भारत में हर महीने 2.1 लाख रुपये की इन-हैंड सैलरी और करीब 2.3 करोड़ रुपये की बचत हो, तो ज्यादातर लोग इसे आर्थिक रूप से मजबूत स्थिति मानेंगे. लेकिन बेंगलुरु में रहने वाले करीब 40 साल के एक टेक प्रोफेशनल के सामने एक ऐसा फैसला खड़ा है, जिसका जवाब उसके लिए आसान नहीं है. उसे लंदन में सालाना 60,000 पाउंड यानी करीब 76 लाख रुपये की नौकरी का ऑफर मिला है. अब सवाल है कि क्या उसे अपनी भारत की नौकरी छोड़कर लंदन चले जाना चाहिए?
इस उलझन का जवाब जानने के लिए उसने रेडिट पर अपनी स्थिति शेयर की. इसके बाद सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो गई कि जब किसी व्यक्ति के पास भारत में अच्छी सैलरी के साथ करोड़ों की बचत हो, तो क्या विदेश में ज्यादा कमाई के नाम पर देश छोड़ना वाकई फायदे का सौदा है?
भारत में 2.1 लाख रुपये महीना कमाता है शख्स
टेक प्रोफेशनल ने बताया कि वह बेंगलुरु की एक सर्विस-बेस्ड कंसल्टेंसी में जूनियर से मिड-लेवल सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर के तौर पर काम करता है.वह करीब दो साल से इसी कंपनी में है और उसकी मासिक इन-हैंड सैलरी 2.1 लाख रुपये है.
उसके पास करीब 2.3 करोड़ रुपये की बचत भी है. उसके नाम अपना घर नहीं है और वह शादीशुदा नहीं है. उसके ऊपर पत्नी, बच्चों या किसी अन्य डिपेंडेंट की जिम्मेदारी भी नहीं है.भारतीय संदर्भ में देखें तो यह स्थिति काफी मजबूत मानी जा सकती है. लेकिन इसके बावजूद वह अपनी मौजूदा नौकरी को लेकर आश्वस्त नहीं है.
5-6 महीने में नौकरी जाने का डर
उसने बताया कि कंपनी में मौजूदा माहौल को देखते हुए उसे डाउनसाइजिंग की आशंका है. उसे डर है कि अगले 5-6 महीनों में उसकी नौकरी जा सकती है. इतना ही नहीं, उसे यह भी लगता है कि संभव है कि दो साल बाद उसकी मौजूदा नौकरी ही मौजूद न रहे.यही वजह है कि लंदन का ऑफर उसे आकर्षित कर रहा है. उसे वहां एक मीडियम साइज बैंक में एसोसिएट लेवल एनालिटिक्स की नौकरी मिली है.
उसका मानना है कि बैंकिंग सेक्टर में नौकरी की स्थिरता उसकी मौजूदा कंपनी के मुकाबले बेहतर हो सकती है. इसलिए वह सिर्फ ज्यादा सैलरी के लिए नहीं, बल्कि भविष्य की नौकरी की सुरक्षा को देखते हुए भी लंदन जाने के बारे में सोच रहा है.
60,000 पाउंड सुनने में बड़ी रकम, लेकिन लंदन में कितनी बचेगी?
भारत में सालाना 60,000 पाउंड यानी करीब 76 लाख रुपये की कमाई सुनने में काफी बड़ी लगती है. लेकिन लंदन में रहने के बाद असली सवाल यह है कि टैक्स, किराया, आने-जाने, खाने और रोजमर्रा के खर्चों के बाद हाथ में कितना पैसा बचेगा.बेंगलुरु में 2.1 लाख रुपये की मासिक इन-हैंड सैलरी पाने वाला यह व्यक्ति अकेला है और उसके पास पहले से करीब 2.3 करोड़ रुपये की बचत है. ऐसे में उसकी मौजूदा वित्तीय स्थिति काफी मजबूत है.
दूसरी तरफ लंदन में उसे घर के किराए से लेकर ट्रांसपोर्ट और रोजमर्रा की जिंदगी तक के लिए काफी ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है. इसलिए 60,000 पाउंड की सालाना सैलरी कागज पर बड़ी रकम जरूर दिखती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसकी बचत भी उसी अनुपात में बढ़ेगी.
रेडिट पर लोगों ने क्या सलाह दी?
टेक प्रोफेशनल की पोस्ट पर रेडिट यूजर्स की राय बंटी हुई नजर आई. कुछ लोगों ने साफ कहा कि 60,000 पाउंड की सैलरी पर लंदन जाना आर्थिक रूप से बहुत आकर्षक फैसला नहीं है.
