पित्त की थैली यानी गॉलब्लैडर में पथरी होने पर कई मरीजों को लगता है कि ऑपरेशन कराकर थैली निकलवा देने के बाद यह समस्या हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी. लेकिन कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में सामने आया एक मामला इस धारणा को नए सिरे से समझने की जरूरत बताता है. यहां एक मरीज की 29 साल पहले पित्त की थैली निकाल दी गई थी, लेकिन इसके बाद भी उसके पेट में दर्द होता रहा. जांच में पित्त की नली में पथरी मिली. मरीज ने अलग-अलग समय पर छह बार ऑपरेशन कराया, फिर भी समस्या बनी रही. आखिरकार जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजय काला की टीम ने सातवीं बार ऑपरेशन पित्त की नली से 70 पथरियां निकालीं. डॉक्टरों के मुताबिक, फिलहाल मरीज को दर्द से राहत है.
1997 में निकाली गई थी पित्त की थैली
बिल्हौर निवासी मरीज को करीब 29 साल पहले पेट में दर्द की शिकायत हुई थी. जांच में उसकी पित्त की थैली में पथरी होने का पता चला. इसके बाद वर्ष 1997 में ऑपरेशन कर उसकी पित्त की थैली निकाल दी गई. मरीज को लगा कि अब पथरी की समस्या खत्म हो जाएगी. आमतौर पर भी कई लोग मानते हैं कि गॉलब्लैडर निकल जाने के बाद दोबारा पथरी नहीं बन सकती. लेकिन कुछ समय बाद मरीज को फिर पेट में दर्द होने लगा. जांच कराई गई तो पता चला कि उसकी पित्त की नली में पथरी मौजूद है. इसके बाद वर्ष 2019 में उसने दोबारा उपचार कराया. हालांकि, समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई और कुछ समय बाद फिर दर्द होने लगा.
2026 में चार बार करानी पड़ी ERCP प्रक्रिया
मरीज की परेशानी यहीं खत्म नहीं हुई. वर्ष 2026 में जून, जुलाई, अगस्त और सितंबर के दौरान उसने चार बार ईआरसीपी (ERCP) कराई. इस प्रक्रिया के जरिए पित्त की नली में मौजूद पथरी निकालने का प्रयास किया गया. इसके बावजूद मरीज को दर्द से स्थायी राहत नहीं मिल रही थी. पित्त की नली में बार-बार पथरी मिलने के कारण वह परेशान हो गया. आखिरकार वह कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज पहुंचा और प्राचार्य डॉ. संजय काला की ओपीडी में अपनी समस्या बताई. मरीज ने अपने पुराने ऑपरेशन, जांच और उपचार का पूरा विवरण डॉक्टर को दिया. उसकी लंबी मेडिकल हिस्ट्री को देखते हुए मामले की नए सिरे से जांच की गई.
डॉ. संजय काला की टीम ने अपनाया नया तरीका
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजय काला ने मरीज की हिस्ट्री समझने के बाद अपनी टीम के साथ उसके उपचार की योजना बनाई. इसमें डॉक्टर अनुराग सिंह भी शामिल रहे. डॉक्टरों ने मरीज की पित्त की नली की स्थिति को विस्तार से जांचा. इसके लिए इंट्राऑपरेटिव कोलेडोकोस्कोपी की मदद ली गई. इस तकनीक से पित्त की नली के अंदर मौजूद पथरियों को सीधे देखकर उनकी स्थिति का आकलन किया जा सकता है. जांच के दौरान पित्त की नली में काफी संख्या में पथरियां दिखाई दीं. इसके बाद डॉक्टरों ने एक-एक करके उन्हें बाहर निकाला. प्रक्रिया पूरी होने के बाद नली की दोबारा जांच की गई, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अंदर कोई पथरी बची तो नहीं है. जब निकाली गई पथरियों की गिनती की गई तो उनकी संख्या 70 निकली. लंबे समय से दर्द और बार-बार उपचार से परेशान मरीज के लिए यह बड़ी राहत थी.
पित्त की थैली निकलने के बाद भी क्यों बन रही थी पथरी?
डॉ. संजय काला के मुताबिक, इस मरीज की पित्त की नली में ही बार-बार पथरी बनने की प्रवृत्ति थी. इसी वजह से पित्त की थैली निकल जाने और कई बार उपचार कराने के बावजूद उसकी समस्या बनी हुई थी. दरअसल, पित्त की थैली और पित्त की नली अलग-अलग संरचनाएं हैं. पित्त की थैली निकालने के बाद भी कुछ मरीजों में पित्त की नली में पथरी रह सकती है या आगे चलकर बन सकती है. इसलिए ऑपरेशन के बाद भी दर्द होने पर उसकी वजह की जांच जरूरी होती है. डॉक्टर का कहना है कि फिलहाल मरीज की पित्त की नली से पथरियां निकाल दी गई हैं और दोबारा जांच में कोई अन्य पथरी दिखाई नहीं दी. मरीज अब दर्द से राहत महसूस कर रहा है.
मरीज ने कहा- 29 साल से समझ नहीं पा रहा था समस्या
मरीज ने बताया कि उसने 29 साल पहले पित्त की थैली निकलवाई थी. उसे लगता था कि इसके बाद पथरी की समस्या दोबारा नहीं होगी, क्योंकि आमतौर पर लोग यही बताते हैं कि थैली निकलने के बाद पथरी नहीं बनती. लेकिन उसके साथ ऐसा नहीं हुआ. उसे लगातार दर्द की परेशानी रही और कई बार ऑपरेशन व अन्य प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ा. मरीज के मुताबिक, इस बार डॉक्टरों की टीम ने उसकी पित्त की नली से सभी पथरियां निकाल दीं, जिससे उसे राहत मिली है. उसने डॉ. संजय काला और उनकी टीम का धन्यवाद किया.
रंजय सिंह