खिचड़ी एक ऐसा व्यंजन है जो सामाजिक समरसता और एकता का प्रतीक माना जाता है. यह व्यंजन दाल और चावल के मिलन से बनता है, जो अलग-अलग अन्नों को एक साथ जोड़कर एक नई चीज बनाता है. मकर संक्रांति के अवसर पर खिचड़ी भोज का आयोजन होता है, जो समाज के सभी वर्गों को एक साथ लाता है.
खिचड़ी भारतीय घरों में स्वास्थ्य और पोषण का प्रतीक रही है, जिसे पुरी के जगन्नाथ मंदिर में महाप्रसाद के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है. कहानी के अनुसार, भगवान जगन्नाथ ने एक भक्त कर्माबाई की बनाई खिचड़ी खाई थी, जिससे यह भोजन और भी पवित्र माना जाने लगा.
पंजाब की लोहड़ी और ईरान के चहार-शंबे सूरी त्योहार में आग की पूजा और सामूहिक उत्सव की परंपराएं मिलती-जुलती हैं. दोनों देशों में आग को पवित्र माना जाता है और इसे ऊर्जा, चेतना और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है.
नई दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर परिसर में भगवान स्वामिनारायण की बाल्यकाल की 108 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की जा रही है, जो उनकी कठिन तपस्या और आध्यात्मिक अनुशासन का प्रतीक है.
1026 ईस्वी में महमूद गजनवी ने गुजरात के सोमनाथ मंदिर पर हमला किया था, जिसे केवल लूट या सैन्य अभियान के रूप में नहीं देखा जा सकता. गजनवी के दरबारी इतिहासकारों ने इस घटना को धार्मिक दृष्टिकोण से जोड़ा और कहा कि सोमनाथ मंदिर की मूर्ति का संबंध इस्लाम-पूर्व अरब की देवी मनात से था.
द्रविड़ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत से हुई और यह तमिल भाषी दक्षिण भारतीयों की पहचान बन गया. विजयनगर साम्राज्य के दौरान तमिलकम को द्रविड़ मंडल के रूप में पहचाना गया और तमिल भाषा को संरक्षण मिला.
मदुरै की थिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी, जो भगवान मुरुगन के दक्षिण दिशा के पहले निवास के रूप में प्रसिद्ध है, पर कार्तिकेय दीपम की परंपरा विवाद का विषय बन गई है. यह विवाद दीप जलाने की सही जगह को लेकर धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक बहसों को जन्म दे रहा है.
परमहंस योगानंद ने क्रिया योग के माध्यम से आध्यात्मिक शांति, मानसिक स्थिरता और जीवन में संतुलन का मार्ग दिखाया. उनकी शिक्षाएं आज भी योग साधकों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं, जिन्होंने ध्यान और क्रिया योग के अभ्यास से जीवन की जटिलताओं को सरल बनाया.
जनवरी की पूर्णिमा को वुल्फ मून कहा जाता है, जब भेड़िये अपनी रहस्यमयी हूक से वातावरण को गूंजित करते हैं. भारतीय ज्योतिष और पौराणिक कथाओं में इस रात को नकारात्मक शक्तियों और मानसिक उथल-पुथल से जोड़ा गया है.
पिपरहवा अवशेष भगवान बुद्ध की जन्मभूमि कपिलवस्तु से जुड़े हैं और 127 वर्षों बाद भारत लौटे हैं. प्रदर्शनी बौद्ध धर्म की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने का महत्वपूर्ण प्रयास है. पिपराहवा अवशेषों में ब्राह्मी लिपि में संदेश भी है, जो शाक्य वंश से जुड़ा है.
आज जो कैलेंडर हम देख रहे हैं वह बहुत सुधारों और बदलावों के बाद हमारे सामने है. कैलेंडर में महीनों के बंटवारे, दिनों की निर्धारित संख्या और यहां तक कि इसे पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर की परिक्रमा गति से भी मिलाने की कोशिश की गई है. आज हमारा एक साल 365 दिन का है, लेकिन एक दौर ऐसा भी रहा है, जब एक साल में बढ़ते-बढते 445 दिन भी हो गए थे.
