हैंडराइटिंग खराब हुई तो पीनी पड़ती थी स्याही! प्राचीन चीन में था ये हैरान करने वाला नियम

प्राचीन चीन में खराब हैंडराइटिंग को लेकर सख्त नियम थे. ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक, कुछ विद्वानों और परीक्षा देने वालों को खराब लिखावट के लिए स्याही पीने की सजा दी जाती थी. इतना ही नहीं, बाद के दौर में कुछ विद्वान स्याही को अपनी साहित्यिक क्षमता से भी जोड़कर देखते थे.

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जानिए स्याही पीने की इस अजीब परंपरा की पूरी कहानी. ( Photo: ITG) जानिए स्याही पीने की इस अजीब परंपरा की पूरी कहानी. ( Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 18 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 2:51 PM IST

आज अगर किसी की हैंडराइटिंग खराब हो तो ज्यादा से ज्यादा टीचर उसे दोबारा साफ लिखने के लिए कहेंगे. लेकिन क्या आप सोच सकते हैं कि कभी खराब लिखावट की सजा स्याही पीना भी हुआ करती थी? प्राचीन चीन में विद्वानों और परीक्षा देने वाले लोगों से जुड़ी ऐसी ही एक अजीब परंपरा का जिक्र ऐतिहासिक दस्तावेजों में मिलता है. खास बात यह है कि उस समय स्याही पीने की वजह सिर्फ सजा नहीं थी, बल्कि कुछ विद्वान इसे अपने इंटेलिजेंस से भी जोड़ते थे.

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स्याही पीने की सबसे पुरानी दर्ज जानकारी चीन के उत्तरी और दक्षिणी राजवंशों (420-589) के दौर की बताई जाती है. उस समय जिन विद्वानों की लिखावट बहुत खराब या पढ़ने में मुश्किल होती थी, उन्हें सजा के तौर पर स्याही पीने के लिए मजबूर किया जाता था. इसका उल्लेख‘बुक ऑफ सुई’ यानी ‘सुई शु' में भी मिलता है. यह चीन के सुई राजवंश के इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण दस्तावेज है. इसमें बताया गया है कि स्थानीय अधिकारियों की परीक्षा के दौरान जिन लोगों की लिखावट खराब पाई जाती थी, उन्हें स्याही पीने की सजा दी जा सकती थी.

कितनी स्याही पीनी पड़ती थी?
यह बात शायद सबसे ज्यादा हैरान करने वाली है. उस समय खराब लिखावट की सजा के तौर पर एक ‘शेंग’ स्याही पीने का उल्लेख मिलता है.सुई राजवंश के समय एक शेंग की मात्रा करीब 600 मिलीलीटर बताई गई है. यानी खराब लिखावट के लिए किसी व्यक्ति को लगभग 600 मिलीलीटर स्याही पीने की सजा दी जा सकती थी. आज के समय में यह कल्पना करना भी काफी अजीब लगता है.

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‘पेट में स्याही’ का क्या मतलब था?
चीन में ‘पेट में स्याही होना’ जैसा एक मुहावरा भी है. इसका इस्तेमाल किसी व्यक्ति को बहुत पढ़ा-लिखा या विद्वान बताने के लिए किया जाता है. यानी स्याही का संबंध सिर्फ लिखने से नहीं था, बल्कि इंटेलिजेंसी से भी जोड़कर देखा जाता था. इसी वजह से स्याही पीने की यह परंपरा बाद के समय में एक अलग रूप में भी दिखाई देती है.

कुछ विद्वान खुद भी पीते थे स्याही
सबसे दिलचस्प बात यह है कि खराब लिखावट के लिए सजा वाली यह परंपरा बाद में खत्म हो गई, लेकिन कुछ विद्वानों ने स्याही पीने का काम अपनी इच्छा से भी किया. ऐसा माना जाता था कि स्याही पीने से उनकी लिटरेसी एबिलिटी ओर राइटिंग स्किल बेहतर हो सकता है. हालांकि आज के नजरिए से यह सोच बेहद अजीब लगती है.

बाद में खत्म कर दी गई यह सजा
सुई राजवंश के बाद यह नियम ज्यादा समय तक नहीं चला. तांग राजवंश के समय सम्राट ली शिमिन के सत्ता में आने के बाद स्याही पीने की यह सजा खत्म कर दी गई. हालांकि स्याही और इंटेलिजेंस का संबंध लोगों की सोच में बना रहा और कुछ विद्वान इसे अपनी साहित्यिक पहचान से जोड़ते रहे.

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उस समय की स्याही आज जैसी नहीं थी
यहां एक और महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है. प्राचीन चीन में इस्तेमाल होने वाली स्याही आज की आधुनिक औद्योगिक स्याही ( Modern Industrial Ink) जैसी नहीं थी. उस समय स्याही बनाने के लिए प्राकृतिक चीजों को जलाकर निकलने वाली कालिख, जैसे पौधों या जानवरों के तेल को जलाने से मिली कालिख का इस्तेमाल किया जाता था.

इसका मतलब यह नहीं है कि प्राचीन स्याही पीना सुरक्षित था. आज इस्तेमाल होने वाली स्याही या किसी भी तरह की स्याही को पीना बिल्कुल सुरक्षित नहीं माना जाना चाहिए. प्राचीन चीन की यह कहानी बताती है कि उस दौर में लिखावट को कितना महत्व दिया जाता था. आज खराब हैंडराइटिंग पर डांट पड़ सकती है, लेकिन उस समय इसके लिए स्याही पीने जैसी अजीब सजा भी दी जा सकती थी. यही वजह है कि इतिहास की यह घटना आज भी लोगों को हैरान करती है.

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