'मेरी उम्र मेरे देश जितनी है', आजादी की आधी रात को जन्मी महिला की कहानी, पिता ने नाम रखा- 'विजय'

क्या किसी महिला की उम्र पूछना वाकई मुश्किल सवाल है? लखनऊ की विजय कुमारी के लिए नहीं, क्योंकि वह हंसते हुए अपना आधार कार्ड दिखाती हैं और कहती हैं, 'मेरी उम्र मेरे देश जितनी ही है.' उनकी यह कहानी सिर्फ एक जन्मतिथि नहीं, बल्कि आजादी, सेना और तपश्चर्या की एक जिंदा दास्तान है.

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15 अगस्त 1947 की आधी रात वाराणसी में विजय कुमारी का जन्म हुआ था.(Photo:PTI) 15 अगस्त 1947 की आधी रात वाराणसी में विजय कुमारी का जन्म हुआ था.(Photo:PTI)

aajtak.in

  • लखनऊ,
  • 15 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 4:32 PM IST

कहावत है कि किसी महिला से उसकी उम्र नहीं पूछनी चाहिए. लेकिन लखनऊ की रहने वाली विजय कुमारी को इस सवाल से कोई परेशानी नहीं होती. और इसकी एक अच्छी वजह भी है. वह अपनी जन्मतिथि के सबूत के तौर पर अपना आधार कार्ड दिखाते हुए हंसते हुए कहती हैं कि मेरी उम्र मेरे देश जितनी ही है.

सेना के एक सम्मानित रिटायर्ड अफसर की पत्नी ने एक न्यूज एजेंसी को बताया, "मेरा जन्म वाराणसी में आधी रात को हुआ था, जब भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने तिरंगा फहराया था. यह ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अंत का संकेत था और उन्होंने अपना मशहूर 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' भाषण दिया था."

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विजय कुमारी, कुमाऊं रेजिमेंट के मेजर धीरेंद्र नाथ सिंह की पत्नी हैं. मेजर सिंह को 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के लिए देश के तीसरे सबसे बड़े वीरता पुरस्कार 'वीर चक्र' से सम्मानित किया गया था. कुमारी को याद है कि कैसे उनकी जन्मतिथि की वजह से वह मशहूर हो गई थीं.

उन्होंने याद करते हुए कहा, "जब मैं प्राइमरी स्कूल में थी, तो मेरे दोस्त हमेशा मेरी जन्मतिथि के बारे में बात करते थे. स्कूल के कार्यक्रम, रैलियां और प्रभात फेरियां आम बात थीं. मेरे माता-पिता मुझसे कहते थे कि मेरा जन्मदिन पूरे देश में मनाया जाता है." 

उन्होंने आगे बताया कि चूंकि उनका जन्म स्वतंत्रता दिवस पर हुआ था, इसलिए उनके पिता ने उनका नाम 'विजय' रखा, जिसका अर्थ है जीत.

उन्होंने कहा, "शादी के बाद, मेरे पति अक्सर कहते थे कि मेरी किस्मत मेरे देश की किस्मत से जुड़ी हुई है, क्योंकि मेरी जन्मतिथि और जन्म का समय भारत के आजाद होने के समय जैसा ही है."

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उनके दो बेटे सेना में अफसर बने (1988 और 1989 में), और उनके एक पोते को 2016 में सेना में कमीशन मिला, जबकि दूसरा अभी महू (मध्य प्रदेश) में ट्रेनिंग ले रहा है.

उनका तीसरा बेटा डेंटिस्ट है और उनकी एक बेटी भी है.

वह गर्व भरी आवाज में कहती हैं, "मेरे पूरे परिवार ने अपना जीवन देश की सेवा में बिताया है."

सबसे यादगार पल? 

उन्होंने कहा, "मेरे पति को वीर चक्र मिला. मुझे उन पर बहुत गर्व है क्योंकि 1965 में, जब वे सिर्फ 25 साल के थे, दुश्मन की माइन (mine) के धमाके में एक पैर गंवाने के बावजूद उन्होंने दुश्मन की तोपों को खामोश कर दिया था," 

मेजर धीरेंद्र नाथ सिंह कुमाऊं रेजिमेंट की एक बटालियन की कंपनी की कमान संभाल रहे थे, जिसे केरी पर कब्जा करने का आदेश मिला था.

उन्होंने कहा, "मेरे पति के मेडल और उन्हें भेजा गया एक टेलीग्राम - जिसमें लिखा था कि 'राष्ट्रपति आपको बहादुरी के लिए वीर चक्र देने से खुश हैं' - मेरी सबसे कीमती चीजों में से हैं."

मेजर (रिटायर्ड) सिंह का 4 अप्रैल, 2025 को दिल्ली के आर्मी रिसर्च एंड रेफरल हॉस्पिटल में निधन हो गया. 

कुमारी को यह भी याद है कि कैसे उनके परिवार ने तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की अपील पर रोज़ाना एक समय का खाना छोड़ना शुरू कर दिया था.

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वे कहती हैं, "उस नए देश के लिए वे मुश्किल दिन थे. अनाज का संकट था, और ज्यादातर लोगों की तरह हमने भी छोटा सा योगदान देने का फ़ैसला किया."

पुरानी यादों को ताजा करते हुए, वे याद करती हैं कि कैसे भारत ने बड़ी मुश्किलों का सामना किया और अलग-अलग क्षेत्रों में सफलता हासिल कर रहा है.

उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि मेरी कहानी भी वैसी ही है, क्योंकि सब कुछ आसान नहीं था. सबसे बड़ी मुश्किलों में से एक थी 1965 की लड़ाई के दौरान मेरे पति का पैर गंवाना."

1966 में नकली पैर (प्रोस्थेटिक लेग) लगने के बावजूद, लखनऊ में तैनात उनके पति को 1971 में मेडिकल तौर पर अनफिट घोषित कर दिया गया.

उन्होंने याद करते हुए कहा, "फिर भी उन्होंने पक्का किया कि हमारे बेटे सेना में शामिल हों और जब वे उनकी पासिंग आउट परेड में शामिल हुए तो उन्हें बहुत खुशी हुई."

आज विजय कुमारी की उम्र 79 साल है. लेकिन 15 अगस्त उनके लिए सिर्फ जन्मदिन नहीं है.

ये वो दिन है जब उनका जन्म और देश की आजादी एक साथ हुई थी.

और शायद इसीलिए बातचीत खत्म करते हुए भी उनके मुंह से वही शब्द निकलते हैं, जो उनकी पूरी जिंदगी की कहानी को समेट लेते हैं- 'जय हिंद'.

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