ट्रंप हारे तो क्या होगा? मिडटर्म चुनाव से तय होगी अमेरिकी राष्ट्रपति की ताकत

अमेरिका में आज होने वाले मिडटर्म चुनाव तय करेंगे कि सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में किस पार्टी का बहुमत रहेगा. नतीजे ट्रंप की घटती लोकप्रियता, रिपब्लिकन पार्टी की पकड़ और डेमोक्रेट्स की नीली लहर के दावों की परीक्षा के साथ अगले 2 साल की घरेलू राजनीति और कैपिटल हिल की निगरानी की दिशा भी तय करेंगे.

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प

रोहित शर्मा

  • वॉशिंगटन,
  • 03 नवंबर 2026,
  • अपडेटेड 12:30 PM IST

अमेरिका में मिडटर्म चुनाव हो रहे हैं. यह राष्ट्रपति चुनाव के दो साल बाद होते हैं. ये चुनाव तय करते हैं कि अमेरिकी संसद के दोनों सदनों यानी सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में किस पार्टी का बहुमत होगा. आने वाले दो साल में अमेरिका की लेजिस्लेटिव ब्रांच यानी विधायिका किस तरह काम करेगी, इसका फैसला भी इन्हीं चुनावों से होता है.

इस बार सबसे बड़ा सवाल यह है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता में आई गिरावट का असर रिपब्लिकन पार्टी पर पड़ेगा या नहीं. अमेरिका में महंगाई और हेल्थकेयर की बढ़ती लागत बड़े मुद्दे हैं. इसके अलावा फरवरी में ईरान के साथ शुरू हुए युद्ध को लेकर भी रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं को डेमोक्रेट्स लगातार निशाने पर ले रहे हैं.

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जब भी लोगों ने डोनाल्ड ट्रंप के लिए वोट किया है, रिपब्लिकन पार्टी को इसका फायदा मिला है. लेकिन इस बार ट्रंप की लोकप्रियता में काफी गिरावट देखने को मिल रही है. उनकी जॉब अप्रूवल रेटिंग करीब 39 फीसदी है, जबकि 61 फीसदी लोग उन्हें डिसअप्रूव कर रहे हैं. यानी अमेरिकी जनता ट्रंप प्रशासन के कामकाज से असंतुष्ट नजर आ रही है. लोगों को लग रहा है कि अमेरिका गलत दिशा में जा रहा है.

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(Photo- PEXELS)

ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट की एक बड़ी वजह महंगाई और ईरान युद्ध को माना जा रहा है. लोगों ने ट्रंप को इस उम्मीद में चुना था कि वह महंगाई कम करेंगे और युद्ध में अमेरिका को नहीं उलझाएंगे. लेकिन युद्ध अब तक खत्म नहीं हुआ है. इसके चलते डीजल और दूसरी चीजों की कीमतें बढ़ी हैं. इसे लेकर लोगों में नाराजगी है.

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ऐसे में माना जा रहा है कि रिपब्लिकन पार्टी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में अपना बहुमत खो सकती है. यहां तक कि सीनेट में भी उसे झटका लग सकता है. इसका खामियाजा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी को भुगतना पड़ सकता है.

क्या डेमोक्रेट्स दोनों सदनों पर कब्जा कर पाएंगे?

मिडटर्म चुनाव को लेकर दूसरा बड़ा सवाल यही है कि क्या डेमोक्रेट्स हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स यानी प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों में बहुमत हासिल कर पाएंगे. अगर अमेरिका के भरोसेमंद पोल्स की बात करें तो उनमें डेमोक्रेट्स के पक्ष में ब्लू वेव यानी डेमोक्रेट्स के समर्थन में बड़ी चुनावी लहर दिखाई दे रही है.

कुछ पोल्स में डेमोक्रेट्स को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में 250 तक सीटें मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है. वहीं, सीनेट में भी उनकी स्थिति पहले के मुकाबले मजबूत होती दिख रही है. करीब छह महीने पहले तक माना जा रहा था कि डेमोक्रेट्स शायद 50 या 51 सीटें ही जीत पाएंगे, लेकिन अब उनका आंकड़ा 53 से 54 सीटों तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है.

