'इस्लामिक NATO' और मजबूत! जुड़ने को बेसब्र अरब दुनिया की सबसे बड़ी सेना वाला देश

मक्का पैक्ट में मिस्र के शामिल होने की संभावना से पाकिस्तान की रणनीतिक ताकत बढ़ सकती है. सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान के इस रक्षा गठबंधन को विश्लेषक मुस्लिम NATO के तौर पर देख रहे हैं. हालांकि, इसे आधिकारिक तौर पर भारत के खिलाफ गठबंधन नहीं बताया गया है.

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मक्का पैक्ट में मिस्र की संभावित एंट्री से पाकिस्तान की बढ़ सकती है रणनीतिक ताकत. (file Photo: Reuters) मक्का पैक्ट में मिस्र की संभावित एंट्री से पाकिस्तान की बढ़ सकती है रणनीतिक ताकत. (file Photo: Reuters)

सुमित चौधरी

  • नई दिल्ली,
  • 14 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 11:22 PM IST

मध्य पूर्व में एक नई सुरक्षा व्यवस्था उभरती दिख रही है. मिस्र अब मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में शामिल होने के करीब पहुंच गया है, जबकि पाकिस्तान को उस उभरते गठबंधन का रणनीतिक केंद्र माना जा रहा है, जिसे एनालिसिस मुस्लिम NATO बता रहे हैं.

सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान ने 7 अगस्त को मक्का में त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. इस समझौते के तहत तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला सभी पर हमला माना जाएगा. यह सामूहिक रक्षा की व्यवस्था NATO के Article 5 जैसी है. अब मिस्र के शामिल होने की संभावना से यह गठबंधन पूर्वी भूमध्य सागर, लाल सागर, फारस की खाड़ी और दक्षिण एशिया तक फैले चार देशों के समूह का रूप ले सकता है.

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मिस्र के विदेश मंत्री बद्र अब्देलअती ने गुरुवार को कहा कि काहिरा इस समझौते में शामिल होने पर गंभीरता से विचार कर रहा है. हालांकि, रक्षा दायित्वों से जुड़े संवैधानिक और कानूनी पहलुओं की समीक्षा अभी बाकी है. तुर्किए के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने मिस्र को सभी मुद्दों पर स्वाभाविक साझेदार बताया और कहा कि कुछ तकनीकी मामलों के सुलझने के बाद काहिरा के शामिल होने की उम्मीद है.

अरब दुनिया की सबसे बड़ी सेना वाले मिस्र के शामिल होने से मक्का समझौता एक क्षेत्रीय व्यवस्था से आगे बढ़कर कई क्षेत्रों में ताकत दिखाने वाले बड़े सुरक्षा गठबंधन का रूप ले सकता है. हालांकि, शुरुआत में सऊदी अरब मिस्र को शामिल करने के पक्ष में नहीं था, क्योंकि इससे उसके कूटनीतिक संतुलन की रणनीति जटिल हो सकती थी. दूसरी ओर, तुर्की ने मिस्र की सदस्यता के लिए जोर दिया.

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पाकिस्तान की भूमिका काफी अहम

इस उभरती व्यवस्था में पाकिस्तान की भूमिका सिर्फ एक जूनियर पार्टनर की नहीं है. गठबंधन का एकमात्र परमाणु हथियार संपन्न देश होने के कारण पाकिस्तान की रणनीतिक भूमिका सबसे अहम मानी जा रही है. उसकी भौगोलिक स्थिति दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व को जोड़ती है, जिससे फारस की खाड़ी, मध्य एशिया और हिंद महासागर की दिशा में तेजी से सैन्य क्षमता बढ़ाई जा सकती है.

यह समझौता सितंबर 2025 में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए द्विपक्षीय रक्षा समझौते पर भी आगे बढ़ता है. दोनों देशों के बीच पहले से संयुक्त सैन्य अभ्यास, खुफिया जानकारी साझा करने और रक्षा उत्पादन में सहयोग शामिल है.

मक्का समझौते को अमेरिका के नेतृत्व वाली सुरक्षा व्यवस्था से अलग, मल्टीपोलर और क्षेत्रीय स्तर पर तैयार हो रही नई व्यवस्था की दिशा में बड़ा बदलाव माना जा रहा है. अगर मिस्र इसमें शामिल होता है तो यह समूह एक तरह के 'Middle East NATO' का रूप ले सकता है, जिसमें पाकिस्तान परमाणु क्षमता के साथ रणनीतिक केंद्र होगा. हालांकि, इससे पाकिस्तान की क्षेत्रीय भूमिका बढ़ेगी, लेकिन उसके मिडिल ईस्ट के संघर्षों में और गहराई से जुड़ने का जोखिम भी रहेगा.

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