अयोध्या में दशहरा था. रामलीला का मंच सजा था. सामने दर्शक थे. मंच पर भगवान श्रीराम और रावण के बीच युद्ध का आखिरी प्रसंग चल रहा था. फिर वो पल आया, जिसका रामलीला देखने वाले इंतजार कर रहे थे. भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया. इसके साथ ही मैदानों में रावण के पुतले जलने लगे. आसमान आतिशबाजी से जगमगा उठा. चारों तरफ जय श्रीराम के नारे गूंजने लगे. इस बार अयोध्या की रामलीला से एक और कहानी सामने आई. कहानी उस शख्स की, जो मंच पर भगवान श्रीराम का किरदार निभा रहा था. नाम है राजनाथ पांडेय.
राम का किरदार निभाने के बाद राजनाथ पांडेय अपने अनुभव साझा करते हुए भावुक हो गए. उन्होंने कहा कि रामजन्मभूमि की पावन धरती पर भगवान श्रीराम का स्वरूप धारण करना उनके लिए सिर्फ अभिनय नहीं है. यह आस्था, श्रद्धा और सौभाग्य से जुड़ा अनुभव है. राजनाथ पांडेय जौनपुर क्षेत्र से संबंध रखते हैं. उन्होंने कहा कि पिछले दो से तीन वर्षों से उन्हें रामजन्मभूमि में भगवान श्रीराम की भूमिका निभाने का अवसर मिल रहा है.
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राजनाथ के लिए यह मंच पर संवाद बोलने और दृश्य निभाने भर की बात नहीं है. वह इसे प्रभु श्रीराम के प्रति अपनी श्रद्धा और समर्पण व्यक्त करने का माध्यम मानते हैं. उन्होंने इस अवसर के लिए सभी के प्रति आभार जताया. साथ ही लोगों से भगवान श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने की अपील की.
अयोध्या में दशहरा कैसे मनाया गया?
अयोध्या नगर के पांच स्थानों समेत जिले के करीब 150 स्थानों पर रामलीला मंचन और रावण दहन के कार्यक्रम आयोजित किए गए. इन आयोजनों में स्थानीय लोगों के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु और दर्शक शामिल हुए. लोगों ने रामलीला के जरिए भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े प्रसंगों को देखा और विजयादशमी का पर्व मनाया.
अयोध्या के चौक बजाजा स्थित रामलीला मैदान में इस बार 131वें रामलीला महोत्सव का आयोजन हुआ. इस आयोजन की परंपरा करीब 131 साल पुरानी बताई जाती है. यहां रामलीला मंचन के बाद 35 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन किया गया. पुतले में आग लगते ही मैदान में मौजूद लोगों की निगाहें उसकी तरफ टिक गईं. आसमान आतिशबाजी से जगमगाने लगा और मैदान जय श्रीराम के उद्घोष से गूंज उठा. सालों से चली आ रही यह परंपरा अयोध्या की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है.
राजनाथ पांडेय ने कहा कि भगवान श्रीराम का जीवन सत्य, त्याग, मर्यादा और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा देता है. विजयादशमी अपने भीतर मौजूद अहंकार, क्रोध, लोभ और दूसरी बुराइयों को खत्म करने का संकल्प लेने का भी अवसर है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम ने रावण पर विजय हासिल की थी. रामलीला में इसी प्रसंग का मंचन किया जाता है. रावण विद्वान और शक्तिशाली था, लेकिन उसके अहंकार और गलत कर्मों के कारण उसका अंत हुआ. दूसरी ओर, भगवान श्रीराम सत्य और धर्म के रास्ते पर चलते हुए विजयी हुए.
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रामलीला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कहानियों के जरिए आदर्शों को समझने का माध्यम भी है. मंच पर दिखाए जाने वाले प्रसंग लोगों को बताते हैं कि ताकत के साथ मर्यादा भी जरूरी है, और ज्ञान के साथ सही आचरण भी. राजनाथ पांडेय के लिए राम का किरदार निभाना इसी संदेश से जुड़ा अनुभव है. अयोध्या में भगवान श्रीराम का स्वरूप धारण करने का मौका उनके लिए भावुक करने वाला रहा.
विजयादशमी पर रावण के पुतले जल गए. मैदानों में जय श्रीराम के नारे गूंजे. लेकिन इस पर्व का असली संदेश इससे आगे जाता है. रावण का पुतला तो हर साल जलता है. सवाल यह है कि क्या हम अपने भीतर के अहंकार, क्रोध और बुराइयों को भी खत्म करने की कोशिश करते हैं? शायद यही विजयादशमी की सबसे बड़ी सीख है- बुराई पर जीत का जश्न तभी पूरा होता है, जब अच्छाई हमारे व्यवहार में भी दिखाई दे.
मयंक शुक्ला