यूपी का 'मिनी पंजाब' पीलीभीत: जानिए तराई की माटी, सिख संस्कृति और सियासत का पूरा लेखा-जोखा!

नेपाल सीमा से सटा पीलीभीत प्राकृतिक सुंदरता, टाइगर रिजर्व, बांसुरी उद्योग और गोमती नदी के उद्गम के लिए प्रसिद्ध है. बड़ी सिख आबादी के कारण इसे 'मिनी पंजाब' भी कहते हैं. राजनीतिक रूप से यह गांधी परिवार (मेनका और वरुण गांधी) का गढ़ रहा है, जहां कुर्मी, मुस्लिम और सिख मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. 2017 और 2022 के चुनावों में भाजपा ने जिले की सभी 4 सीटों पर क्लीन स्वीप किया था.

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पीलीभीत का इतिहास और सियासी समीकरण (Photo- ITG) पीलीभीत का इतिहास और सियासी समीकरण (Photo- ITG)

aajtak.in

  • पीलीभीत ,
  • 04 नवंबर 2026,
  • अपडेटेड 5:20 PM IST

यूपी का पीलीभीत जिला रोहिलखंड क्षेत्र का एक प्रमुख और समृद्ध जिला है, जो नेपाल सीमा और उत्तराखंड से सटा हुआ है. अपनी प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगलों (पीलीभीत टाइगर रिजर्व) और बांसुरी निर्माण के उद्योग के कारण इसे 'बांसुरी नगरी' भी कहा जाता है. पीलीभीत को इसके सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश के कारण 'मिनी पंजाब' के रूप में भी जाना जाता है. यहां सिख समुदाय की अच्छी खासी आबादी निवास करती है. यह क्षेत्र गोमती नदी के उद्गम स्थल के लिए भी फेमस है. 

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प्राचीन व मध्यकालीन इतिहास: पीलीभीत का संबंध महाभारत काल से जोड़ा जाता है. मध्यकाल में यह क्षेत्र रोहिला अफगानों के अधीन रहा और रोहिलखंड का एक अहम हिस्सा बना. 

स्थापना और नामकरण: माना जाता है कि यहां स्थित एक पुराने गांव 'पीली भीत' (पीली दीवार) के नाम पर इसका नाम पीलीभीत पड़ा. 1879 में इसे बरेली से अलग कर एक स्वतंत्र जिला बनाया गया था. 

बांसुरी उद्योग: पीलीभीत का बांसुरी उद्योग देशभर में मशहूर है. भारत में बनने वाली अधिकांश हैंडमेड बांसुरियों का निर्माण यहीं होता है.

धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थल 

गौरीशंकर मंदिर: खकरा नदी के किनारे स्थित लगभग 250 से 400 वर्ष पुराना प्राचीन शिव मंदिर है. जिले में इसका खास महत्व है.
मनकामेश्वर महादेव मंदिर: यह लगभग 400 साल पुराना प्राचीन मंदिर है.
जामा मस्जिद: दिल्ली की प्रसिद्ध जामा मस्जिद की तर्ज पर बनी मुगलकालीन मस्जिद है. इसका निर्माण 1769 में रुहेला सरदार हाफिज रहमत खान ने कराया था. गुरुद्वारा छटवीं पातशाही: यह गुरु गोबिंद सिंह जी से जुड़ा लगभग 400 साल पुराना ऐतिहासिक गुरुद्वारा है. 

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राजनीति और सियासी समीकरण

गांधी परिवार का दबदबा: पीलीभीत की राष्ट्रीय राजनीति में सबसे बड़ी पहचान मेनका गांधी और उनके बेटे वरुण गांधी रहे हैं. इस लोकसभा क्षेत्र से मेनका गांधी और वरुण गांधी लंबे समय तक सांसद रहे. 

कुर्मी (गंगवार/वर्मा) और मुस्लिम बहुल राजनीति: जिले के राजनीतिक और चुनावी नतीजों में कुर्मी (ओबीसी) समाज, मुस्लिम मतदाता और सिख समुदाय निर्णायक भूमिका निभाते हैं. 

तराई क्षेत्र का असर: तराई इलाका होने के कारण यहां किसान आंदोलन, कृषि मुद्दे (गन्ना भुगतान, धान-गेहूं खरीद) और तराई के सिख किसानों का वोट बैंक भी सियासत की दिशा तय करता है. 

पीलीभीत की सभी 4 विधानसभा सीटों का चुनावी डेटा (2022 और 2017)

पीलीभीत जिले में कुल 4 विधानसभा सीटें आती हैं: पीलीभीत, बरखेड़ा , पूरनपुर और बीसलपुर. दोनों ही चुनावों (2017 और 2022) में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने जिले की सभी 4 सीटों पर क्लीन स्वीप किया. 

गांधी परिवार (राष्ट्रीय व स्थानीय पहचान)

मेनका गांधी: पीलीभीत की राजनीति का सबसे बड़ा और स्थापित नाम हैं. वे पीलीभीत लोकसभा सीट से 6 बार सांसद (निर्दलीय और भाजपा के टिकट पर) रह चुकी हैं और केंद्र सरकार में पूर्व मंत्री भी रही हैं. पीलीभीत के विकास और स्थानीय राजनीति पर उनका गहरा असर रहा है.

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वरुण गांधी: मेनका गांधी के पुत्र और भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं. वरुण गांधी सुल्तानपुर के अलावा पीलीभीत से भी सांसद चुने गए. उन्होंने पीलीभीत में अपनी मां की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया और क्षेत्र के युवाओं व किसानों के बीच अपनी मजबूत पकड़ बनाई.
 
इसके अलावा जिले से संजय सिंह गंगवार वर्तमान में योगी सरकार में राज्य मंत्री (गन्ना विकास एवं चीनी मिलें) और पीलीभीत सदर सीट से लगातार दो बार (2017 और 2022) के विधायक हैं. वे जिले के कुर्मी (गंगवार) समुदाय के प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं.  वहीं, हेमराज वर्मा जो कि विधायक (बरखेड़ा सीट से 2012 में सपा विधायक) और राज्यमंत्री रहे हैं. वे पीलीभीत जिले में सपा के प्रमुख चेहरे और ओबीसी राजनीति के बड़े नेताओं में से एक हैं. 

धर्मांतरण का मुद्दा गरम 

हाल के वर्षों में पीलीभीत के नेपाल सीमा से सटे कुछ सिख-बहुल इलाकों (जैसे बेल्हा, बनमपुरी, भागीरथ सिंघाड़ा और टाटरगंज) में धर्म परिवर्तन कराने के मामले सामने आए थे. ईसाई मिशनरियों पर कथित तौर पर प्रलोभन और चंगाई सभाओं के माध्यम से लोगों को कन्वर्ट करने का आरोप लगा. गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटियों और सिख संगठनों ने इस पर गहरी चिंता जताई थी और प्रशासन से शिकायत की थी.

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