संगम में पिंडदान का क्या है महत्व, प्रयागराज नहीं पहुंच पाए तो ऐसे करें ऑनलाइन तर्पण

प्रयागराज का संगम हिंदू धर्म में पितृ कर्म और पिंडदान के लिए विशेष महत्व रखता है. पितृ पक्ष के दौरान देशभर से श्रद्धालु यहां पहुंचकर गंगा-यमुना के संगम में स्नान करते हैं और अपने पूर्वजों के लिए तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करते हैं.

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प्रयागराज में पिंडदान का है सबसे खास महत्व. (Photo: ITG) प्रयागराज में पिंडदान का है सबसे खास महत्व. (Photo: ITG)

पंकज श्रीवास्तव

  • प्रयागराज,
  • 26 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 2:34 PM IST

पितृ पक्ष की आज यानी कि 26 सितंबर से शुरुआत हो चुकी है. ऐसे में प्रयागराज में श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया है. गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करते हैं. लेकिन जो लोग किसी वजह से प्रयागराज नहीं पहुंच पाते, उनके लिए अब ऑनलाइन माध्यम से पिंडदान और तर्पण कराने की व्यवस्था भी सामने आई है.

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तीर्थ पुरोहितों के मुताबिक, देश-विदेश में रहने वाले कई लोग पितृ पक्ष के दौरान प्रयागराज आना चाहते हैं, लेकिन दूरी, समय या दूसरी वजहों से ऐसा नहीं कर पाते. ऐसे लोगों के लिए पुरोहितों की ओर से ऑनलाइन माध्यम से धार्मिक अनुष्ठान कराने की व्यवस्था की जा रही है. इसमें श्रद्धालु दूर रहकर पूजा प्रक्रिया से जुड़ सकते हैं और अपने पूर्वजों के निमित्त तर्पण या पिंडदान करा सकते हैं.

संगम में पिंडदान के लिए देश-विदेश आते हैं लोग. (Photo: ITG)

प्रयागराज में पिंडदान का क्यों है खास महत्व?
प्रयागराज को हिंदू धर्म में तीर्थराज यानी तीर्थों का राजा कहा जाता है. यहां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है. पितृ पक्ष के दौरान इस संगम पर पिंडदान और तर्पण कराने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है.

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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष में लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनकी मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म करते हैं. पिंडदान और तर्पण के जरिए पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है और उनकी आत्मा की शांति की कामना की जाती है.

ऑनलाइन कैसे हो रहा पितृ तर्पण?
तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, ऑनलाइन व्यवस्था में श्रद्धालु वीडियो कॉल या दूसरे डिजिटल माध्यमों के जरिए अनुष्ठान से जुड़ सकते हैं. पुरोहित संगम या पूजा स्थल पर धार्मिक विधि पूरी करते हैं और श्रद्धालु अपने स्थान से पूजा में शामिल होते हैं.

कुछ मामलों में श्रद्धालुओं को पूजा के लिए आवश्यक सामग्री की जानकारी पहले दी जाती है. इसके बाद तय समय पर पुरोहित की मौजूदगी में तर्पण और अन्य धार्मिक प्रक्रिया कराई जाती है.

हालांकि, ऑनलाइन पिंडदान और तर्पण को लेकर धार्मिक मान्यताएं सभी परंपराओं में एक जैसी नहीं हैं. इसलिए श्रद्धालु आमतौर पर अपने परिवार की परंपरा और संबंधित तीर्थ पुरोहित की सलाह के अनुसार ही ऐसी व्यवस्था अपनाते हैं.

देश-विदेश में बैठे लोग भी जुड़ रहे
प्रयागराज के तीर्थ पुरोहितों का कहना है कि ऑनलाइन माध्यम ने उन लोगों के लिए रास्ता आसान किया है जो नौकरी, कारोबार, विदेश में रहने या किसी अन्य कारण से पितृ पक्ष में प्रयागराज नहीं पहुंच पाते. ऐसे श्रद्धालु दूर रहकर भी अपने परिवार की धार्मिक परंपरा से जुड़े रहने की कोशिश करते हैं.

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इस व्यवस्था में श्रद्धालु खुद प्रयागराज नहीं पहुंचता, लेकिन धार्मिक अनुष्ठान के लिए पुरोहित संगम क्षेत्र में मौजूद रहते हैं. इस तरह डिजिटल माध्यम के जरिए श्रद्धालु और तीर्थ पुरोहित एक-दूसरे से जुड़ते हैं.

पितृ पक्ष में बढ़ती है संगम पर भीड़
पितृ पक्ष के दौरान प्रयागराज के संगम क्षेत्र में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. आंध्र प्रदेश समेत देश के अलग-अलग राज्यों से लोग यहां आकर अपने पूर्वजों के लिए पिंडदान और तर्पण कराते हैं.

कई परिवारों के लिए यह केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि अपनी पिछली पीढ़ियों को याद करने और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने की परंपरा है. कुछ परिवार पीढ़ियों से अपने तीर्थ पुरोहित के जरिए संगम पर पितृ कर्म कराते आ रहे हैं.

प्रयागराज के संगम की यही धार्मिक आस्था अब डिजिटल माध्यम से भी लोगों तक पहुंच रही है. एक तरफ श्रद्धालु संगम पहुंचकर प्रत्यक्ष रूप से पिंडदान और तर्पण करा रहे हैं, तो दूसरी तरफ दूर रहने वाले लोग ऑनलाइन माध्यम से इस धार्मिक प्रक्रिया से जुड़ रहे हैं.

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