तेज धूप के बीच चाक पर तेजी से घूमती मिट्टी को अपने सधे हाथों से आकार दे रहे रामदुलारे की आंखों में अब हताशा नहीं, एक नई उम्मीद की चमक है. गोरखपुर के पास स्थित एक गांव के रहने वाले रामदुारे पुस्तैनी कुम्हार हैं. कुछ साल पहले तक पुराने ढर्रे के हाथ से चलने वाले चाक और साधनों की कमी के कारण वे दिन भर में मुश्किल से 150-200 रुपये ही कमा पाते थे, लेकिन आज उनका परिवार न केवल आत्मनिर्भर है, बल्कि उनके तैयार किए मिट्टी के बर्तनों की डिमांड बढ़ गई है.
यह कहानी सिर्फ रामसुमेर की नहीं है बल्कि हजारों मेहनत करने वाले कारीगरों की है. उत्तर प्रदेश सरकार की विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना ने राज्य के हजारों कुम्हार, मोची, दर्जी, बढ़ई और लोहार जैसे पारंपरिक कारीगरों के जीवन की दशा और दिशा दोनों बदल दी है.
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना पारंपरिक कारीगरों और हस्तशिल्पियों के कौशल विकास और आजीविका के साधनों को मजबूत करने के लिए चलाई जा रही एक प्रमुख कल्याणकारी पहल है, जिसने गरीब मजदूरों की जिंदगी बदल दी है.
हाथ के हुनर को मिला नई तकनीक का साथ
उत्तर प्रदेश की गांव-गांव पर जाकर जब कारीगरों की दिनचर्या और उनके कामकाज को देखा, तो बदलाव साफ नजर आता है. यूपी में विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना के तहत कारीगरों और शिल्पकारों को 6 से 10 दिनों का मुफ्त कौशल विकास प्रशिक्षण दिया गया और उसके बाद 15 हजार रुपये की इलेक्ट्रिकल चाक (इलेक्ट्रिक पॉटर व्हील) और आधुनिक टूलकिट मुफ्त उपलब्ध कराए गए हैं.
लखनऊ के डालीगंज इलाके में सड़क किनारे जूते-चप्पल की मरम्मत करने वाले 48 वर्षीय छोटेलाल (मोची) बताते हैं कि पहले हाथ की सुई और पुराने औजारों से काम करने में उंगलियां छिल जाती थीं और दिन भर में दो-चार जूते ही सिल पाते थे. विश्वकर्मा श्रम योजना के तहत जब चमड़ा सिलने की आधुनिक मशीन और सिलाई टूलकिट मिली, तो काम की रफ्तार तीन गुनी हो गई. अब मरम्मत के साथ-साथ नए जूते-चप्पल बनाने का छोटा-मोटा ऑर्डर भी ले लेते हैं. इसके चलते उनकी आमदनी भी काफी बढ़ी है.
राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित राजन टेराकोटा का बड़ा कारोबार चला रहे हैं. उनकी फैक्ट्री में करीब 25 मजदूर काम करते हैं. यहां से एक बार में दो ट्रक तक माल बाहर भेजा जाता है. एक ट्रक में करीब 4 से 5 लाख रुपये का सामान जाता है. राजन के मुताबिक साल में करीब 24 ट्रक माल बाहर भेजा जाता है. इससे सालाना कारोबार करीब डेढ़ करोड़ रुपये तक पहुंचता है. कभी मिट्टी के घर में रहने वाले राजन आज पक्के मकान में रहते हैं. उनके कारोबार से दूसरे परिवारों को भी रोजगार मिल रहा है. एक साथ काम करते स्थानीय कारीगर.
उत्तर प्रदेश के कारीगरों के जीवन में आया बदलाव
पारंपरिक शिल्पकारों को अपने काम को आगे बढ़ाने के लिए अक्सर स्थानीय साहूकारों या बिचौलियों के आगे हाथ फैलाना पड़ता था. विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना ने इस चक्र को तोड़ दिया है. ट्रेनिंग के बाद कारीगरों को उन्नत औजार खरीदने के लिए वित्तीय सहायता और आधुनिक टूलकिट दी जा रही है. इतना ही नहीं अपना छोटा उद्योग लगाने या दुकान को बड़ा करने के लिए बैंकों से 10,000 रुपये से लेकर 10 लाख रुपये तक का आसान व रियायती लोन उपलब्ध कराया जा रहा है.
लखनऊ के अमीनाबाद के रहने वाले 48 वर्षीय रामदीन की जिंदगी लंबे समय से हाथ से चलाने वाली पुरानी सिलाई मशीन और एक तंग दुकान के फेर में फंसी हुई थी. सालों से वे गांव-मोहल्ले के लोगों के साधारण कपड़े सिलकर किसी तरह अपने चार सदस्यों के परिवार का गुजर-बसर कर रहे थे. सुबह से देर रात तक पैर चलाकर सिलाई करने के बाद भी वे महीने में बमुश्किल 8,000 से 10,000 रुपये ही कमा पाते थे, लेकिन रामदीन की जिंदगी में मोड़ तब आया जब उन्हें प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के बारे में जानकारी मिली.