हालांकि, इन अनुमानों के साथ एक बात ध्यान में रखनी होगी. पोलिंग में रिपब्लिकन वोटर्स अक्सर अपनी पसंद जाहिर नहीं करते. वे फोन नहीं उठाते और सर्वे में जवाब नहीं देते. इसके उलट डेमोक्रेट्स के समर्थक बड़ी संख्या में पोल्स में हिस्सा लेते हैं. इसलिए सिर्फ सर्वे के आधार पर चुनाव का नतीजा तय नहीं माना जा सकता. असली तस्वीर चुनाव के नतीजों के बाद ही साफ होगी.

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(Photo- AFP)

रिपब्लिकन पार्टी की सबसे बड़ी ताकत और कमजोरी क्या है?

रिपब्लिकन पार्टी की सबसे बड़ी ताकत उसकी कंजर्वेटिव विचारधारा है. पार्टी का मानना है कि सरकार को कारोबार में दखल नहीं देना चाहिए. विदेश नीति के मामले में भी वह अमेरिका फर्स्ट की नीति लागू करने की बात करती है. इन्हीं मुद्दों के आधार पर पार्टी ने 2024 का चुनाव जीता था. उस समय रिपब्लिकन पार्टी के पास व्हाइट हाउस, सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में बहुमत था.

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लेकिन ट्रंप प्रशासन के फैसलों के बाद आर्थिक मोर्चे पर हालात उसके लिए चुनौती बन गए हैं. महंगाई अब भी ज्यादा है और जो कीमतें जो बाइडेन के कार्यकाल में बढ़ी थीं, वे कम नहीं हुई हैं. गैस की कीमतें दोगुनी हो चुकी हैं और डीजल भी काफी महंगा हुआ है.

लोगों के लिए घर खरीदना और किराया देना मुश्किल होता जा रहा है. खाने-पीने की चीजें भी महंगी हो गई हैं. लोगों के पास नौकरियां नहीं हैं और अफोर्डेबिलिटी यानी बुनियादी चीजों को खरीद पाने की क्षमता एक बड़ा मुद्दा बन गई है. इसके साथ ही ईरान युद्ध को लेकर भी लोगों में नाराजगी है. यही रिपब्लिकन पार्टी की सबसे बड़ी कमजोरी बन रहा है.

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हालांकि, पार्टी की एक ताकत अब भी कायम है. रिपब्लिकन पार्टी के मागा (MAGA) समर्थकों के बीच डोनाल्ड ट्रंप के लिए प्यार और भरोसा है. उनके समर्थकों को लगता है कि ट्रंप अमेरिका का कायापलट कर सकते हैं. यही समर्थन पार्टी को चुनाव में मजबूती दे सकता है.

डेमोक्रेट्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

डेमोक्रेट्स को ट्रंप प्रशासन के खिलाफ एंटी-इन्कंबेंसी यानी सत्ता विरोधी माहौल का फायदा मिल सकता है. पोल्स में भी पार्टी की स्थिति मजबूत दिखाई दे रही है. लेकिन उसकी सबसे बड़ी चुनौती अपने वोटर्स को मतदान केंद्रों तक लाने की होगी.

2016 के राष्ट्रपति चुनाव में ज्यादातर पोल्स में हिलेरी क्लिंटन की जीत का अनुमान लगाया गया था. लेकिन डेमोक्रेट्स के कई वोटर्स घर से बाहर नहीं निकले और उन्होंने मतदान नहीं किया. उन्होंने पोल्स पर भरोसा कर लिया था. इसलिए इस बार पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उसके समर्थक सर्वे के अनुमानों पर भरोसा करके घर न बैठ जाएं, बल्कि बड़ी संख्या में वोट डालें.

