पालंटिर के CTO श्याम शंकर ने कहा कि कुछ AI रिसर्चर यह दिखाने के लिए सिगरेट पीने लगे हैं कि उन्हें भरोसा है कि AI कैंसर का इलाज खोज लेगा. बता दें कि Plantir दुनिया की बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों में से एक है. इस कंपनी के सीईओ भारतीय मूल के हैं. इनके बयान के बाद सोशल मीडिया पर खास तौर पर इसकी जम कर चर्चा हो रही है.
हालांकि, उन्होंने अपने दावे के समर्थन में कोई सबूत नहीं दिया. इस बयान ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की पावर, कैंसर के इलाज की उम्मीद और टेक इंडस्ट्री में बढ़ते भरोसे पर नई बहस छेड़ दी है.
टेक इंडस्ट्री के कई लोग मानते हैं कि आने वाले समय में यह गंभीर बीमारियों के इलाज की खोज में भी बड़ी भूमिका निभा सकता है. लेकिन क्या AI पर यह भरोसा इतना बढ़ गया है कि कुछ लोग कैंसर होने के खतरे को भी नजरअंदाज करने लगे हैं?
अमेरिकी टेक कंपनी पालंटिर के चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर (CTO) श्याम शंकर ने ऐसा ही एक दावा किया है. उनका कहना है कि कुछ AI रिसर्चर यह दिखाने के लिए सिगरेट पीने लगे हैं कि उन्हें पूरा भरोसा है कि भविष्य में AI कैंसर का इलाज खोज लेगा. हालांकि, शंकर ने न तो इन रिसर्चरों के नाम बताए और न ही अपने दावे के समर्थन में कोई सबूत पेश किया. इसलिए इसे वैज्ञानिकों के बीच साबित हो चुका चलन नहीं माना जा सकता.
एक रिपोर्ट के मुताबिक, शंकर ने यह बात 11 अक्टूबर को CBS के कार्यक्रम 'Face the Nation' में कही थी.
AI पर भरोसा दिखाने के लिए सिगरेट? क्या है पूरा मामला
इंटरव्यू में शंकर ने कहा कि कई AI रिसर्चर दूसरों को यह दिखाने के लिए सिगरेट पीने लगे हैं कि उन्हें इस तकनीक की क्षमता पर कितना भरोसा है. उनके मुताबिक, इसके पीछे सोच यह है कि अगर भविष्य में AI कैंसर का इलाज खोज सकता है, तो आज कैंसर के खतरे से डरने की जरूरत क्यों होनी चाहिए.
इस बातचीत के दौरान कार्यक्रम की होस्ट मार्गरेट ब्रेनन ने भी इस दावे पर सवाल उठाया. शंकर ने इसे सिलिकॉन वैली में AI को लेकर बढ़ते अति-विश्वास का उदाहरण बताया. उन्होंने इस माहौल को 'मास साइकोसिस' और 'सोशल डिल्यूजन' जैसे शब्दों से समझाने की कोशिश की.
आसान भाषा में कहें तो उनका इशारा ऐसे माहौल की ओर था, जहां लोग किसी तकनीक की संभावनाओं पर इतना भरोसा करने लगें कि उसके बारे में सवाल पूछना या उसके जोखिमों को समझना पीछे छूट जाए.
यहां एक बात समझना जरूरी है. शंकर का बयान AI रिसर्चरों के बिहेवियर के बारे में उनका दावा है, कोई वैज्ञानिक स्टडी नहीं. उन्होंने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि कितने रिसर्चर ऐसा कर रहे हैं या उन्हें इस बारे में जानकारी कहां से मिली.
क्या AI सच में कैंसर का इलाज खोज सकता है?