रामदीन ने नजदीकी जन सेवा केंद्र जाकर 'दर्जी' श्रेणी के तहत अपना पंजीकरण कराया. कुछ ही समय में उनका आवेदन मंजूर हो गया और उन्हें 6 दिनों के भीतर ही मुफ्त कौशल प्रशिक्षण के लिए चुना गया. ट्रेनिंग के दौरान उन्हें केवल नई कटिंग और आधुनिक डिजाइनों की जानकारी ही नहीं मिली, बल्कि प्रति दिन 500 रुपये का स्टाइपेंड भी मिला, जिससे ट्रेनिंग के दिनों में भी उनके घर का खर्च बिना किसी रुकावट के चलता रहा. रामदीन को योजना के तहत 15,000 रुपये का टूलकिट ई-वाउचर मिला, जिससे उन्होंने अपनी जिंदगी की पहली अत्याधुनिक मोटर वाली सिलाई मशीन और इंटरलॉक मशीन खरीदी और कपड़े लाकर सिलाई का काम शुरू किया.
रामदीन की जिंदगी अब पूरी तरह बदल चुकी है. इलेक्ट्रिक मशीन की वजह से जो सूट या कुर्ता सिलने में पहले उन्हें दो घंटे लगते थे, अब वह काम आधे घंटे में निपट जाता है. समय की बचत और बेहतरीन फिनिशिंग के कारण उनके पास नए ग्राहकों की भीड़ लगी रहती है. रामदीन की महीने की कमान अब बढ़कर 25,000 से 30,000 रुपये हो गई है. उन्होंने अपने साथ दो स्थानीय युवाओं को भी काम पर रखा है.
पलायन रुका, पुस्तैनी काम से जुड़ने लगी नई पीढ़ी
उत्तर प्रदेश में कुम्हार, मोची, दर्जी, बढ़ई और लोहार काम से लोगों को मोहभंग रहा था. एक समय जो युवा पीढ़ी अपने पारंपरिक काम को घाटे का सौदा मानकर शहरों की ओर पलायन कर रही थी, वे अब वापस लौटकर आधुनिक तकनीक से अपने खानदानी हुनर को नया रूप दे रहे हैं. रामदुलारे के 22 वर्षीय बेटे अमित ने बताया कि इलेक्ट्रिक चाक आने से मेहनत कम हो गई है और प्रोडक्शन बढ़ गया है. अब वे लोग दिवाली के दीयों के अलावा डिजाइनर गमले, टेराकोटा की मूर्तियां और क्रॉकरी आइटम्स बनाकर ऑनलाइन बाजार में बेचने की तैयारी कर रहे हैं.
गोरखपुर के औरंगाबाद गांव के पन्नालाल प्रजापति का पुश्तैनी काम अब तेजी से बढ़ रहा है. उनके साथ अब 5 से 7 कारीगर मूर्तियां गढ़ने और पकाने का काम संभालते हैं. पन्नालाल बताते हैं कि पहले जरूरी औजार नहीं थे. सरकार से मुफ्त टूलकिट मिलने के बाद काम की रफ्तार बढ़ गई. अब वह हर महीने एक ट्रक माल बाहर भेजते हैं, जिससे सालभर में 60 से 70 लाख रुपये का कारोबार हो जाता है. टिन शेड में रहने वाले पन्नेलाल अब पक्के मकान में रहकर अपना बिजनेस चला रहे हैं. पहले उनका परिवार टिन शेड के मकान में रहता था. अब पक्का घर है. छोटे कारोबार से शुरुआत करने के बाद वह इसे और बड़ा करना चाहते हैं.
औरंगाबाद में हीरालाल प्रजापति करीब 18 साल से टेराकोटा का काम कर रहे हैं. वह बताते हैं कि पहले काम के लिए घर का ही सहारा लेना पड़ता था. अब कारीगरों के लिए अलग कमरे बनाए गए हैं, जहां वे अपना काम कर सकते हैं. उनके मुताबिक, इस काम से महीने में करीब 15 से 16 हजार रुपये तक कमाई हो जाती है. सालाना आमदनी करीब 4 लाख रुपये तक पहुंचती है. गांव में करीब 12 दुकानें हैं, जहां 60 से 70 लोग काम कर रहे हैं. यहां तैयार सामान ट्रकों के जरिए दूसरे शहरों में भेजा जाता है.
यूपी के गांव-देहातों में 'विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना' सिर्फ एक सरकारी योजना बनकर नहीं रह गई है, बल्कि इसने हासिए पर खड़े कुम्हार और मोची भाइयों के हुनर को सम्मान, आर्थिक मजबूती और आत्मनिर्भरता का नया आसमान दिया है. उत्तर प्रदेश सरकार की विश्वकर्मा श्रम सम्मान योजना ने राज्य के पारंपरिक हस्तशिल्पियों, दस्तकारों और कारीगरों के जीवन में व्यापक सुधार किया है. इस योजना का मुख्य उद्देश्य राज्य के ग्रामीण और शहरी कारीगरों के पारंपरिक हुनर को निखारकर उन्हें स्थानीय स्तर पर ही रोजगार और स्वरोजगार के साधन उपलब्ध कराना है.
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