‘हिंदुत्व का आधार नफरत नहीं, शुद्ध सात्त्विक प्रेम है’, लंदन में बोले मोहन भागवत

ब्रिटेन के लंदन में एकता का जश्न कार्यक्रम आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत शामिल हुए. उन्होंने हिंदुत्व, सेवा और समाज के भविष्य पर अपने विचार साझा किए. उन्होंने संघ की सोच का आधार शुद्ध सात्त्विक प्रेम और अपनापन बताया. भागवत ने कहा कि हिंदू सोच में परिवार, समाज, मानवता और प्रकृति एक-दूसरे से जुड़े हैं.

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 लंदन में RSS सुप्रीमो मोहन भागवत एकता का जश्न कार्यक्रम में शामिल हुए. (Photo-X/@RSS) लंदन में RSS सुप्रीमो मोहन भागवत एकता का जश्न कार्यक्रम में शामिल हुए. (Photo-X/@RSS)

aajtak.in

  • लंदन,
  • 07 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 12:21 AM IST

RSS सुप्रीमो मोहन भागवत ब्रिटेन दौरे पर है. लंदन में रविवार को वे एकता का जश्न (Celebration Oneness) कार्यक्रम में शामिल हुए. इस कार्यक्रम में उन्होंने हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र, सेवा और समाज के भविष्य पर अपनी बात रखी. 

उन्होंने कहा कि संघ के काम का आधार नफरत नहीं है. इसके उलट इसका आधार शुद्ध सात्त्विक प्रेम है. समाज में लोगों को जोड़ना और सभी के प्रति अपनापन रखना संघ की सोच का हिस्सा है.

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भागवत ने कहा कि अपनापन संघ को समझने की सबसे अहम कुंजी है. हिंदू की सोच में परिवार, समाज, मानवता और प्रकृति सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं. हिंदू केवल पूजा करने वाला व्यक्ति नहीं है. वह प्रकृति से भी प्रेम करता है. इसलिए इंसान को प्रकृति पर विजय पाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. इंसान खुद प्रकृति का हिस्सा है.

'व्यक्ति, समाज और प्रकृति साथ आगे बढ़ें'

RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि विकास केवल व्यक्ति का नहीं होना चाहिए. व्यक्ति, समाज, मानवता और प्रकृति सभी की एक साथ प्रगति जरूरी है. अगर केवल व्यक्ति को महत्व दिया गया तो समाज कमजोर होगा. अगर केवल समाज को महत्व दिया गया तो व्यक्ति की स्वतंत्रता खत्म हो सकती है. इसलिए दोनों के बीच संतुलन बना रहे ये बहुत जरूरी है.

उन्होंने कहा कि हिंदू विचार में दुनिया को एक इकाई के रूप में देखने की बात है. इसी वजह से अलग-अलग विचारों और विविधताओं को स्वीकार करने की भावना पैदा होती है. विविधता स्वाभाविक है. लेकिन उसके पीछे एकता को देखना जरूरी है. उनका संदेश था कि जो बात लोगों को जोड़ती है, उस पर ज्यादा जोर होना चाहिए.

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हिंदू राष्ट्र और हिंदुत्व पर पूछे गए सवाल के जवाब में भागवत ने कहा कि हिंदू को केवल धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं समझा जा सकता. उन्होंने इसे एक प्रकृति और सोच बताया. उनका कहना है कि भारत में नास्तिक से लेकर आस्तिक और अलग-अलग विचार रखने वाले लोग रहे हैं. हिंदू सोच का दावा है कि अलग-अलग रास्तों को स्वीकार किया जा सकता है.

भागवत ने राष्ट्र और ‘नेशन’ में भी अंतर बताया. उन्होंने कहा कि आधुनिक अर्थ में नेशन अक्सर एक राज्य और उसकी व्यवस्था से जुड़ा होता है. लेकिन ‘राष्ट्र’ का आधार केवल शासन व्यवस्था नहीं है. इसके पीछे एक उद्देश्य और साझा चेतना होती है.

भागवत ने कहा कि हिंदू राष्ट्र का उद्देश्य दुनिया को यह बताना है कि विविधता स्वाभाविक है और एकता वास्तविकता है. भारत में राजाओं और शासन व्यवस्थाओं में बदलाव होते रहे. कभी गणराज्य रहे और कभी विदेशी शासन भी रहा. लेकिन भारत की सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना बनी रही.

उन्होंने कहा कि भारत की प्रगति का मतलब किसी दूसरे देश के खिलाफ जाना नहीं है. बल्कि भारत आगे बढ़े तो उसका फायदा पूरी दुनिया को मिलना चाहिए. उन्होंने कहा कि भारत की प्रगति शांति, समृद्धि और मानवता के लिए होनी चाहिए.

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ब्रिटेन में रहने वाले हिंदुओं को कर्मभूमि के प्रति वफादारी का दिया संदेश

ब्रिटेन में रहने वाले हिंदुओं को लेकर भागवत ने कहा कि उनकी कर्मभूमि जहां है, उसके प्रति वफादार रहना चाहिए. ब्रिटिश हिंदू ब्रिटेन के साथ जाएं और अपने देश के प्रति ईमानदार रहें. भारत से जुड़ाव रखने और ब्रिटेन के प्रति निष्ठावान रहने में कोई विरोधाभास नहीं है.

उन्होंने कहा कि थिंक ग्लोबली, एक्ट लोकली की भावना के साथ काम किया जा सकता है. अगर किसी के पास समय और साधन हैं तो वह भारत की सेवा कर सकता है. लेकिन इससे उसकी कर्मभूमि के प्रति जिम्मेदारी खत्म नहीं होती.

भागवत ने सेवा को भी संघ की सोच का अहम हिस्सा बताया. उन्होंने कहा कि सेवा किसी पर उपकार करना नहीं है. सेवा करने वाले को खुद इसे सौभाग्य समझना चाहिए. उन्होंने कहा कि अच्छी सेवा वह है जिसमें जिसे मदद मिल रही है, वह आगे चलकर खुद दूसरों की मदद करने वाला बन जाए.

उन्होंने युवाओं पर भरोसा जताया. कहा कि नई पीढ़ी में दुनिया को बेहतर बनाने की इच्छा है. युवाओं को उद्देश्य देना चाहिए.अनुभव शेयर करना चाहिए. लेकिन उनके ऊपर अपने तरीके नहीं थोपने चाहिए. उन्हें अपना रास्ता खोजने का अवसर मिलना चाहिए. आने वाली पीढ़ियां देश और दुनिया के लिए बेहतर काम कर सकती हैं.

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