मिशिगन के सीनेट चुनाव ने अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी के अंदर चल रही वैचारिक लड़ाई को एक बार फिर सामने ला दिया है. 41 साल के अब्दुल अल-सईद ने डेमोक्रेटिक प्राइमरी में पार्टी की एस्टेब्लिशमेंट उम्मीदवार हेली स्टीवंस को हरा दिया. अब नवंबर में उनका मुकाबला रिपब्लिकन उम्मीदवार और पूर्व सांसद माइक रोजर्स से होगा. अगर अब्दुल यह चुनाव जीतते हैं तो वह अमेरिका के इतिहास में पहले मुस्लिम सीनेटर बन सकते हैं. आइए जानते हैं कि अब्दुल सईद कैसे एक और ममदानी साबित हो सकते हैं.
अब्दुल सईद की जीत को न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है. दोनों मुस्लिम नेता हैं और दोनों ही डेमोक्रेटिक पार्टी के पारंपरिक ढांचे से अलग प्रोग्रेसिव राजनीति करते हैं. हालांकि, ममदानी ने खुद 'मिनी ममदानी' वाली तुलना को खारिज करते हुए अब्दुल को उनकी अपनी पहचान वाला नेता बताया है. उन्होंने अब्दुल को जीत की बधाई दी और कहा कि कामकाजी लोगों, महंगाई और स्वास्थ्य सेवा पर उनका फोकस अहम है.
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कौन हैं अब्दुल अल-सईद?
अब्दुल अल-सईद का जन्म मिशिगन में हुआ और वह डेट्रॉयट इलाके में पले-बढ़े. वह मिस्र से आए परिवार के बेटे हैं. उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन से पढ़ाई की और बाद में मेडिकल डिग्री और पब्लिक हेल्थ में डॉक्टरेट हासिल की. वह डेट्रॉयट के पब्लिक हेल्थ डायरेक्टर और वेन काउंटी के हेल्थ डायरेक्टर भी रह चुके हैं.
उनकी राजनीति का सबसे बड़ा आधार आम लोगों की आर्थिक मुश्किलें हैं. अब्दुल 'मेडिकेयर फॉर ऑल', सस्ती स्वास्थ्य सेवा, मुफ्त चाइल्ड केयर और अरबपतियों पर ज्यादा टैक्स की वकालत करते हैं. वह राजनीति में बड़े कॉरपोरेट और अरबपति डोनर्स के प्रभाव के भी मुखर विरोधी हैं. उनका कहना है कि सरकार का पैसा आम अमेरिकियों की जिंदगी बेहतर करने पर खर्च होना चाहिए.
गाजा और इजरायल पर बेहद सख्त रुख
अब्दुल की राजनीति का सबसे विवादित हिस्सा इजरायल और गाजा को लेकर उनका रुख है. वह गाजा में इजरायली कार्रवाई को 'नरसंहार' बता चुके हैं और अमेरिका से इजरायल को दी जाने वाली सैन्य मदद रोकने की मांग करते हैं. उनका तर्क है कि अमेरिकी टैक्स का पैसा विदेशों में युद्ध के लिए भेजने के बजाय अमेरिका में स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और दूसरी जरूरतों पर खर्च होना चाहिए.
अब्दुल ने इजरायली सरकार को लेकर बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया है और इजरायल के एक यहूदी राष्ट्र के रूप में अस्तित्व के सवाल पर भी पारंपरिक डेमोक्रेटिक नेताओं से अलग रुख रखा है.
यही वजह है कि मिशिगन के यहूदी समुदाय के कुछ संगठनों और नेताओं ने उनके बयानों की आलोचना कर चुके हैं. वहीं अब्दुल का कहना है कि वह यहूदी-विरोध के खिलाफ हैं और इजरायल की सरकार की आलोचना को यहूदी लोगों से नफरत के बराबर नहीं माना जाना चाहिए.
