सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच पिछले हफ्ते हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है. चर्चा से परिचित सऊदी के तीन सूत्रों के मुताबिक, रियाद ने इस रक्षा गठजोड़ में मिस्र को शामिल करने का विरोध किया था. सऊदी शाही परिवार के करीबी और पूर्व वरिष्ठ सलाहकार के हवाले से कहा गया है कि कम से कम सऊदी अरब फिलहाल मिस्र को इस समझौते का हिस्सा नहीं बनाना चाहता.
7 अगस्त को मक्का में हुए समझौते के तहत सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने माना है कि तीनों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला, सभी पर हमला माना जाएगा. हालांकि, समझौते में यह साफ नहीं किया गया है कि संकट की स्थिति में सैन्य मदद किस तरह दी जाएगी और ऑपरेशनल स्तर पर यह व्यवस्था कैसे लागू होगी.
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मिस्र से क्यों नाराज है सऊदी?
मिडिल ईस्ट आई की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब की नाराजगी मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल सिसी की सरकार के रुख को लेकर बढ़ी है. सऊदी पक्ष को लगता है कि अहम क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दों पर मिस्र ने उसे अपेक्षित समर्थन नहीं दिया. यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ लंबे संघर्ष में मिस्र की सीमित भूमिका और ईरान के खिलाफ हालिया युद्ध के दौरान उसके रुख को लेकर भी सऊदी निराश बताया जा रहा है.
एक पूर्व सऊदी सलाहकार ने आरोप लगाया कि मिस्र लंबे समय से सऊदी, अमेरिका और दूसरी बाहरी ताकतों पर निर्भर रहा है, लेकिन बदले में उतना सहयोग नहीं देता.
तुर्की चाहता था मिस्र भी बने हिस्सा
मिस्र को बाहर रखने के फैसले पर तुर्की का रुख अलग बताया जा रहा है. तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने कहा था कि काहिरा, अंकारा का स्वाभाविक साझेदार है और तकनीकी मुद्दे सुलझने के बाद भविष्य में इस गठजोड़ का हिस्सा बन सकता है. तुर्की के सूत्रों के मुताबिक, अंकारा ने मिस्र को शामिल कराने की कोशिश भी की थी.
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हालांकि, सऊदी सूत्रों का मानना है कि तुर्की और पाकिस्तान इस गठजोड़ को मिस्र की तुलना में ज्यादा सैन्य क्षमता दे सकते हैं. तुर्की का रक्षा उद्योग तेजी से बढ़ा है, जबकि पाकिस्तान के पास बड़ी स्थायी सेना और स्थापित रक्षा उत्पादन क्षमता है.
भविष्य के लिए दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं
रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि मिस्र को लेकर सऊदी का मौजूदा रुख स्थायी फैसला नहीं है. भविष्य में काहिरा को शामिल करने का रास्ता खुला रह सकता है, लेकिन फिलहाल रियाद चाहता है कि मक्का रक्षा समझौते की संरचना तीन देशों तक ही सीमित रहे. यह फैसला ऐसे समय हुआ है जब चारों देश जून में क्षेत्रीय मुद्दों पर साथ बैठक कर चुके हैं.
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