पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच हुए मक्का समझौते को लेकर अब राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन की विरोधी नेता ने मोर्चा खोल दिया. तुर्की की संसद में इस समझौते को मंजूरी देने के लिए चर्चा के दौरान जमकर हंगामा और तीखी बहस देखने को मिली. विपक्षी सांसदों ने सवाल उठाया कि आखिर तुर्की किस आधार पर पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ ऐसी सैन्य प्रतिबद्धता में बंध रहा है, जिसके नतीजे भविष्य में उसे किसी दूसरे देश की जंग में भी खींच सकते हैं. कुर्द पार्टी की एक महिला नेता ने तो साफ कह दिया कि वे आंखों पर पट्टी बांधकर किसी जंग में शामिल होने के लिए तैयार नहीं हैं.
दरअसल, तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए मक्का समझौते के तहत तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला बाकी दोनों देशों पर हमला माना जाएगा. यानी किसी एक देश पर हमला होने की स्थिति में तीनों के बीच संयुक्त रक्षा की जिम्मेदारी होगी. समझौते में एक और अहम शर्त है. इसके तहत शुरुआती 10 साल तक कोई भी देश सामान्य प्रक्रिया के जरिए इससे बाहर नहीं निकल सकेगा.
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'भारत और पाकिस्तान के बीच क्या होगा, कौन जानता है?'
तुर्की की DEM पार्टी की सांसद सेयलान अकचा कुपोलो ने समझौते पर सवाल उठाते हुए कहा, "हम आंखों पर पट्टी बांधकर जंग में जाने से इनकार करते हैं." उनका सवाल था कि जब समझौते की सैन्य जिम्मेदारियां पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं तो तुर्की इसे मंजूरी क्यों दे रहा है?
एर्दोगन की विरोधी नेता ने सवाल उठाया कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच जंग होती है और भारत पाकिस्तान पर हमला करता है, तो क्या इसे भी उन पर हमला माना जाएगा? उन्होंने कहा कि दोनों देशों के पास परमाणु हथियार हैं और उनके बीच लगातार टकराव होता रहता है. ऐसे में क्या वे पाकिस्तान की तरफ से इस जंग में शामिल होंगे? उन्होंने कहा, "अगर इंडिया कल या परसों पाकिस्तान पर हमला करता है, तो क्या इसे भी हम पर हमला माना जाएगा?"
DEM पार्टी की नेता ने पूछा कि जब न तो संसद ने और न ही जनता ने ऐसा कोई फैसला किया है, तो वे अचानक भारत-पाकिस्तान के बीच जंग का हिस्सा क्यों बनें? उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अगर ईरान के खिलाफ कंटेनमेंट ऑपरेशन किया गया था, जैसा कि अक्सर चर्चा होती है, तो ईरान के साथ उनकी करीब 500 किलोमीटर लंबी सीमा भी है.
वहीं, विपक्षी İYİ पार्टी के सांसद लुत्फू तुर्ककान ने 10 साल तक समझौते से बाहर न निकल पाने की शर्त को बेहद गंभीर बताया. उन्होंने कहा कि अगले 10 साल में मिडिल ईस्ट में कई जंग हो सकती हैं, सरकारें बदल सकती हैं और गठबंधन बन या टूट सकते हैं. उन्होंने खास तौर पर पाकिस्तान और भारत के रिश्तों का जिक्र करते हुए सवाल उठाया कि भविष्य में दोनों देशों के बीच हालात किस दिशा में जाएंगे, यह कोई नहीं जानता. ऐसे में तुर्की खुद को 10 साल तक इस समझौते से बांधकर क्यों रखे?
तुर्ककान ने कहा कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ दोस्ताना रिश्ते रखने, रक्षा उद्योग में सहयोग करने, सैन्य ट्रेनिंग और खुफिया जानकारी साझा करने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन तुर्की के भविष्य को अनिश्चित सैन्य जिम्मेदारियों के हवाले करना अलग बात है.
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संसद में अलग-अलग दलों के अलग रुख
न्यू पाथ पार्टी के सांसद हसन कराल ने समझौते में सैनिक भेजने से जुड़े प्रावधानों और इस पूरी प्रक्रिया में संसद की निगरानी को लेकर सवाल उठाए. वहीं, MHP ने समझौते का समर्थन करने का ऐलान किया. इस तरह मक्का समझौते पर तुर्की की संसद में राजनीतिक दलों के बीच साफ मतभेद सामने आए हैं.
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