदांत के कुंडे और मुहरें मिलीं.

फिर भी, इन अवशेषों को सीधे महाभारत काल के हस्तिनापुर से जोड़ने पर विद्वानों में एकमत नहीं बन सका. पौराणिक हस्तिनापुर आज भी शोध और अनुमान के बीच झूलता हुआ दिखाई देता है.

महाभारत की धुंधली जमीन पर स्पष्ट जैन परंपरा

इसके ठीक उलट, जैन परंपरा में हस्तिनापुर की पहचान हमेशा स्पष्ट और सशक्त रही है. जैन मान्यताओं के अनुसार यह तीन जैन तीर्थंकरों, 'शांतिनाथ, कुंथुनाथ और अरहनाथ (16वें, 17वें और 18वें तीर्थंकर) की जन्मभूमि रही है.

1801 में यहां दिगंबर बड़ा जैन मंदिर का निर्माण हुआ. इसके बाद जैन परंपरा से जुड़े कई भव्य धार्मिक परिसर विकसित किए गए. जम्बूद्वीप, अष्टपद और कैलाश पर्वत जैसे प्रतीकात्मक धार्मिक स्थलों ने हस्तिनापुर को एक संगठित जैन तीर्थ का स्वरूप दिया.

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1974 में आर्यिकाशिरोमणि श्रीज्ञानमती माता के बनवाए जम्बूद्वीप परिसर ने हस्तिनापुर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जैन तीर्थ के रूप में पहचान दिलाई. जैन धर्म में हस्तिनापुर को काशी के समान पवित्र माना जाता है. यहां गुलाबी संगमरमर से बना सुमेरु पर्वत, तेरहद्वीप जिनालय, 46 मीटर ऊंचा अष्टपद तीर्थ और 131 फीट ऊंचा कैलाश पर्वत जैन तीर्थयात्रियों के लिए प्रमुख आकर्षण हैं.

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भगवान नेमिनाथ, श्रीकृष्ण और महाभारत

हस्तिनापुर की जैन पहचान को मजबूती देने वाला एक बड़ा कारण भगवान नेमिनाथ का मंदिर भी है. नेमिनाथ 22वें जैन तीर्थंकर थे और यहां स्थापित उनकी प्रतिमा एक हज़ार साल से अधिक पुरानी मानी जाती है. बड़ा जैन मंदिर में भी उनकी प्रतिमा विराजमान है.

जैन परंपरा के अनुसार भगवान नेमिनाथ यदुवंश में जन्मे थे और कई स्रोतों में उन्हें श्रीकृष्ण का चचेरा भाई बताया गया है. जैन मान्यता में श्रीकृष्ण ‘शलाकापुरुष’ माने जाते हैं—ऐसे महापुरुष, जो भविष्य में किसी काल में तीर्थंकर बन सकते हैं. इन साझा कथाओं ने हस्तिनापुर को जैन और महाभारतकालीन परंपराओं के बीच एक सेतु भी बनाया, लेकिन व्यावहारिक रूप से जैन परंपरा ने यहां ठोस धार्मिक संरचनाएं खड़ी कर दीं, जबकि महाभारत की विरासत प्रतीकों और कथाओं तक सीमित रह गई.

अब जब बजट में हस्तिनापुर को पुरातात्विक-पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने की बात कही गई है, तो एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—सरकार किस हस्तिनापुर को सामने लाना चाहती है? महाभारत की राजधानी को, जो आज भी शोध और आस्था के बीच खड़ी है. या उस जैन तीर्थ को, जिसने पिछले पचास वर्षों में अपनी पहचान, संरचना और वैश्विक धार्मिक मान्यता गढ़ ली है.
और सबसे दिलचस्प सवाल यही है, क्या इस बजट ऐलान से लोककथाओं में बसा ‘द्रौपदी का शाप’ टूटेगा, या हस्तिनापुर की पहचान की यह दुविधा और गहरी होगी?

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