ट्रंप ने बताया 'यहूदियों से नफरत करने वाला'
अब्दुल की जीत के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन पर सीधा हमला किया. लास वेगास में ट्रंप ने उन्हें 'यहूदियों और इजरायल से नफरत करने वाला' बताया. ट्रंप ने कहा कि अब्दुल के दिल में यहूदियों के लिए नफरत की आग है. उन्होंने अब्दुल को 'मैन ऑफ हेट' कहा और बाद में उन्हें 'कम्युनिस्ट' बताते हुए उनकी राजनीति पर भी हमला बोला. इन आरोपों के समर्थन में ट्रंप ने कोई सबूत पेश नहीं किया.
ट्रंप ने यह भी दावा किया कि नवंबर में रिपब्लिकन उम्मीदवार माइक रोजर्स अब्दुल को हरा देंगे. अब्दुल की तरफ से यह आरोप खारिज किए गए हैं. जीत के बाद उन्होंने कहा कि यहूदी समुदाय की सुरक्षा को लेकर उनकी प्रतिबद्धता उनके अपने बच्चों की सुरक्षा जितनी ही गंभीर है और वह यहूदी-विरोध और इस्लामोफोबिया दोनों के खिलाफ हैं.
ट्रंप की ICE नीति के भी विरोधी
अब्दुल सिर्फ इजरायल के मुद्दे पर ही ट्रंप से टकराते नजर नहीं आते. वह ट्रंप प्रशासन की इमिग्रेशन नीति और ICE के भी बड़े आलोचक हैं. उन्होंने ICE को 'पैरामिलिट्री फोर्स' बताते हुए इसे खत्म करने की मांग की है. उनका आरोप है कि ट्रंप प्रशासन इमिग्रेशन के नाम पर ऐसी ताकत खड़ी कर रहा है जो आम लोगों के बीच डर पैदा करती है.
भारत से क्या कनेक्शन है?
अब्दुल का भारत से कोई बड़ा घोषित राजनीतिक एजेंडा सामने नहीं आया है. हालांकि, उनके परिवार का भारत से निजी संबंध जरूर है. उनकी पत्नी सारा जुकाकु के नाम भारत के बेंगलुरु में संपत्ति दर्ज है, जिसे उनके चुनावी वित्तीय दस्तावेजों में भी बताया गया है. अब्दुल और सारा की मुलाकात यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन में हुई थी और दोनों की दो बेटियां हैं. यानी अभी अब्दुल की पहचान भारत-केंद्रित नेता के तौर पर नहीं, बल्कि अमेरिका के भीतर स्वास्थ्य सेवा, महंगाई, कॉरपोरेट पैसे, इमिग्रेशन और गाजा जैसे मुद्दों पर प्रोग्रेसिव नेता के तौर पर है.
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अब असली परीक्षा नवंबर में
अब्दुल की प्राइमरी जीत डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए सिर्फ एक उम्मीदवार की जीत नहीं है. यह इस बात का संकेत भी है कि पार्टी के भीतर प्रोग्रेसिव धड़ा कितना मजबूत हो चुका है. उन्हें बर्नी सैंडर्स और अलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्तेज जैसे नेताओं का समर्थन मिला, जबकि उनके खिलाफ प्राइमरी में भारी रकम खर्च की गई. इसके बावजूद वह जीत गए.
अब नवंबर में कहानी बदल जाएगी. सामने रिपब्लिकन माइक रोजर्स होंगे और मिशिगन जैसा अहम स्विंग स्टेट होगा. अगर अब्दुल जीतते हैं तो अमेरिका को पहला मुस्लिम सीनेटर मिलेगा और डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रोग्रेसिव धड़े को एक बड़ा चेहरा भी. यही वजह है कि मिशिगन का यह चुनाव अब सिर्फ एक सीट की लड़ाई नहीं, बल्कि ट्रंप बनाम प्रोग्रेसिव अमेरिका की बड़ी राजनीतिक परीक्षा बन चुका है. उन्हें न्यूयॉर्क के पहले मुस्लिम मेयर जोहरान ममदानी की ही तरह प्रोग्रेसिव नेता माना जा रहा है.
एम. नूरूद्दीन