अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा झटका लगा है. विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने कई अहम सीटों पर जीत दर्ज की है. सबसे बड़ा उलटफेर टेक्सास में हुआ है. यहां रिपब्लिकन पार्टी का लंबे समय से दबदबा रहा है. इसके बावजूद डेमोक्रेट उम्मीदवार जेम्स टालारिको ने रिपब्लिकन केन पैक्सटन को हरा दिया. इस जीत के साथ डेमोक्रेट्स ने 30 साल से ज्यादा समय बाद टेक्सास की सीनेट सीट पर कब्जा जमाया है.
इस चुनाव में ट्रंप के दो करीबी माने जाने वाले उम्मीदवारों को भी हार का सामना करना पड़ा. भारतीय मूल के विवेक रामास्वामी ओहायो के. गवर्नर चुनाव में डेमोक्रेट एमी एक्टन से हार गए. वहीं, दक्षिण कैरोलिना की सीनेट सीट पर ट्रंप समर्थित डार्लिन ग्राहम को डेमोक्रेट एनी एंड्रयूज ने हरा दिया. इन नतीजों ने दिखा दिया है कि ट्रंप का समर्थन भी इस बार रिपब्लिकन उम्मीदवारों को जीत नहीं दिला सका.
टेक्सास में 30 साल बाद डेमोक्रेट पार्टी की वापसी
टेक्सास को रिपब्लिकन पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है. राष्ट्रपति चुनाव में भी ट्रंप ने यहां बड़ी बढ़त हासिल की थी. लेकिन मिड टर्म चुनाव में इस बार तस्वीर बदल गई. डेमोक्रेट जेम्स टालारिको ने रिपब्लिकन उम्मीदवार केन पैक्सटन को शिकस्त दी. 37 साल के टालारिको राज्य के विधायक और पूर्व मिडिल स्कूल शिक्षक हैं. वह प्रेस्बिटेरियन धर्मशास्त्र की पढ़ाई भी कर चुके हैं.
टालारिको की जीत इसलिए भी अहम है क्योंकि टेक्सास से आखिरी बार 1993 में डेमोक्रेट पार्टी का कोई नेता सीनेटर बना था. अब करीब 33 साल बाद पार्टी ने यहां फिर जीत दर्ज की है. टालारिको सीनेट के सबसे युवा सदस्य भी होंगे. वह लंबे समय से सीनेटर रहे जॉन कॉर्निन की जगह लेंगे.
इस चुनाव में पैक्सटन की इमेज भी बड़ा मुद्दा बनी. उनके खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच हुई थी. हालांकि, इस मामले में उन पर आरोप तय नहीं हुए. इसके अलावा, टेक्सास की विधानसभा में उन पर अपने पद का गलत इस्तेमाल कर एक राजनीतिक मददगार को फायदा पहुंचाने के आरोप लगे थे. बाद में राज्य की सीनेट ने उन्हें इन आरोपों से बरी कर दिया था.
ट्रंप के समर्थन के बाद भी नहीं जीते पैक्सटन
रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं को पहले से चिंता थी कि पैक्सटन की खराब इमेज की वजह से पार्टी को नुकसान हो सकता है. इसके बावजूद ट्रंप ने पार्टी के अंदर जॉन कॉर्निन के बजाय पैक्सटन का समर्थन किया था. लेकिन चुनाव में यह दांव काम नहीं आया.
टालारिको ने अपने प्रचार में आम लोगों के मुद्दों को उठाया. उन्होंने अरबपतियों के राजनीतिक प्रभाव पर सवाल खड़े किए. उनका कहना था कि अमीर लोगों का बढ़ता दखल आम अमेरिकियों के हितों को नुकसान पहुंचा रहा है. सोशल मीडिया पर उनके वीडियो भी काफी फेमस हुए. इससे उन्हें रिपब्लिकन और निर्दलीय वोटर्स का समर्थन हासिल करने में मदद मिली.
ट्रंप के दो और पसंदीदा उम्मीदवारों को हार
ओहायो के गवर्नर चुनाव में भारतीय मूल के विवेक रामास्वामी को डेमोक्रेट एमी एक्टन ने हरा दिया. रामास्वामी को ट्रंप का करीबी और पसंदीदा उम्मीदवार माना जाता था. यह चुनाव उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के गृह राज्य में हुआ. यहां रिपब्लिकन पार्टी के अंदर भी चुनाव को लेकर मतभेद सामने आए थे.
दूसरी ओर, दक्षिण कैरोलिना की सीनेट सीट पर डेमोक्रेट एनी एंड्रयूज ने ट्रंप समर्थित डार्लिन ग्राहम को हरा दिया. डार्लिन, दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम की बहन हैं. इस जीत के साथ डेमोक्रेट्स ने रिपब्लिकन पार्टी से एक और अहम सीट छीन ली.
जॉर्जिया में भी डेमोक्रेट्स को बड़ी कामयाबी मिली. कीशा लांस बॉटम्स राज्य की पहली ब्लैक महिला गवर्नर चुनी गईं. उन्होंने रिपब्लिकन उम्मीदवार रिक जैक्सन को हराया. वह अटलांटा की पूर्व मेयर रह चुकी हैं. इससे पहले वह पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन की सलाहकार भी थीं.
जॉर्जिया में डेमोक्रेट सीनेटर जॉन ओसॉफ ने भी अपनी सीट बचा ली. वहीं, नॉर्थ कैरोलिना में डेमोक्रेट रॉय कूपर ने रिपब्लिकन पार्टी से सीनेट सीट छीन ली. इन नतीजों ने सीनेट में बहुमत के लिए रिपब्लिकन पार्टी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं.
ट्रंप के लिए क्यों अहम हैं ये नतीजे?
अमेरिका के मिड टर्म चुनाव में प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की 37 सीटों पर मतदान हुआ. इसके अलावा, 36 राज्यों के गवर्नर पदों के लिए भी चुनाव हुए. इन नतीजों से तय होगा कि ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी संसद के दोनों सदनों में अपना नियंत्रण बनाए रख पाती है या नहीं.
चुनाव से पहले सामने आए सर्वे में अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र की स्थिति वोटर्स के लिए सबसे बड़े मुद्दे थे. शुरुआती सर्वे के मुताबिक, बड़ी संख्या में मतदाता देश की हालत और ट्रंप के कामकाज से खुश नहीं थे. ऐसे में टेक्सास जैसे मजबूत रिपब्लिकन राज्य में हार पार्टी के लिए बड़ा संकेत है. अगर डेमोक्रेट्स सीनेट और प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल करते हैं, तो ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बाकी दो साल में उनके लिए फैसले लेना और नीतियां लागू करना मुश्किल हो सकता है.
aajtak.in