सऊदी अरब को भारत में लोग कैसे जानते हैं? अमीर देश, तेल का कुआं, रियाल की करेंसी, पैसा ही पैसा. ऊंची इमारतें, फर्राटा भरती SUV कारें. यानी की ऐसा मुल्क जहां बहुत पैसा है. खबरों में हम देखते-पढ़ते हैं कि सऊदी अरब दुनिया भर में अपना पैसा लगाता है, जिस मुल्क को कर्जे की जरूरत होती है तो सऊदी अरब के पास जाता है. पाकिस्तान को सऊदी अरब परमानेंट फाइनेंशर है.
लेकिन शेखों के मुल्क की तस्वीर इतनी भी गुलाबी नहीं है. सऊदी अरब को अब मोटे कर्जे की जरूरत पड़ गई है. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब 8 अरब डॉलर का भारी-भरकम लोन लेने की तैयारी कर रहा है. 8 अरब डॉलर को अगर रुपयों में देखें तो लगभग 7.6 खरब रुपये होते हैं.
दरअसल ईरान युद्ध ने सऊदी अरब की इकोनॉमी पर तगड़ा दवाब डाला है. इस युद्ध के आर्थिक असर के बीच, सऊदी अरब नए लोन से कम से कम 8 अरब डॉलर जुटाने के लिए शुरुआती बातचीत कर रहा है. वह फंडिंग के अलग-अलग सोर्स बनाने की कोशिशें तेज़ कर रहा है.
आइए पूरे मामले को समझते हैं
सऊदी अरब लंबे समय से विश्व का सबसे बड़ा तेल निर्यातक और मध्य पूर्व का वित्तीय महाशक्ति रहा है. सॉवरेन वेल्थ फंड के जरिये सऊदी अरब दुनिया भर में निवेश करता रहा है और विकासशील देशों को सहायता और कर्जे मुहैया कराता रहा है.
सऊदी अरब अब खुद बड़े पैमाने पर ऋण जुटाने की कोशिश में जुटा है. दरअसल क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के महात्वाकांक्षी विजन 2030 को फंड करने के लिए सऊदी किंगडम को 'तगड़े लोन' की जरूरत पड़ रही है.
सऊदी अरब का नेशनल डेट मैनेजमेंट सेंटर (NDMC) कम से कम 8 अरब डॉलर के नए सिंडिकेटेड लोन के लिए बैंकों से बातचीत कर रहा है. सऊदी की सरकारी तेल कंपनी अरामको भी इसी तरह के फाइनेंसिंग विकल्पों पर चर्चा कर रही है.
ईरान युद्ध से तगड़ा नुकसान
सऊदी अरब को पैसे की जरूरत इसलिए पैदा हुई क्योंकि क्षेत्रीय युद्ध (ईरान से जुड़े संघर्ष) ने तेल निर्यात, व्यापार मार्गों (खासकर होर्मुज स्ट्रेट ) और सप्लाई चेन पर दबाव डाला है. इसकी वजह से सऊदी का निर्यात कम हुआ है.
तेहरान ने सऊदी अरब के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया है, जबकि ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में जहाजों के लिए खतरा पैदा कर दिया है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से सऊदी तेल की ब्रिकी कम हो गई है, जबकि हूती विद्रोहियों की वजह से बाब अल मंदेब भी बंद रहता है.
इस बीच कोरोना महामारी के बाद से दूसरी तिमाही में सऊदी अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ी गिरावट देखी गई; इन हमलों की वजह से तेल सेक्टर में लगभग 25% की गिरावट आई. यहां बताना चाहेंगे कि सऊदी अरब की कमाई का सबसे बड़ा स्रोत कच्चे तेल की बिक्री ही है.
हालांकि कच्चे तल की कीमतों में इजाफा होने से सऊदी को कुछ राहत भी मिली है.