एक यूजर ने बताया कि वह लंदन के पास एक कम्यूटर टाउन से आता-जाता है. उसके मुताबिक किराए और दूसरे खर्चों के बाद इतनी सैलरी पर बड़ी रकम बचाना मुश्किल हो सकता है. उसने यह भी कहा कि अगर पार्टनर की भी कमाई हो या विदेश में रहने की इच्छा बहुत ज्यादा हो, तभी यह फैसला ज्यादा बेहतर लग सकता है.
एक अन्य यूजर ने भी लंदन की महंगी जीवनशैली का हवाला देते हुए कहा कि 60,000 पाउंड की सैलरी वहां उतनी बड़ी रकम नहीं है, जितनी भारत में सुनाई देती है.
कुछ यूजर्स बोले- एक बार रिस्क लेने में क्या है?
हालांकि, कई लोगों ने इस मामले को दूसरे नजरिए से देखा. उनका कहना था कि इस व्यक्ति की आर्थिक स्थिति एक सामान्य नौकरीपेशा भारतीय से काफी अलग है.
उसके पास करीब 2.3 करोड़ रुपये की बचत है, कोई डिपेंडेंट नहीं है और वह भविष्य की रिटायरमेंट को लेकर भी पहले से सोच रहा है. ऐसे में उसके पास करियर के साथ प्रयोग करने की गुंजाइश है.
एक यूजर ने तर्क दिया कि अगर लंदन जाने के बाद छह महीने या एक साल में नौकरी नहीं भी चलती है, तो वह भारत वापस आ सकता है. उसके पास परिवार की बड़ी आर्थिक जिम्मेदारी नहीं है और न ही ऐसी स्थिति है कि उसे हर हाल में तुरंत बड़ी रकम कमानी पड़े.
कुछ लोगों का मानना था कि लंदन में बैंक के साथ काम करने का अनुभव भविष्य में उसके करियर के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. अगर वहां नौकरी चल गई तो उसे अंतरराष्ट्रीय अनुभव मिलेगा और अगर नहीं चली तो भारत लौटने का विकल्प उसके पास रहेगा.
अपना घर नहीं, इसलिए रिटायरमेंट की भी चिंता
इस पूरे मामले में रिटायरमेंट का सवाल भी काफी अहम है. टेक प्रोफेशनल ने बताया कि बेंगलुरु में उसका अपना घर नहीं है. भविष्य में उसे लगता है कि रिटायरमेंट के लिए किसी टियर-2 शहर में जाकर बसना पड़ सकता है.
इसलिए उसका फैसला सिर्फ आज की सैलरी पर निर्भर नहीं है. वह यह भी देख रहा है कि अगले 15-20 साल में उसकी जिंदगी कैसी होगी. अगर उसे वैसे भी भविष्य में किसी छोटे शहर में जाकर रहना है, तो कुछ साल लंदन में रहकर अंतरराष्ट्रीय अनुभव हासिल करना उसके लिए एक विकल्प हो सकता है.
असली सवाल सैलरी नहीं, बचत और करियर का है
इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प बात 60,000 पाउंड की नौकरी नहीं, बल्कि भारत और ब्रिटेन में कमाई, खर्च और बचत का अंतर है.
भारत में 2.1 लाख रुपये महीना कमाने वाला और करीब 2.3 करोड़ रुपये बचा चुका व्यक्ति, खासकर तब जब उस पर परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी नहीं है, पहले से मजबूत वित्तीय स्थिति में है. वहीं लंदन में 76 लाख रुपये के बराबर सालाना कमाई होने के बावजूद महंगे किराए और दूसरे खर्चों के कारण बचत की रफ्तार कम हो सकती है.
लेकिन मामला सिर्फ पैसों का भी नहीं है. अगर मौजूदा नौकरी की सुरक्षा पर सवाल है और लंदन की नौकरी बेहतर करियर अनुभव और अपेक्षाकृत स्थिर माहौल दे सकती है, तो विदेश जाना एक अलग तरह का करियर फैसला बन जाता है.
यही वजह है कि रेडिट पर भी लोगों की राय दो हिस्सों में बंटी हुई है. एक पक्ष का कहना है कि 60,000 पाउंड के लिए लंदन की महंगी जिंदगी अपनाना समझदारी नहीं होगी. दूसरा पक्ष मानता है कि जब किसी व्यक्ति के पास पहले से 2.3 करोड़ रुपये की बचत है, कोई डिपेंडेंट नहीं है और करियर को लेकर प्रयोग करने की आजादी है, तो जिंदगी में एक बार ऐसा रिस्क लिया जा सकता है.
आखिरकार, इस टेक प्रोफेशनल के लिए फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अगले कुछ सालों में ज्यादा बचत को प्राथमिकता देता है या अंतरराष्ट्रीय करियर और नई जिंदगी के अनुभव को.
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