AI से कैंसर के इलाज की खोज में मदद मिलने की उम्मीद पूरी तरह बेबुनियाद नहीं है. वैज्ञानिक इस तकनीक का इस्तेमाल दवाओं की खोज, मेडिकल डेटा का विश्लेषण, बीमारी से जुड़े पैटर्न समझने और संभावित इलाज की पहचान करने जैसे कामों में कर रहे हैं.
कैंसर एक बीमारी नहीं, बल्कि कई तरह की बीमारियों का समूह है. अलग-अलग कैंसर के कारण, शरीर में उनके फैलने का तरीका और इलाज का असर अलग हो सकता है. ऐसे में किसी एक तकनीक से सभी तरह के कैंसर का इलाज खोज लेने की उम्मीद करना फिलहाल जल्दबाजी होगी.
AI बड़ी मात्रा में उपलब्ध डेटा को तेजी से समझने और वैज्ञानिकों के सामने नए विकल्प रखने में मदद कर सकता है. इससे रिसर्च के कुछ चरण तेज हो सकते हैं. लेकिन किसी दवा या इलाज को सुरक्षित और असरदार साबित करने के लिए प्रयोग, क्लिनिकल ट्रायल और डॉक्टरों की जांच जरूरी रहती है.
जर्नल 'Nature Reviews Drug Discovery' में 2026 में पब्लिश्ड एक रिव्यू के मुताबिक, AI के जरिए दवा खोजने के क्षेत्र में काफी काम हुआ है, लेकिन मरीजों के इलाज में इसके वास्तविक और साबित हो चुके असर के पर्याप्त प्रमाण अभी लिमिटेड ही हैं. यानी AI से उम्मीद जरूर है, पर लैब में किसी संभावना की पहचान कर लेना और मरीजों को सफल इलाज मिलना दो अलग बातें हैं.
AI को लेकर डर और उम्मीद, दोनों पर शंकर ने उठाए सवाल
पालंटिर के सीईओ शंकर का बयान सिर्फ कैंसर के इलाज तक ही नहीं था. उन्होंने AI को लेकर सिलिकॉन वैली में चल रही बहस पर भी सवाल उठाए. उनके मुताबिक, कुछ लोग AI को भविष्य में इंसानियत के लिए बहुत बड़ा खतरा मानते हैं, जबकि दूसरे लोग इससे ऐसी उम्मीदें लगा रहे हैं कि यह दुनिया की लगभग हर बड़ी समस्या हल कर देगा.
शंकर का तर्क है कि दोनों तरह की सोच में तकनीक को जरूरत से ज्यादा महत्व देने का खतरा है. उनके मुताबिक, AI पर चर्चा करते समय यह देखना जरूरी है कि इससे असल दुनिया में क्या बदलाव आ रहे हैं, लोगों की नौकरियों और कारोबार पर इसका क्या असर पड़ रहा है और कंपनियां इससे मिलने वाले फायदे को कैसे साबित कर रही हैं.
उन्होंने यह भी कहा कि AI कंपनियों की जिम्मेदारी है कि वे सिक्योर प्रोडक्ट बनाएं और तकनीक के असली फायदे लोगों के सामने रखें. केवल बड़े दावे करना काफी नहीं है.
कैंसर का डर खत्म होने की उम्मीद में सिगरेट पीना कितना खतरनाक है?
अगर कोई यह सोचकर सिगरेट पीता है कि भविष्य में AI कैंसर का इलाज खोज लेगा, तो यह सोच बेहद जोखिम भरी है. फिलहाल ऐसा कोई भरोसेमंद आधार नहीं है जिसके सहारे कोई व्यक्ति यह मान सके कि भविष्य की तकनीक आज तंबाकू से होने वाले नुकसान को खत्म कर देगी.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, तंबाकू शरीर के कई अंगों को नुकसान पहुंचाता है और 20 से ज्यादा तरह के कैंसर का जोखिम बढ़ाता है. तंबाकू इस्तेमाल करने का कोई सुरक्षित स्तर नहीं है.
आजतक टेक्नोलॉजी डेस्क