आमतौर पर दादा-दादी का अपने पोते-पोतियों को पालने में हाथ बंटाना परिवार की जिम्मेदारी और प्यार का हिस्सा माना जाता है. लेकिन चीन से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने परिवार की जिम्मेदारी और बच्चों की परवरिश को लेकर नई बहस छेड़ दी है. यहां एक दादी ने अपने ही बेटे पर केस कर दिया और उससे पोती की 15 साल तक देखभाल करने के बदले 3.6 लाख युआन से ज्यादा यानी करीब 50.85 लाख रुपये की भरपाई मांगी.
मामला इतना चर्चा में इसलिए आया क्योंकि दादी ने सिर्फ कुछ महीने या एक-दो साल नहीं, बल्कि 15 साल तक अपनी पोती की परवरिश में बड़ी भूमिका निभाई थी. उनका कहना था कि इस दौरान बच्ची के रहने-खाने से लेकर पढ़ाई और इलाज तक का खर्च उन्होंने उठाया.
आखिर पूरा मामला क्या है?
रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के पूर्वी हिस्से से जुड़ा यह मामला शंघाई की अदालत में सामने आया. महिला का नाम शू है. उनकी उम्र 60 साल से ज्यादा है. वह अपने पति से तलाक के बाद बेटे के साथ रह रही थीं. साल 2014 में शू के बेटे लिआंग का अपनी पत्नी से तलाक हो गया. उस समय उनकी बेटी यानी शू की पोती सिर्फ 4 साल की थी. तलाक के बाद बच्ची की देखभाल की बड़ी जिम्मेदारी शू ने संभाल ली. धीरे-धीरे पोती की परवरिश का ज्यादातर काम उन्हीं के ऊपर आ गया. उन्होंने बच्ची की रोजमर्रा की जरूरतों के साथ-साथ उसके खाने-पीने, इलाज और पढ़ाई से जुड़े खर्चों में भी योगदान दिया.
बेटा दूसरी शादी करके अलग रहने लगा
मामला तब और उलझ गया जब लिआंग ने दोबारा शादी कर ली. इसके बाद वह अपनी नई पत्नी के साथ अलग रहने चला गया और उसकी बेटी अपनी दादी शू के पास ही रह गई. यानी पोती की देखभाल की जिम्मेदारी लगातार शू के ऊपर बनी रही. रिपोर्ट के अनुसार, यह स्थिति करीब 15 साल तक चली. इतने लंबे समय तक बच्ची की देखभाल करने के बाद जब शू को लगा कि अब वह आर्थिक दबाव के कारण यह जिम्मेदारी नहीं उठा सकतीं, तो उन्होंने अपने बेटे से खर्च की भरपाई मांगने का फैसला किया.
दादी ने बेटे पर क्या आरोप लगाया?
शू का आरोप था कि उनके बेटे में परिवार की जिम्मेदारी निभाने की भावना की कमी थी. उनका कहना था कि पिता होने के नाते बच्चे की परवरिश की जिम्मेदारी बेटे की थी, लेकिन लंबे समय तक उन्हें अपनी पोती की देखभाल करनी पड़ी. इस दौरान उन्हें बच्ची के रोजमर्रा के खर्च के साथ-साथ इलाज और शिक्षा जैसी जरूरतों का भी ध्यान रखना पड़ा. इसलिए उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया और 3.6 लाख युआन से अधिक यानी करीब 54 हजार डॉलर मुआवजे की मांग की.
बेटे ने भी रखी अपनी मजबूरी
दूसरी तरफ बेटे लिआंग ने अपनी मां के आरोपों को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया. उसका कहना था कि उसने अपनी बेटी की जिम्मेदारी अपनी क्षमता के अनुसार निभाई थी. रिपोर्ट के मुताबिक, उस समय उसकी मंथली सैलरी करीब 3,000 युआन यानी लगभग 42,381.09 रुपये थी. यानी बेटे का तर्क था कि उसकी आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी और उसने अपनी बेटी के लिए जितना संभव था, उतना करने की कोशिश की.
15 साल बाद क्यों उठाया यह कदम?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर दादी इतने सालों से पोती की देखभाल कर रही थीं तो मामला अदालत तक क्यों पहुंचा? रिपोर्ट के मुताबिक, लंबे समय तक बच्ची की देखभाल करने के बाद शू पर आर्थिक दबाव बढ़ गया था. उन्हें लगा कि अब वह आगे इस जिम्मेदारी को अकेले नहीं उठा सकतीं. इसलिए उन्होंने बेटे से उन वर्षों में किए गए खर्च की भरपाई की मांग की.
चीन में कई परिवारों में दादा-दादी बच्चों की देखभाल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. खासकर तब, जब माता-पिता वर्किंग हों या परिवार में किसी कारण से बच्चे की पूरी जिम्मेदारी माता-पिता न उठा पा रहे हों. लेकिन इस मामले ने इसी व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर दिया है. अगर दादा-दादी अपनी इच्छा से बच्चों की देखभाल करते हैं तो बात अलग है. लेकिन अगर एक माता-पिता अपनी जिम्मेदारी का बड़ा हिस्सा अपने बुजुर्ग माता-पिता पर छोड़ दें, तो क्या उस काम की कोई कीमत होनी चाहिए?
क्या परिवार में रिश्तों की भी कीमत तय होगी?
इस मामले के सामने आने के बाद चीन में दादा-दादी द्वारा बच्चों की देखभाल के बदले खर्च या पेमेंट को लेकर बहस शुरू हो गई है. हालांकि, एक्सपर्ट ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि ऐसे मामले परिवार के रिश्तों को व्यापार बनाने के लिए नहीं हैं. बल्कि इनका मकसद यह तय करना है कि बच्चे की जिम्मेदारी आखिर किसकी है और अगर कोई बुजुर्ग लंबे समय तक वह जिम्मेदारी निभाता है तो उसके अधिकार क्या हैं.
यानी सवाल यह नहीं है कि दादी ने अपनी पोती को पैसे लेकर पाला या प्यार से. असली सवाल यह है कि बच्चे की जिम्मेदारी निभाने वाले व्यक्ति पर कितना आर्थिक और मानसिक बोझ डाला जा सकता है.
इस मामले ने क्यों छेड़ दी बड़ी बहस?
इस कहानी ने लोगों को इसलिए सोचने पर मजबूर किया है क्योंकि यहां मामला सिर्फ दादी और बेटे का नहीं है. एक तरफ मां है, जिसने अपनी पोती को बचपन से बड़ा करने में मदद की. दूसरी तरफ पिता है, जो अपनी आर्थिक स्थिति का हवाला दे रहा है.य बीच में है एक बच्ची, जिसकी परवरिश को लेकर परिवार के दो सदस्यों के बीच विवाद अदालत तक पहुंच गया. यह मामला आज के बदलते पारिवारिक रिश्तों की तस्वीर भी दिखाता है. पहले परिवार में बुजुर्गों द्वारा बच्चों की देखभाल को अक्सर सामान्य माना जाता था. लेकिन अब लोग यह सवाल भी पूछ रहे हैं कि क्या बुजुर्गों की मदद को उनकी मजबूरी समझ लेना सही है?
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