इसके अलावा डेमोक्रेट्स को इंडिपेंडेंट वोटर्स का भरोसा भी जीतना होगा. पार्टी को यह विश्वास दिलाना होगा कि वह 2024 के चुनाव में उठाए गए कुछ मुद्दों पर अपने पुराने रुख पर वापस नहीं जाएगी. उस समय ओपन बॉर्डर और इमिग्रेशन को लेकर डेमोक्रेट्स की काफी आलोचना हुई थी. इसके अलावा ट्रांसजेंडर नीतियों को लेकर भी पार्टी का रुख काफी उदार माना गया था. इस बार डेमोक्रेट्स इन मुद्दों पर पहले की तरह बात करते नहीं दिख रहे हैं. इस तरह डेमोक्रेट्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने वोटर्स को मतदान केंद्रों तक लाने और इंडिपेंडेंट वोटर्स का भरोसा जीतने की होगी.

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अगर ट्रंप की पार्टी हार गई तो क्या होगा?

मिडटर्म चुनाव का सबसे अहम सवाल यह है कि अगर रिपब्लिकन पार्टी दोनों सदनों में बहुमत खो देती है तो ट्रंप की सरकार कैसे काम करेगी. सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि मिडटर्म चुनाव में हारने का मतलब यह नहीं है कि डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति पद छोड़ना पड़ेगा. वह व्हाइट हाउस में बने रहेंगे.

हालांकि, कैपिटल हिल यानी अमेरिकी संसद की तरफ से ट्रंप प्रशासन की निगरानी बढ़ जाएगी. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ट्रंप के फैसले लेने की ताकत खत्म हो जाएगी. अमेरिका की विदेश नीति मुख्य रूप से एग्जीक्यूटिव ब्रांच यानी व्हाइट हाउस के अधिकार क्षेत्र में आती है. व्हाइट हाउस ही तय करता है कि अमेरिका की विदेश नीति क्या होगी. इसलिए अगर रिपब्लिकन पार्टी चुनाव हार भी जाती है तो ट्रंप की विदेश नीति पर इसका बहुत ज्यादा असर पड़ने की संभावना नहीं है.

अमेरिका फर्स्ट पॉलिसी, टैरिफ पॉलिसी, ट्रेड पॉलिसी और यहां तक कि युद्ध से जुड़े फैसले लेने की ताकत ट्रंप के पास बनी रहेगी. हालांकि, कैपिटल हिल की ओर से उनके फैसलों पर निगरानी बढ़ जाएगी.

घरेलू नीतियों के मामले में ट्रंप को डेमोक्रेट्स के साथ काम करना पड़ सकता है. पिछले दो साल में ट्रंप ने बहुत कम बड़े बिल पास कराए हैं. उन्होंने एक बिग ब्यूटीफुल बिल पास किया. इसके बाद बजट रिकंसिलिएशन बिल के जरिए कई बदलाव किए. इसके अलावा वह लगातार एग्जीक्यूटिव ऑर्डर जारी करके अमेरिका में नीतिगत बदलाव करते रहे हैं.

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अगर ट्रंप आगे सोशल प्रोग्राम और सुधारों से जुड़े बड़े बिल लाना चाहते हैं तो उन्हें डेमोक्रेट्स का समर्थन लेना पड़ सकता है. बजट रिकंसिलिएशन के दौरान भी डेमोक्रेट्स अपनी प्राथमिकताएं सामने रखेंगे. ऐसे में ट्रंप को यह देखना होगा कि किन प्रस्तावों से उनकी पार्टी और उसकी नीतियों को नुकसान हो सकता है.

कुल मिलाकर, अगर रिपब्लिकन पार्टी मिडटर्म चुनाव हारती है तो ट्रंप की विदेश नीति, व्यापार और टैरिफ से जुड़े फैसलों पर उनका नियंत्रण बना रह सकता है. लेकिन घरेलू नीतियों को लागू करना उनके लिए पहले से ज्यादा मुश्किल हो जाएगा. संसद की निगरानी बढ़ेगी, लेकिन इससे उनके एग्जीक्यूटिव ऑर्डर जारी करने की शक्ति खत्म नहीं होगी.

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