श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में एक और बड़ा बदलाव हुआ है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और बीजेपी के बीच सबसे प्रभावशाली चेहरों में गिने जाने वाले भैयाजी जोशी ने राम मंदिर ट्रस्ट के 'पालक' (संरक्षक) पद से इस्तीफा दे दिया है. ट्रस्ट ने उन्हें इस दायित्व से मुक्त कर दिया है. आधिकारिक तौर पर इसकी वजह उनका स्वास्थ्य बताया जा रहा है, लेकिन ट्रस्ट के नए स्वरूप में उनकी भूमिका समाप्त होने को लेकर राजनीतिक और संगठनात्मक हलकों में कई तरह की चर्चाएं भी चल रही हैं.
भैयाजी जोशी का यह फैसला इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि एक समय उन्हें संघ और बीजेपी के बीच संवाद की सबसे मजबूत कड़ी माना जाता था. लंबे समय तक संगठन में उनकी मजबूत पकड़ रही और बड़े फैसलों में उनकी भूमिका को अहम माना जाता था. ऐसे में राम मंदिर ट्रस्ट से उनका अलग होना सिर्फ एक औपचारिक बदलाव नहीं, बल्कि संगठनात्मक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
क्या होता है 'पालक' का पद
राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में 'पालक' या संरक्षक का पद प्रशासनिक और संगठनात्मक समन्वय से जुड़ा माना जाता है. यह ऐसा दायित्व है, जहां ट्रस्ट की गतिविधियों पर नजर रखने और समय-समय पर मार्गदर्शन देने की भूमिका होती है. हालांकि यह पद प्रतिदिन के प्रशासनिक कामकाज से अलग माना जाता है. भैयाजी जोशी इसी दायित्व का निर्वहन कर रहे थे, लेकिन अब उन्होंने इससे खुद को अलग कर लिया है.
जमीन खरीद विवाद के बाद मिली थी जिम्मेदारी
भैयाजी जोशी को राम मंदिर ट्रस्ट में उस समय महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई थी, जब कुछ वर्ष पहले ट्रस्ट की ओर से जमीन खरीद को लेकर विवाद खड़ा हुआ था. उस दौरान जमीन खरीद में अनियमितताओं और करोड़ों रुपये की हेराफेरी के आरोप लगाए गए थे. मामला राजनीतिक बहस का विषय भी बना था. इसी दौर में संगठन स्तर पर ट्रस्ट की कार्यप्रणाली को और मजबूत बनाने की कोशिशों के बीच भैयाजी जोशी को संरक्षक (पालक) की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. माना गया था कि उनके अनुभव और संगठनात्मक पकड़ से ट्रस्ट के कामकाज को मजबूती मिलेगी.
बैठकों में दिखते थे, लेकिन सार्वजनिक भूमिका सीमित रही
ट्रस्ट से जुड़े लोगों के बीच यह धारणा रही कि भैयाजी जोशी की सार्वजनिक सक्रियता काफी सीमित थी. वह समय-समय पर ट्रस्ट की बैठकों में शामिल होते थे, लेकिन अयोध्या में उनकी मौजूदगी बहुत कम देखने को मिलती थी. राम मंदिर निर्माण और ट्रस्ट की गतिविधियों के दौरान भी उनकी ओर से सार्वजनिक हस्तक्षेप बहुत कम दिखाई दिया. यही वजह रही कि बड़ी संख्या में लोगों को यह तक जानकारी नहीं थी कि वह ट्रस्ट में संरक्षक (पालक) की भूमिका निभा रहे हैं. हालांकि संगठन से जुड़े लोगों का मानना रहा कि कई मामलों में उनकी भूमिका पर्दे के पीछे समन्वय और मार्गदर्शन तक सीमित थी.
स्वास्थ्य का हवाला देकर दिया इस्तीफा
भैयाजी जोशी ने अपने इस्तीफे की वजह स्वास्थ्य संबंधी कारणों को बताया है. ट्रस्ट ने भी उन्हें उनके दायित्व से मुक्त कर दिया है. आधिकारिक तौर पर यही कारण सामने आया है और ट्रस्ट की ओर से इसे नियमित संगठनात्मक प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है. हालांकि संगठन और राजनीतिक गलियारों में इस बदलाव को लेकर अलग-अलग तरह की चर्चाएं भी हैं. चर्चा यह भी है कि राम मंदिर ट्रस्ट के नए सेटअप में अब नई कार्यशैली और नए चेहरों को प्राथमिकता दी जा रही है. इसी कारण कई पुराने नाम अब सक्रिय भूमिका में दिखाई नहीं दे रहे हैं. कुछ राजनीतिक और संगठनात्मक हलकों में यह भी चर्चा है कि ट्रस्ट के भीतर बदले समीकरणों ने भी इस बदलाव में भूमिका निभाई है. हालांकि इन चर्चाओं की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.
चंपत राय से समीकरणों को लेकर भी अटकलें
संगठन से जुड़े कुछ हलकों में यह भी चर्चा है कि ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के साथ समीकरणों को लेकर भी बदलाव की बातें कही जा रही हैं. हालांकि इस संबंध में न तो ट्रस्ट की ओर से कोई आधिकारिक बयान आया है और न ही भैयाजी जोशी ने ऐसी किसी वजह का उल्लेख किया है. ऐसे में इसे फिलहाल सिर्फ चर्चाओं के रूप में ही देखा जा रहा है. भैयाजी जोशी लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेतृत्व में रहे. उन्हें संघ और भारतीय जनता पार्टी के बीच संवाद स्थापित करने वाले प्रमुख नेताओं में गिना जाता था.
कुमार अभिषेक