प्राचीन रोमन कैलेंडर में महीनों के नाम देवताओं और गिनतियों पर आधारित थे. जनवरी और फरवरी पहले महीनों के रूप में नहीं थे, बल्कि मार्च से वर्ष शुरू होता था. प्रत्येक महीने का नाम रोमन देवताओं या उनके क्रम के अनुसार रखा गया था.
फरवरी महीना रोमन कैलेंडर में कभी साल का आखिरी महीना हुआ करता था, जिसका नाम धार्मिक शुद्धि और मृतकों की यादगार से जुड़ा था. इस महीने का नाम 'फेब्रुअम' से आया, जिसका अर्थ है शुद्धि का साधन. रोमन राजा नूमा पोम्पिलियस ने साल को दस से बारह महीनों में बांटा, जिससे जनवरी और फरवरी नए महीने बने.
अयोध्या में बीते हफ्ते दक्षिण कोरियाई रानी हेओ ह्वांग-ओक की 10 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया गया, जो भारत और कोरिया के 2000 साल पुराने सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक है. रानी हेओ ह्वांग-ओक कोरियाई इतिहास में अयोध्या की राजकुमारी सुरिरत्ना के रूप में जाना जाता है.
प्राचीन रोम में राजा रोमुलस द्वारा बनाया गया 10 महीने वाला कैलेंडर 304 दिनों का था, जिसमें सर्दियों के 61 दिन शामिल नहीं थे. नूमा पोंपिलियस ने इसे सुधारते हुए जनवरी और फरवरी महीने जोड़े, जिससे कैलेंडर 12 महीनों और लगभग 355 दिनों का हो गया.
ढाकेश्वरी मंदिर बांग्लादेश की राजधानी ढाका का एक प्राचीन धार्मिक स्थल है, जो देवी दुर्गा के एक स्वरूप पर आधारित है और शहर का नाम इसी मंदिर से जुड़ा है. यह मंदिर शाक्त पीठ माना जाता है और इसका निर्माण 12वीं शताब्दी में सेन वंश के राजा बल्लाल सेन ने कराया था.
जनवरी महीने की उत्पत्ति प्राचीन रोमन मिथकों से जुड़ी है, जिसमें देवता जानूस को नए साल की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है. रोमन राजा नूमा पोंपिलियस ने 713 ईसा पूर्व में जनवरी को वर्ष का पहला महीना घोषित किया था.
रोमन काल गणना में महीने का पहला दिन 'कैलेंडे' कहलाता था और यहीं से निकला है कैलेंडर शब्द. हालांकि कैंलेंड से कैलेंडर की शब्द यात्रा काफी लंबी रही है. इस बीच काल गणना और वर्ष के दिनों की गिनती कई सुधारों से होकर गुजरी है.
क्रिसमस का त्योहार आज पूरी दुनिया में धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन 17वीं सदी में ब्रिटेन और अमेरिका में इसे प्रतिबंधित कर दिया गया था. उस समय के प्रोटेस्टेंट शासकों ने इसे गैर-धार्मिक और अनैतिक माना था.
Christmas Tree की परंपरा बाइबिल से नहीं बल्कि यूरोपीय लोककथाओं और संस्कृति से जुड़ी है. जानिए 25 December को Christmas Tree सजाने का इतिहास और मतलब.
क्रिसमस ट्री की परंपरा यूरोप से शुरू होकर भारतीय गली-मोहल्लों तक पहुंची है. यह पेड़ न केवल धार्मिक प्रतीक है बल्कि सांस्कृतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक महत्व भी रखता है. इसकी सजावट में विभिन्न प्रतीक शामिल हैं जो खुशी, समृद्धि और सकारात्मकता दर्शाते हैं.