उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक लापरवाही की एक हैरान करने वाली तस्वीर सामने आई है. राज्य का एक गांव बीते 45 सालों से दो जिलों की सीमाओं के बीच त्रिशंकु बना हुआ है. सुरक्षा और पुलिस की जरूरत पड़े तो एक जिले की टीम पहुंचती है. लेकिन जब बात जमीन या प्रशासनिक काम की हो तो दूसरे जिले का रुख करना पड़ता है.
ये कहानी है कानपुर देहात के रसूलाबाद में आने वाले गांव 'रामपुर नरुआ' की. यहां के लोग न्याय से लेकर विकास योजनाओं तक के लिए चार दशकों से दो जिलों के चक्कर काटने को मजबूर हैं.
साल 1981 में बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था के नाम पर कानपुर महानगर को बांटकर कानपुर देहात जिला बनाया गया था. इसी फैसले के बाद से रामपुर नरुआ के ग्रामीणों की मुसीबतें शुरू हो गईं.
कानून-व्यवस्था के मामले में रामपुर नरुआ कानपुर देहात के रसूलाबाद थाने के अंतर्गत आता है. लेकिन गांव में कोई क्राइम होता है, तो रसूलाबाद पुलिस जांच करने आती है. लेकिन राजस्व और प्रशासनिक मामलों में ये गांव कानपुर नगर की बिल्हौर तहसील का हिस्सा है. इतना ही नहीं, गांव की विधानसभा बिल्हौर और लोकसभा मिश्रिख लगती है. चुनाव के समय पोलिंग पार्टी की व्यवस्था भी कानपुर नगर प्रशासन ही करता है.
पुलिस कहीं की, राजस्व कहीं का
प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था के इस विरोधाभास ने ग्रामीणों के लिए भारी संकट पैदा कर दिया है. गांव में जमीन विवाद को लेकर अगर मारपीट या हत्या जैसी घटना होती है, तो FIR और विवेचना कानपुर देहात पुलिस करती है. लेकिन विवाद की मूल वजह यानी जमीन के बंटवारे या कब्जे का फैसला कानपुर नगर का राजस्व विभाग करता है.
इस वजह से ग्रामीणों को दोहरा नुकसान उठाना पड़ता है. एफआईआर या पुलिस केस के लिए उन्हें कानपुर देहात पुलिस मुख्यालय जाना पड़ता है. वहीं, जमीन या राजस्व से जुड़े कामों के लिए कानपुर नगर के दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं.
निदान की आस में बीते 45 साल
गांव को पूरी तरह से कानपुर नगर में शामिल करने की मांग सालों से उठ रही हैय ग्राम प्रधान छविराम यादव बताते हैं कि शासन के लिए ये बहुत मामूली बदलाव है. बस जिम्मेदारों तक गांव की असली समस्या सही तरीके से नहीं पहुंच पा रही है. उन्होंने ग्राम प्रधान से लेकर स्थानीय विधायक तक कई बार पत्राचार किया. हर बार मदद का भरोसा मिला, लेकिन 45 सालों से स्थिति वैसी की वैसी ही बनी हुई है.
ग्राम प्रधान छविराम का कहना है कि अगर उनके गांव को कानपुर देहात के रसूलाबाद थाने से हटाकर कानपुर नगर के ककवन थाने में शामिल कर दिया जाए, तो पूरा गांव एक ही जिले के अधीन आ जाएगा और समस्याओं का हल हो जाएगा.
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पूर्व में कानपुर देहात में तैनात रहे एसपी BBGTS मूर्ति के कार्यकाल के दौरान भी इस गांव को ककवन थाने में शामिल करने का प्रस्ताव भेजा गया था. हालांकि, तमाम पत्राचार के बावजूद नतीजा शून्य ही रहा. 1981 से आज 2026 हो गया है और 45 साल पूरे होने के बाद भी रामपुर नरुआ के निवासियों के लिए ये व्यवस्था जी का जंजाल बना हुआ है.
संतोष शर्मा