अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल को सुझाव दिया है कि लेबनान में हिज्बुल्लाह के खिलाफ जारी सैन्य कार्रवाई सीरिया को करने दी जाए. ट्रंप का मानना है कि सीरिया की नई सरकार हिज्बुल्लाह के खिलाफ इजरायल से ज्यादा प्रभावी तरीके से कार्रवाई कर सकती है. हालांकि इस प्रस्ताव ने लेबनान और इजरायल दोनों में नई चिंताएं पैदा कर दी हैं. सीरिया में करीब डेढ़ साल पहले राष्ट्रपति बशर अल-असद की सरकार के पतन के बाद अहमद अल-शरा के नेतृत्व में नई सरकार बनी थी.
ट्रंप ने हाल ही में G7 शिखर सम्मेलन के दौरान कहा था कि इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच युद्ध काफी लंबा खिंच चुका है और इसमें बहुत ज्यादा लोग मारे जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि इजरायल को हर बार किसी एक व्यक्ति को निशाना बनाने के लिए पूरी इमारत गिराने की जरूरत नहीं है. ट्रंप ने यह भी कहा कि उन्होंने इजरायल को सलाह दी है कि वह हिज्बुल्लाह से निपटने का काम सीरिया को सौंप दे. हालांकि सीरियाई राष्ट्रपति अहमद अल-शरा ने इन दावों को खारिज किया है.
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दमिश्क में दिए एक बयान में उन्होंने कहा कि सीरिया की लेबनान में हस्तक्षेप करने या वहां सैन्य कार्रवाई करने की कोई योजना नहीं है. अल-शरा ने कहा कि ट्रंप के बयान को गलत तरीके से समझा गया. उनके मुताबिक, सीरिया ने अमेरिका के सामने केवल यह प्रस्ताव रखा था कि क्षेत्र में युद्ध खत्म हो और लेबनान तथा सीरिया में स्थिरता कायम की जाए. अल-शरा ने यह भी कहा कि उनकी सरकार किसी पुराने विवाद का बदला लेने की राजनीति नहीं करना चाहती.
बता दें कि सीरिया के गृहयुद्ध के दौरान हिज्बुल्लाह और ईरान ने बशर अल-असद की सरकार का समर्थन किया था, जबकि अल-शरा विद्रोही गुटों का नेतृत्व कर रहे थे. इसके बावजूद नई सीरियाई सरकार ने सत्ता में आने के बाद से खुद को क्षेत्रीय संघर्षों से दूर रखने की कोशिश की है. इस बीच इजरायल भी सीरिया की नई सरकार को लेकर सतर्क नजर आ रहा है. इजरायल को आशंका है कि सीरिया एक बार फिर लेबनान की राजनीति में प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर सकता है.
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वहीं तुर्किये भी सीरिया की नई सरकार का समर्थन कर रहा है, जिससे क्षेत्रीय तनाव और बढ़ गया है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि ट्रंप का यह प्रस्ताव मध्य पूर्व में सांप्रदायिक तनाव बढ़ा सकता है. लेबनान में पहले से ही सीरिया के पुराने सैन्य कब्जे की यादें और राजनीतिक तनाव मौजूद हैं. ऐसे में सीरिया की संभावित भूमिका को लेकर वहां अलग-अलग समुदायों में चिंता बढ़ रही है.
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