इससे पहले 2025 के अंत में NDMC ने 13 अरब डॉलर का सात साल का सिंडिकेटेड लोन जुटाया था, जो बिजली, पानी और सार्वजनिक उपयोगिता परियोजनाओं के लिए था.
2026 की वार्षिक उधार योजना में वित्त मंत्रालय ने लगभग 58 अरब डॉलर की कुल फाइनेंसिंग जरूरत बताई है. यानी सऊदी को इतना पैसा चाहिए. इसमें करीब 44 अरब डॉलर का बजट घाटा और 14 अरब डॉलर के कर्ज से हासिल करना शामिल है.
सऊदी अरब को इतना पैसा चाहिए क्यों?
सऊदी अरब को इतने हैवी पैसे की जरूरत की वजह उसका विजन 2030 है. 2016 में एमबीएस द्वारा शुरू की गई इस योजना का लक्ष्य तेल निर्भरता कम करके पर्यटन, मनोरंजन, मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स और प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में अर्थव्यवस्था को कई क्षेत्रों में ले जाना है. क्राउन प्रिंस सलमान नहीं चाहते हैं कि जब सऊदी का कच्चा तेल खत्म हो जाए तो उसे अचानक आर्थिक तकलीफों का सामना करना पड़े. इसलिए सलमान समय रहते ही सऊदी की अर्थव्यवस्था को और क्षेत्रों के लिए खोलना चाहते हैं.
इस प्रोजेक्ट को लेकर वे इतने जुनूनी है कि उन्होंने कहा था कि 'दुनिया में कोई ताकत विजन 2030 को विफल नहीं कर सकती.'
इस प्रोजेक्ट के तहत ही सलमान नेओम, रेड सी प्रोजेक्ट, क़िद्दिया जैसे गिगा-प्रोजेक्ट्स पर सैकड़ों अरब डॉलर खर्च कर रे हैं. इसमें कुल निवेश की जरूरत एक ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा आंकी गई है. लेकिन तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव और उत्पादन कटौती ने सऊदी की कमाई को प्रभावित किया है. 2026 की पहली तिमाही में बजट घाटा 33.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया.
सऊदी सुरक्षा के मोर्चे पर भी भारी भरकम निवेश कर रहा है. 2024 में सऊदी अरब का रक्षा बजट लगभग 75.8 अरब अमेरिकी डॉलर रहा, जबकि 2025 में ये रकम लगभग 78 अरब अमेरिकी डॉलर थी. यह कुल सरकारी खर्चे का करीब 21% और GDP का लगभग 7.1% था.
सैन्य और बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ने से सऊदी इकोनॉमी डवांडोल हो रही है.
कर्ज का स्तर और जोखिम
सऊदी अरब का सार्वजनिक कर्ज बढ़ रहा है, लेकिन अभी भी नियंत्रित है. 2026 के मध्य तक यह लगभग करीब 450 अरब डॉलर तक पहुंच चुका था. सऊदी का कर्ज-से-जीडीपी अनुपात 30-40 प्रतिशत के आसपास है, जो अमेरिका या कई यूरोपीय देशों से काफी कम है. रेटिंग एजेंसियां जैसे एसएंडपी, फिच, मूडीज अभी भी सऊदी को निवेश ग्रेड A+/Aa3 कैटेगरी में रखती हैं और आउटलुक स्थिर बताती हैं. फिर भी विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि लगातार घाटा और भारी उधार लंबे समय में दिक्कतें पैदा कर सकती हैं.
एक तरफ सऊदी अरब अभी भी विकासशील देशों को सहायता देता है. बुनियादी इन्फ्रा के लिए पैसे देती है, जैसे-फीफा इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए 1 अरब डॉलर. दूसरी तरफ खुद बाजारों से पूंजी जुटा रहा है. इसका मतलब यह है कि सऊदी ने 2030 के लिए जो सपना देखा है वो फिलहाल तेल की कमाई से पूरी नहीं हो पा रही है.
पन्ना लाल