कैंपस प्लेसमेंट नहीं, सिर्फ रिजेक्शन! भारतीय महिला ने बताया जर्मनी में जॉब पाना क्यों है मुश्किल?

जर्मनी में रहने वाली भारतीय महिला ने बताया कि वहां नौकरी पाना भारत जितना आसान नहीं है. जानिए क्यों नहीं होता कैंपस प्लेसमेंट, बार-बार रिजेक्शन क्यों मिलते हैं और नौकरी पाने के लिए किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.

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विदेश में पढ़ाई या नौकरी करने का सपना हर साल हजारों भारतीय छात्र देखते हैं. ( Photo: ITG) विदेश में पढ़ाई या नौकरी करने का सपना हर साल हजारों भारतीय छात्र देखते हैं. ( Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 03 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 2:19 PM IST

जर्मनी में रहने वाली एक भारतीय महिला ने सोशल मीडिया पर बताया कि वहां नौकरी पाना भारत की तरह आसान नहीं है. उनके अनुसार जर्मनी में कैंपस प्लेसमेंट की सुविधा नहीं होती और नौकरी के लिए हर उम्मीदवार को खुद आवेदन करना पड़ता है. काफी ज्यादा कंपटीशन,लैंग्वेज बैरियर और लगातार मिलने वाले रिजेक्शन इस प्रक्रिया का हिस्सा हैं. हालांकि उन्होंने कहा कि धैर्य और लगातार कोशिश करने वाले लोगों को आखिरकार सफलता जरूर मिलती है.

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विदेश में पढ़ाई या नौकरी करने का सपना हर साल हजारों भारतीय छात्र देखते हैं. कई लोगों को लगता है कि एक बार जर्मनी जैसे विकसित देश पहुंच गए तो अच्छी नौकरी आसानी से मिल जाएगी. लेकिन जर्मनी में रहने वाली भारतीय महिला श्रुति ने सोशल मीडिया पर अपने अनुभव शेयर करते हुए बताया कि वहां नौकरी पाना बिल्कुल भी आसान नहीं है. उन्होंने बताया कि जर्मनी में भर्ती प्रक्रिया भारत से काफी अलग है और नौकरी पाने के लिए लंबे समय तक धैर्य, मेहनत और लगातार कोशिश करनी पड़ती है.

श्रुति ने बताया भारत से कितना अलग जर्मनी
श्रुति ने अपनी पोस्ट की सीरीज का नाम जर्मनी में जॉब कि रियलिटी रखा है. इसमें उन्होंने बताया कि भारत के कई कॉलेजों में छात्रों को लास्ट ईयर के दौरान कैंपस प्लेसमेंट के जरिए नौकरी मिल जाती है. यानी कंपनियां सीधे कॉलेज आकर छात्रों का इंटरव्यू लेती हैं और सेलेक्शन कर लेती हैं. लेकिन उनके अनुभव के अनुसार जर्मनी में ऐसा सिस्टम आम तौर पर नहीं है. वहां पढ़ाई पूरी होने के बाद छात्रों को खुद अलग-अलग कंपनियों में नौकरी के लिए आवेदन करना पड़ता है. उन्होंने बताया कि जर्मनी में नौकरी का बाजार पूरी तरह खुला होता है. एक ही पद के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में लोग आवेदन करते हैं. ऐसे में प्रतियोगिता काफी ज्यादा होती है. कई बार उम्मीदवार आवेदन करने के बाद कई हफ्तों तक इंतजार करते रहते हैं, लेकिन कंपनी की तरफ से कोई जवाब नहीं आता. यह स्थिति नौकरी तलाश रहे लोगों के लिए काफी निराशाजनक हो सकती है.

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श्रुति के मुताबिक, नौकरी की तलाश के दौरान सबसे बड़ा चैलेंज लगातार मिलने वाले रिजेक्शन होते हैं. उन्होंने कहा कि कई बार उम्मीद के साथ ईमेल खोलते हैं, लेकिन उसमें नौकरी मिलने की जगह रिजेक्शन ई-मेल होता है. शुरुआत में यह बहुत दुख पहुंचाता है और कई लोगों का आत्मविश्वास भी कम होने लगता है. बार-बार रिजेक्ट होने पर ऐसा लगने लगता है कि शायद उनमें ही कोई कमी है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि जर्मनी में रिजेक्शन मिलना सामान्य बात है. इसका मतलब यह नहीं होता कि उम्मीदवार योग्य नहीं है. कई बार किसी पद के लिए सैकड़ों आवेदन आते हैं और कंपनी को केवल एक या दो लोगों का ही चयन करना होता है. इसलिए अच्छे और अनुभवी उम्मीदवारों को भी कई बार नौकरी नहीं मिल पाती.

कई कारणों से आती है दिक्कत
श्रुति ने रिजेक्शन के पीछे कई कारण भी बताए. इनमें किसी पद के लिए कंपटीशन, कंपनी की विशेष स्किल्स की मांग, जर्मन भाषा की जानकारी का अभाव, भर्ती प्रक्रिया में देरी, बजट की कमी और कुछ मामलों में फर्जी जॉब पोस्टिंग जैसी समस्याएं शामिल हैं. उनका कहना है कि इन कारणों की वजह से हर रिजेक्शन को अपनी क्षमता से जोड़कर नहीं देखना चाहिए. उन्होंने बताया कि समय के साथ नौकरी तलाशने वाले लोग इस प्रक्रिया को समझने लगते हैं. वे हर रिजेक्शन से कुछ नया सीखते हैं, अपने रिज्यूमे में सुधार करते हैं, नई स्किल्स सीखते हैं और फिर अगले अवसर के लिए आवेदन करते हैं. धीरे-धीरे यहां का रूटीन बन जाता है- आवेदन करना, जवाब का इंतजार करना, अनुभव से सीखना और फिर दोबारा कोशिश करना.

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श्रुति का मानना है कि जर्मनी में नौकरी पाने के लिए सबसे जरूरी चीज धैर्य और लगातार प्रयास करना है. उन्होंने कहा कि सफलता उन्हीं लोगों को मिलती है जो बार-बार असफल होने के बाद भी हार नहीं मानते. उनका संदेश है कि अगर किसी को विदेश में करियर बनाना है, तो उसे रिजेक्शन से घबराने के बजाय उसे सीखने का मौका समझना चाहिए. लगातार मेहनत और सही तैयारी के साथ आखिरकार सफलता जरूर मिलती है.

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