ईरान को खाड़ी देशों से कैसे मिलेंगे $300 बिलियन? कतर ने 3 पॉइंट में समझाया पूरा प्लान

कतर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी ने खाड़ी देशों से ईरान के आर्थिक सुधार के लिए निवेश और वित्तीय सहायता की उम्मीद जताई है. ये प्रस्तावित 300 अरब डॉलर के निवेश कोष का हिस्सा हो सकता है, जिसका मकसद युद्ध के बाद ईरान की अर्थव्यवस्था को दोबारा सुधारना है.

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कतर से प्रधानमंत्री ने खाड़ी देशों से ईरान की मदद की उम्मीद जताई. (Photo- Reuters) कतर से प्रधानमंत्री ने खाड़ी देशों से ईरान की मदद की उम्मीद जताई. (Photo- Reuters)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 24 जून 2026,
  • अपडेटेड 12:33 PM IST

कतर का मानना है कि खाड़ी देशों से ईरान से जुड़े इन्वेस्टमेंट मैकेनिज्म को फंड करने में मदद के लिए कहा जा सकता है. कतर के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी ने खुद इस पर सहमति जताई है.

अल जजीरा की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अब्दुलरहमान अल थानी का मानना है कि खाड़ी राज्य, ईरान के आर्थिक सुधार के लिए वित्तीय मदद दे सकते हैं. कतर के प्रधानमंत्री की ये टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी है. 

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दरअसल ये प्रस्तावित ढांचा 300 अरब डॉलर के निवेश कोष की रिपोर्टों से जुड़ा हुआ है. इस फंड का मकसद जंग के बाद ईरान की अर्थव्यवस्था को संभालना और वहां मची अफरा-तफरी को संभालना है.

ईरान और अमेरिका के बीच मिडिएटर बना कतर

इस मामले में कतर ईरान और अमेरिका के बीच मिडिएटर की तरह काम कर रहा है. इसके साथ ही, कतर ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों को रिलीज कराने और क्षेत्र में तनाव कम करने से जुड़ी वार्ताओं में भी सीधे तौर पर शामिल रहा है.

कतर ने खाड़ी देशों को तीन सुझाव दिए हैं, जिसके जरिए वो ईरान की मदद कर सकते हैं.

  • खाड़ी देश कई इन्वेस्टमेंट प्रोजेक्ट्स के जरिए ईरान मदद कर सकते हैं.
  • वो फाइनेंसिंग मैकेनिज्म का हिस्सा बन सकते हैं,
  • खाड़ी देश आर्थिक विकास से जुड़ी पहलों में सहयोग दे सकते हैं.

यह भी पढ़ें: पहले ईरान जंग और अब पीस डील... बुरे फंसे ट्रंप, अपने ही सहयोगियों पर निकाला गुस्सा

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वार्ता के नतीजों पर टिका है भविष्य

हालांकि, इस योजना को लेकर अभी तक किसी भी तरह की कमिटमेंट या फंडिंग का ऐलान नहीं हुआ है. ऐसे किसी भी फंड का बनना पूरी तरह से अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत के अंतिम नतीजों पर ही निर्भर करेगा. ये इस बात पर भी निर्भर करेगा कि दोनों देशों के बीच होने वाले अंतिम समझौते को किस तरह लागू किया जाता है.

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